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सोमवार, 15 अगस्त 2011

हिन्दू मन्दिरों को “सेकुलर लूट” से बचाने हेतु सुप्रीम कोर्ट को कुछ सुझाव…

यदि आप सोचते हैं कि मन्दिरों में दान किया हुआ, भगवान को अर्पित किया हुआ पैसा, सनातन धर्म की बेहतरी के लिए, हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए काम आ रहा है तो आप निश्चित ही बड़े भोले हैं। मन्दिरों की सम्पत्ति एवं चढ़ावे का क्या और कैसा उपयोग किया जाता है पहले इसका एक उदाहरण देख लीजिये, फ़िर आगे बढ़ेंगे-

कर्नाटक सरकार के मन्दिर एवं पर्यटन विभाग (राजस्व) द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार 1997 से 2002 तक पाँच साल में कर्नाटक सरकार को राज्य में स्थित मन्दिरों से “सिर्फ़ चढ़ावे में” 391 करोड़ की रकम प्राप्त हुई, जिसे निम्न मदों में खर्च किया गया-

1) मन्दिर खर्च एवं रखरखाव – 84 करोड़ (यानी 21.4%)
2) मदरसा उत्थान एवं हज – 180 करोड़ (यानी 46%)
3) चर्च भूमि को अनुदान – 44 करोड़ (यानी 11.2%)
4) अन्य - 83 करोड़ (यानी 21.2%)
कुल 391 करोड़

जैसा कि इस हिसाब-किताब में दर्शाया गया है उसको देखते हुए “सेकुलरों” की नीयत बिलकुल साफ़ हो जाती है कि मन्दिर की आय से प्राप्त धन का (46+11) 57% हिस्सा हज एवं चर्च को अनुदान दिया जाता है (ताकि वे हमारे ही पैसों से जेहाद, धार्मिक सफ़ाए एवं धर्मान्तरण कर सकें)। जबकि मन्दिर खर्च के नाम पर जो 21% खर्च हो रहा है, वह ट्रस्ट में कुंडली जमाए बैठे नेताओं व अधिकारियों की लग्जरी कारों, मन्दिर दफ़्तरों में AC लगवाने तथा उनके रिश्तेदारों की खातिरदारी के भेंट चढ़ाया जाता है। उल्लेखनीय है कि यह आँकड़े सिर्फ़ एक राज्य (कर्नाटक) के हैं, जहाँ 1997 से 2002 तक कांग्रेस सरकार ही थी…

अब सोचिए कि 60-65 साल के शासन के दौरान कितने राज्यों में कांग्रेस-वामपंथ की सरकारें रहीं, वहाँ कितने प्रसिद्ध मन्दिर हैं, कितने देवस्थान बोर्ड एवं ट्रस्ट हैं तथा उन बोर्डों एवं ट्रस्टों में कितने कांग्रेसियों, गैर-हिन्दुओं, “सो कॉल्ड” नास्तिकों की घुसपैठ हुई होगी और उन्होंने हिन्दुओं के धन व मन्दिर की कितनी लूट मचाई होगी। लेकिन चूंकि हिन्दू आबादी का एक हिस्सा इन बातों से अनभिज्ञ है…, एक हिस्सा मूर्ख है…, एक हिस्सा “हमें क्या लेना-देना यार, हम तो श्रद्धा से मन्दिर में चढ़ावा देते हैं और फ़िर पलटकर नहीं देखते, कि उन पैसों का क्या हो रहा है…” किस्म के आलसी हैं, जबकि “हिन्दू सेकुलरों” का एक बड़ा हिस्सा तो है ही, जिसे आप विभीषण, जयचन्द, मीर जाफ़र चाहे जिस नाम से पुकार लीजिए। यानी गोरी-गजनवी-क्लाइव तो चले गए, लेकिन अपनी “मानस संतानें” यहीं छोड़े गए, कि बेटा लूटो… हिन्दू मन्दिर होते ही हैं लूटने के लिए…। पद्मनाभ मन्दिर (Padmanabh Swamy Temple) की सम्पत्ति की गणना, देखरेख एवं कब्जा चूंकि सुप्रीम कोर्ट के अधीन एवं उसके निर्देशों के मुताबिक चल रहा है इसलिए अभी सब लोग साँस रोके देख रहे हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने इस खजाने की रक्षा एवं इसके उपयोग के बारे में सुझाव माँगे हैं। सेकुलरों एवं वामपंथियों के बेहूदा सुझाव एवं उसे “काला धन” बताकर सरकारी जमाखाने में देने सम्बन्धी सुझाव तो आ ही चुके हैं, अब कुछ सुझाव इस प्रकार भी हैं –

1) सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक “हिन्दू मन्दिर धार्मिक सम्पत्ति काउंसिल” का गठन किया जाए। इस काउंसिल में सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान, दो निवृत्त न्यायाधीश, एवं सभी प्रमुख हिन्दू धर्मगुरु शामिल हों। इस काउंसिल में पद ग्रहण करने की शर्त यह होगी कि सम्बन्धित व्यक्ति न पहले कभी चुनाव लड़ा हो और न काउंसिल में शामिल होने के बाद लड़ेगा (यानी राजनीति से बाहर)। इस काउंसिल में अध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष का पद त्रावणकोर के राजपरिवार के पास रहे, क्योंकि 250 वर्ष में उन्होंने साबित किया है कि खजाने को खा-पीकर “साफ़” करने की, उनकी बुरी नीयत नहीं है।

2) इस काउंसिल के पास सभी प्रमुख हिन्दू मन्दिरों, उनके शिल्प, उनके इतिहास, उनकी संस्कृति के रखरखाव, प्रचार एवं प्रबन्धन का अधिकार हो।

3) इस काउंसिल के पास जो अतुलनीय और अविश्वसनीय धन एकत्रित होगा वह वैसा ही रहेगा, परन्तु उसके ब्याज से सभी प्रमुख मन्दिरों की साज-सज्जा, साफ़-सफ़ाई एवं प्रबन्धन किया जाएगा।

4) इस विशाल रकम से प्रतिवर्ष 2 लाख हिन्दुओं को (रजिस्ट्रेशन करवाने पर) अमरनाथ, वैष्णो देवी, गंगासागर, सबरीमाला, मानसरोवर (किसी एक स्थान) अथवा किसी अन्य स्थल की धार्मिक यात्रा मुफ़्त करवाई जाएगी। एक परिवार को पाँच साल में एक बार ही इस प्रकार की सुविधा मिलेगी। देश के सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों पर काउंसिल की तरफ़ से सर्वसुविधायुक्त धर्मशालाएं बनवाई जाएं, जहाँ गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी धार्मिक यात्रा में तीन दिन तक मुफ़्त रह-खा सके।

5) इसी प्रकार पुरातात्विक महत्व के किलों, प्राचीन स्मारकों के आसपास भी “सिर्फ़ हिन्दुओं के लिए” इसी प्रकार की धर्मशालाएं बनवाई जाएं जिनका प्रबन्धन काउंसिल करेगी।

6) नालन्दा एवं तक्षशिला जैसे 50 विश्वविद्यालय खोले जाएं, जिसमें भारतीय संस्कृति, भारतीय वेदों, भारत की महान हिन्दू सभ्यता इत्यादि के बारे में विस्तार से शोध, पठन, लेखन इत्यादि किया जाए। यहाँ पढ़ने वाले सभी छात्रों की शिक्षा एवं आवास मुफ़्त हो।

ज़ाहिर है कि ऐसे कई सुझाव माननीय सुप्रीम कोर्ट को दिये जा सकते हैं, जिससे हिन्दुओं द्वारा संचित धन का उपयोग हिन्दुओं के लिए ही हो, सनातन धर्म की उन्नति के लिए ही हो, न कि कोई सेकुलर या नास्तिक इसमें “मुँह मारने” चला आए। हाल के कुछ वर्षों में अचानक हिन्दू प्रतीकों, साधुओं, मन्दिरों, संस्कृति इत्यादि पर “सरकारी” तथा “चमचात्मक” हमले होने लगे हैं। ताजा खबर यह है कि उड़ीसा की “सेकुलर” सरकार, पुरी जगन्नाथ मन्दिर के अधीन विभिन्न स्थानों पर जमा कुल 70,000 एकड़ जमीन “फ़ालतू” होने की वजह से उसका अधिग्रहण करने पर विचार कर रही है। स्वाभाविक है कि इस जमीन का “सदुपयोग”(?) फ़र्जी नेताओं के पुतले लगाने, बिल्डरों से कमाई करने, दो कमरों में चलने वाले “डीम्ड” विश्वविद्यालयों को बाँटने अथवा नास्तिकों, गैर-हिन्दुओं एवं सेकुलरों की समाधियों में किया जाएगा…। भारत में “ज़मीन” का सबसे बड़ा कब्जाधारी “चर्च” है, जिसके पास सभी प्रमुख शहरों की प्रमुख जगहों पर लाखों वर्गमीटर जमीन है, परन्तु सरकार की नज़र उधर कभी भी नहीं पड़ेगी, क्योंकि कांग्रेस के अनुसार “सफ़ेद” और “हरा” रंग पवित्रता और मासूमियत का प्रतीक है, जबकि “भगवा” रंग आतंकवाद का…।

जब से केरल के स्वामी पद्मनाभ मन्दिर के खजाने के दर्शन हुए हैं, तमाम सेकुलरों एवं वामपंथियों की नींद उड़ी हुई है, दिमाग पर बेचैनी तारी है, दिल में हूक सी उठ रही है और छाती पर साँप लोट रहे हैं। पिछले 60 साल से लगातार हिन्दुओं के विरुद्ध “विष-वमन” करने एवं लगातार हिन्दू धर्म व भारतीय संस्कृति को गरियाने-धकियाने-दबाने के बावजूद सनातन धर्म की पताका विश्व के कई देशों में फ़हरा रही है, बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में मन्दिर से निकले इस खजाने ने मानो सेकुलर-वामपंथी सोच के जले पर नमक छिड़क दिया है।

हिन्दू तो पहले से ही जानते हैं कि मन्दिरों में श्रद्धापूर्वक भगवान को अर्पित किया हुआ टनों से सोना-जवाहरात मौजूद है, इसलिए हिन्दुओं को पद्मनाभ स्वामी मन्दिर की यह सम्पत्ति देखकर खास आश्चर्य नहीं हुआ, परन्तु “कु-धर्मियों” के पेट में दर्द शुरु हो गया। हिन्दुओं द्वारा अर्पित, हिन्दू राजाओं एवं पुजारियों-मठों द्वारा संचित और संरक्षित इस सम्पत्ति को सेकुलर तरीके से “ठिकाने लगाने” के सुझाव भी आने लगे हैं, साथ ही इस सम्पत्ति को “काला धन” (Black Money in India) बताने के कुत्सित प्रयास भी जारी हैं। एक हास्यास्पद एवं मूर्खतापूर्ण बयान में केरल के एक वामपंथी नेता ने, इस धन को मुस्लिम और ईसाई राजाओं से लूटा गया धन भी बता डाला…

अतः इस लेख के माध्यम से मैं सुप्रीम कोर्ट से अपील करता हूँ कि वह “स्वयं संज्ञान” लेते हुए ताजमहल के नीचे स्थित 22 सीलबन्द कमरों को खोलने का आदेश दे, जिसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो ताकि पता चले कि कहीं शाहजहाँ और मुमताज सोने की खदान पर तो आराम नहीं फ़रमा रहे? इन सीलबन्द कमरों को खोलने से यह भी साफ़ हो जाएगा कि क्या वाकई ताजमहल एक हिन्दू मन्दिर था? इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करके यह माँग भी की जाना चाहिए कि ज्ञानवापी मस्जिद के नीचे, अजमेर दरगाह के नीचे एवं गोआ के विशाल चर्चों तथा केरल के आर्चबिशपों के भव्य मकानों की भी गहन जाँच और खुदाई की जाए ताकि जो सेकुलर-वामपंथी हिन्दू मन्दिरों के खजाने पर जीभ लपलपा रहे हैं, वे भी जानें कि “उधर” कितना “माल” भरा है। हिन्दुओं एवं उनके भगवान के धन पर बुरी नज़र रखने वालों को संवैधानिक एवं कानूनी रूप से सबक सिखाया जाना अति-आवश्यक है… वरना आज पद्मनाभ मन्दिर का नम्बर आया है, कल भारत के सभी मन्दिर इस “सेकुलर-वामपंथी” गोलाबारी की रेंज में आ जाएंगे…

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चलते-चलते :-

पद्मनाभ मन्दिर की सम्पत्ति को लेकर कई तरह के "विद्वत्तापूर्ण सुझाव" आ रहे हैं कि इस धन से भारत के गरीबों की भलाई होना चाहिए, इस धन से जनकल्याण के कार्यक्रम चलाए जाएं, बेरोजगारी दूर करें, सड़कें-अस्पताल बनवाएं… इत्यादि। यानी यह कुछ इस तरह से हुआ कि परिवार के परदादा द्वारा गाड़ी गई तिजोरी खोलने पर अचानक पैसा मिला, तो उसमें से कुछ "दारुकुट्टे बेटे" को दे दो, थोड़ा सा "जुआरी पोते" को दे दो, एक हिस्सा "लुटेरे पड़पोते" को दे दो… बाकी का बैंक में जमा कर दो, जब मौका लगेगा तब तीनों मिल-बाँटकर "जनकल्याण"(?) हेतु खर्च करेंगे … :) :)। जबकि "कुछ सेकुलर विद्वान" तो पद्मनाभ मन्दिर की सम्पत्ति को सीधे "काला धन" बताने में ही जुट गए हैं ताकि उनके 60 वर्षीय शासनकाल के "पाप" कम करके दिखाए जा सकें…। ये वही लोग हैं जिन्हें "ए. राजा" और "त्रावणकोर के राजा" के बीच अन्तर करने की तमीज नहीं है…

Suresh Chiplunkar

सेमेटिक चिंतन का ही विस्तार है इस्लाम, ईसाइयत एवं साम्यवाद

समाजवाद का सिध्दांत रॉवट ओवेन एवं सेंट साईमन ने दिया। मेकाइबर और पेज नामक समाज विज्ञानी ने समाज को परिभाषित किया। पश्चिम में समाज की संरचना का जो क्रमिक विकास हुआ है वह संघर्ष और विखंडन के सिध्दांत पर आधारित है। इसलिए वैज्ञानिक समाजवाद के प्रवर्तक कार्ल मर्क्स को दुनिया का इतिहास संघर्ष से भरा पडा दिखा। जो लोग यूरोप की सभ्यता को यूनानी सभ्यता का विस्तार मानते हैं वे भ्रम में हैं। आज का यूरोप यूनान का नहीं अपितु आद्य अरब सभ्यता का विस्तार है। भारत में शुक्राचार्य नाम के एक चिंतक हो गये हैं। उन्हें दानवों के गुरू के रूप जाना जाता है। दानव यानि भौतिक और जडवादी चिंतन को मानने वाला। शुक्राचार्य के पौत्र का नाम हर्ब था। जिसका अपभ्रंश अरब हो गया। इस बात में कितनी सत्यता है, उसके लिए तो शोध की जरूरत है, लेकिन एक यह भी दृष्टिकोण है जिसे दुनिया में समाज की संरचना को समझने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।

कहा जाता है कि सेमेटिक विचार को मानने वाले पहले मिश्र में रहते थे। वहां के राजा को उन लोगों ने छल से मार कर रातों रात निकल गये और मध्य पूरव के समुद्री किनारे पर अपना स्थाई आवास बनाया। यही हजरत इब्राहिम और हजरत ईसा नामक दो चिंतक पैदा हुए जिन्होंने दुनिया को दो अभिनव चिंतन से अवगत कराया। हजरत ईसा ने ईसाइयत का कनसेप्त दिया और और हजरत इब्राहिम ने इस्लाम का। ये दोनों यहूदी थे इसलिए आज भी ईसाइयत और इस्लाम में यहूदी मान्यताओं की झलक मिलती है। इससे यह साबित होता है कि यूरोप का सांस्कृतिक विस्तार यूनानी नहीं सेमेटिक है। सेमेटिक चिंतन को दानवी चिंतन से जोडकर देखा जाना चाहिए,तब बातें समझ में आएगी। इस चिंतन के असली प्रणेता शुक्राचार्य को ही माना जाना चाहिए। यूनान के चिंतन को तो सेमेटिकवादियों ने जड मूल से समाप्त कर दिया। हां थोडी बहुत भाषा बची हुई है। सेमेटिक चिंतन के मानने वालों ने दुनिया में उत्पात भी खूब मचाया है। जिस प्रकार इस्लाम के मानने वालों ने अपने चिंतन की स्थापना के लिए खून बहाए, उसी प्रकार ईसाई धर्मावलंवियों ने भी जबरदस्त रक्तपात किये। सेमेटिक उत्पात के कारण ही संपूर्ण यूरोप के सहअस्ततित्ववादी मारे गये।

इसके बाद इंग्लैंड नामक द्वीप पर फ्रांसिस बैकन नामक एक चिंतक पैदा हुआ। जिसने कहा कि प्रकृति एक स्त्री के समान है, जिसके बाहों को मरोडने से वह अपने रहस्यों को उगल देगी। बैकन के उस सिध्दांत से यूरोप में प्रकृति के खिलाफ संघर्ष का श्रीगणेश हो गया जो आज तक चल रहा है। इस चिंतन की मिमांशा से स्पष्ट हो जाता है कि जिस संघर्ष में सेमेटिक चिंतन को मानने वाले विश्वास करते थे उस बात को ही बैकन ने फिर से परिभाषित कर दिया। बैकन का चिंतन कार्ल मार्क्स के चिंतन से मिलता है और कार्ल मार्क्स का चिंतन शुक्राचार्य के चिंतन से मिलता है। दानव गुरू शुक्राचार्य भी संघर्ष और बलात आधिपत्य पर विश्वास करते थे। प्रकृति के खिलाफ संघर्ष की घोषणा उन्होंने ही सबसे पहले की और प्रकृति पर आधिपत्य के लिए उन्होंने कई सिध्दांत भी गढे। यहां एक पैराणिक कथा का उल्लेख यहां करना ठीक रहेगा। देव दानव की लडाई में इन्द्र ने छल से रंभ नामक दानव की हत्या कर दी। इस घटना की जानकारी जब शुक्राचार्य को हुई तो उन्होंने रंभ के मृत्य देह से वीर्य निकाल एक भैंस के गर्भ में प्रतिस्थापित कर दिया और उससे महिशासुर नामक दानव का निर्माण किया। शुक्राचार्य यही नहीं रूके उन्होंने महिशासुर की मृत्यु के बाद उसके वीर्य को हथनी के गर्भ में प्रतिस्थापित कर हथासुर नामक दानव पैदा कर दिया। शुक्राचार्य अपने इस अभियान में कितना सफल हुए यह तो पता नहीं लेकिन इससे प्रकृति के खिलाफ संघर्ष के इतिहास का पता चलता है। इस कथा के उल्लेख से यह साबित होता है कि जिस चिंतन को आज इस्लाम, ईसाइयत और साम्यवादी स्थापित करने में लगे हैं उसके प्रवर्तक शुक्राचार्य को ही माना जाना चाहिए। शुक्राचार्य, कार्ल मार्क्स और बैकन में समानता दिखती है। इसलिए यूरोप को यूनान की सभ्यता का विस्तार मानना भ्रम है। आज के पूरे खुराफात की जड सेमेटिक चिंतन में ही है।

इधर भरत में चार्वाक की एक संपुष्ट धारा रही है। जिसने मात्र चार तत्वों की ही प्रधानता दी और घोषित कर दिया कि जन्म से पहले तथा मृत्यु के बाद का सारा विधान, साहित्य कपोल कल्पना है एवं पंडितों ने अपने व्यापार के लिए बनाया है। बुध्दकालीन चिंतक पूरणकस्यप ने तो कर्म के सिध्दांत को ही नकार दिया और कहा कि कोई कर्म न तो शुभ होता है और न ही अशुभ। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि कर्म का कोई फल नहीं होता है। चार्वाक दार्शनिक पुरंदर ने कहा कि शरीर से आत्मा को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। इन तमाम चिंतकों के चिंतन का उल्लेख करने का कारण यह है कि अब दुनिया जिस दिशा की ओर जा रही है वह दिशा निहायत भौतिकवादी है तथा इस मार्ग में संघर्ष एवं विखंडन को ही केन्द्र में रखा गया है। सबसे बडी बात यह है कि दुनिया जिस ओर जा रही है वहां केवल संघर्ष और भौतिकता का ही मतलब रह जाएगा। कुल मिलाकर संयुक्त राज्य अमेरिका भी उसी सेमेटीजम का विस्तार है जिस चिंतन को भयानक रक्तपात के बाद स्थापित किया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका के चिंतकों ने अपने ढंग के नये विश्व की कल्पना की है। यूरोप के ईयाई जब अमेरिकी महाद्वीप पर पहुंचे तो वहां की भौतिक समृध्द को देखकर वे प्रभावित हुए। वहां की समृध्दि ने उन्हें आकर्षित किया। इस आकर्षन के कारण यूरोपियों ने अमेरिका की सभ्यता को समाप्त कर दिया। अब अमेरिकी महाद्वीप में यूरोपिये ईयाई के साथ एक बडी समस्या सामने आयी। वे लोग जिस सभ्यता को स्थापित करना चाहते थे उसके वे दास थे लेकिन जिस सभ्यता के साथ उनकी लडाई थी अब वे उनके मालिक थे। इस द्वंद्व ने अमेरिका में आए यूरोपियों को नया सिध्दान्त गढने के लिए मजबूर कर दिया। उसी द्वंद्व का ही प्रतिफल है कि यूरोपिये अमेरिकियों ने पोस्ट मॉडर्न विश्व का कन्सेप्ट दिया। उत्तर आधुनिक शब्द यूरोपिये अमेरिकी ईसाई के द्वंद्व का परिनाम है। अमेरिका पहुंचे ईसाइयों का ऐसा कोई इतिहास नहीं है जिसपर अमेरिकी गर्व कर सकें। इसलिए अमेरिकी ईसाइयों ने इतिहास और संस्कृति का मजाक उडाया। यही तो भौतिकवादी चाहते हैं और यही मार्क्सवादी भी चाहते हैं। अब दुनिया जिस ओर बढ रही है उसमें तीन चिंतन का समावेश है। पहला जडवाद एवं भौतिकवाद, दूसरा संघर्ष और तीसरा उत्तर आधुनिकता। आने वाला विश्व इन्ही तीन चिंतनों का विस्तार होगा। जिसका स्वरूप दिखने लगा है। यानि प्रकृति को पराजीक करने का संघर्ष, बस शरीर ही सबकुछ है और इतिहासा कुछ नहीं होता। संस्कृति, मान्यता, धर्म, सभ्यता, परिवार, समाज, भाषा आदि का कोई मतलब नहीं है। बस जीवन को जीना है और जीना है तो ऐश करना है।

आज के विश्व की सामाजिक और राजनीतिक – आर्थिक व्यवस्था एवं संरचना निःसंदेह कार्ल मार्क्स के सिध्दांन्तो के चारो ओर भ्रमण कर रहा है। मार्क्स भौतिक तत्वों से दुनिया के निर्माण के सिध्दांत में विश्वास करते हैं। मार्क्स यह भी मानते हैं कि दुनिया संघर्षों का इतिहास है। केवल मार्क्स ही नहीं आईन्स्टाईन एवं मनोवैज्ञानिक फ्रायड भौतिक जगत के स्वरूप को ही सबकुछ मानते हैं। मार्क्स के सिध्दांत को राजनीतिक और व्यवस्थात्मक स्वरूप लेनिन ने दिया और उसने पृथ्वी पर स्वर्ग की कल्पना कर दी। लेनिन मार्क्स के सिध्दांतों पर चल कर रसिया के राजनीतिक विस्तार वाले स्थान पर स्वर्ग नहीं ला सके। उलटे रसिया नर्क में बदलता चला गया। सच पूछो तो स्वर्ग की कल्पना सामंती सोच पर आधारित कल्पना है। इससे यह साबित होता है कि मार्क्स अपने चिंततन में समानता के सिध्दांतों की बात तो करते हैं लेकिन जीवना में उन्हें भी सामंती सुख चाहिए। स्वर्ग में अप्सराओं के नृत्य की कल्पना की गयी है। स्वर्ग में वे सारे सुख होंगे जिसकी कल्पना की जा सकती है।

इधर भारत में स्वर्ग के कनसेप्त के बाद एक नया चिंतन सुराज का आया। जिसे गांधी से जोड कर देखा जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने सुराज को राम राज से जोडा और तुलसी के उस पद को अपने चिंतन का आधार बनाया जिसमें तुलसी कहते हैं कि राम राज दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को समाप्त करने वाला राज्य होगा। मार्क्स की परिकल्पना सुराज की परिकल्पना से हट कर है । सुराज में सामंती सोच नहीं है लेकिन वर्ग विहीन राज्य व्यवस्था में सामंती सोच साफ दिखती है। मार्क्स की व्यवस्था को प्राप्त करने का मतलब है एक निहायत फिजूलखर्ची वाली व्यवस्था खडी करना, बावजूद इसके कुछ सिरफिरे चिंतकों ने अपनी पूरी ताकत लगाकर मार्क्स के चिंतन को स्थापित किया है। जिसका परिनाम रूस में तो दिखा ही आज चीन में भी दिख रहा है। आज चीन हो अया फिर अमेरिका या कोई अन्य देश वहां के राज व्यवस्था के चिंतन का आधार मार्क्स का भौतिक चिंतन ही है । कुछ भी कह लें लेकिन आज मार्क्स का चिंतन दुनिया का एक ध्रुव तो हो ही गया है। ईसाइयत अपनी पूरी लडाई हार चुका है। संपूर्ण व्यवस्था के केन्द्र में आज मार्क्स आ गये हैं। जो लोग मार्क्स के चिंतन को समाप्त हो गया मानते हैं वे भ्रम में हैं। अब मार्क्स का चिंतन नये स्वरूप में लोगों के सामने है। मार्क्स का भौतिकवाद और अमेरिका का उत्तरआधुनिकतावाद के आपस में मिल जाने से दुनिया में एक नये युग का श्रीगणेश होने वाला है। यह युग पूरे पूरी सेमेटिक चिंतन के आधार पर खडा होगा। मार्क्स को किसी राज्य व्यवस्थ के केन्द्र में रखकर नहीं देखें। उसके सामाजिक संरचना के चिंतन को देखें तो आज का विश्व मार्क्स के चिंतन का ही विस्तार दिखेगा। सेमेटिक चिंतन को अब इस्लाम या फिर ईसाइत में रूचि नहीं है। ईसाइयत को मार्क्स के चिंतन ने अपने में पचा लिया और अब इस्लाम को निगलने की योजना में है। इस्लाम को अमेरिका और चीन दोनों अपने अपने तरीके से निगल रहा है। समय के साथ इस्लाम और ईसाइयत दोनों एक ही खोल में समा जाएगंगा और तीन बातों सामने आगएी पहला पीछे कुछ भी नहीं है, दूसरा संघर्ष करना है और तीसरा यह भौतिक संसार तथा अपना शरीर ही सब कुछ है। वही टिकेगा जो संघर्ष में रहेगा। इस प्रकार के चिंतन का स्वरूप व्यापक होने वाला है।

इसलिए जो लोग इस्लाम, ईसाइयत और साम्याद को अलग अलग करके देखते हैं वे भ्रम में जी रहे हैं। इन तीनों को एक ही चिंतन ने खडा किया है। और इन तीनों की मान्यता एक जैसी है। इस्लाम में एक भगवान की कल्पना है। ईसाइयत में भी एक ही भगवान की कल्पना है। मार्क्स का चिंतन कहने के लिए निरिश्वरवादी है लेकिन एक शक्ति में वह भी विश्वास करता है। ईसाई, इस्लाम और मार्क्सवादी अपने पुराने पहचान को मिटाना चाहते हैं। विखंडन और संघर्ष में तीनों विश्वास करते हैं। तीनों के पास एक एक कानून की संहिता है तथा सिध्दांतों का एक एक किताब है। तीनों के साथ एक विडंबना यह भी है कि इनके चिंतन का कोई विरोध करे उन्हें बरदास्त नही। वे लोग उसकी हत्या तक कर सकते हैं। इस प्रकार ऐसा कहा जा सकता है कि ईसाई, इस्लाम और साम्यवाद, यहूदी सेमेटिक चिंतन का ही तीन फेज है। इन तीनों के अलावे विश्व में आज जो भी दिखता है देर सबेर उसी सेमेटि सागर का अंग बनने वाला है। लेकिन दुनिया कभी विकल्पहीन नहीं हो सकती है। इसलिए दुनिया को विकल्प देने के लिए दुनियाभर के सहअस्तित्ववादियों को आगे गाना चाहिए।

वास्तव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस चिंतन से भी सहमत नहीं हुआ जा सकता है जिसमें परम वैभव और महाशक्ति की कल्पना की गयी है। सच तो यह है कि भारत के लागों को आने वाले समय के 200 सालों में जो मानवता का अहित होने वाला है उससे दुनिया को आगाह करना चाहिए। भारत के पास दुनिया को विकल्प देने की क्षमता है लेकिन उस क्षमता को और ज्यादा परिष्कृत करने की जरूरत है। क्योंकि जब सेमेटिक चिंतन के महासागर में झंझावात पैदा होगा तो उसे बचाने की क्षमता और किसी के पास नहीं होगी। उस झंझावात को शांत करने की ताकत शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु के वंशज के पास ही है। इसलिए विष्णु के वंशजों को जिन्दा रहना जरूरी है।


गौतम चौधरी