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सोमवार, 15 अगस्त 2011

हसन अली को बचाने वाली अदृश्य शक्तियाँ कौन सी हैं…?……

देश की सुप्रीम कोर्ट लगातार कांग्रेस सरकार को फ़टकार पर फ़टकार लगाये जा रही है, लेकिन सुधरना तो दूर, सरकार के कर्ताधर्ता चिकने घड़े की तरह बड़ी बेशर्मी से मुस्करा रहे हैं। ताज़ा मामला हसन अली का है, प्रवर्तन निदेशालय के दस्तावेजों में साफ़ दर्ज है कि हसन अली ने “अज्ञात स्रोतों”(?) से करोड़ों रुपये (डॉलर) स्विटजरलैण्ड की बैंकों में जमा किये हैं, लेकिन मजबूरी में (यानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछवाड़े में डण्डा करने के बाद ही) जब हसन अली (Hasan Ali Khan) पर कार्रवाई करने की नौबत आई तो सरकारी एजेंसी ऐसा कोई सबूत ही पेश नहीं कर पाई, और अदालत ने हसन अली को सशर्त जमानत पर रिहा कर दिया। हसन अली सिर्फ़ एक-दो दिन के लिये हिरासत में रहा।


जिस व्यक्ति को जरा भी ज्ञान न हो, एकदम बेवकूफ़ हो या एकदम बोदे दिमाग वाला हो… वह भी आँख बन्द करके बता सकता है कि 50,000 करोड़ से अधिक की टैक्स चोरी (Tax Evation by Hasan Ali) करने वाला “सिर्फ़ घोड़े का व्यापारी” या “स्क्रेप आयात करने” वाला नहीं हो सकता। सभी जानते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक पैसा ड्रग्स डीलिंग और हथियारों के सौदे की कमीशनखोरी में है। जब बोफ़ोर्स जैसा सिर्फ़ 64 करोड़ का सौदा क्वात्रोच्ची को मालामाल कर देता है तो आजकल अरबों के जो सौदे होते हैं उसमें अदनान खशोगी (Adnan Khashoggi Arms Dealer) जैसे बड़े हथियार डीलरों (कमीशनबाजों) और भारत में उसके एजेण्ट हसन अली और दाऊद जैसे लोग अपने-आप में एक “अर्थव्यवस्था” हैं, और यह राजपाट बगैर उच्च स्तर के राजनैतिक संरक्षण के सम्भव ही नहीं है।

जानते सभी हैं, मानते सभी हैं, लेकिन “ऊपरी दबाव” इतना ज्यादा है कि हसन अली का बाल भी बाँका नहीं हो रहा। यदि जाँच एजेंसियों और आयकर विभाग के पास कोई सबूत नहीं था, तो फ़िर मुम्बई आयकर विभाग ने हसन अली को विदेशी बैंक में खाता रखने और उसे घोषित करने के आरोप में नोटिस क्यों भेजा? और नोटिस भेजा था तो उस पर आगे अमल क्यों नहीं किया गया, आयकर विभाग अब तक क्यों सोता रहा? राज्यसभा में 4 अगस्त 2009 को ही जब सरकार ने लिखित में मान लिया था कि हसन अली 50,0000 करोड़ का देनदार है, तो पिछले 2 साल में मनमोहन सिंह-प्रणब मुखर्जी-चिदम्बरम-मोंटेक सिंह वगैरह क्या अब तक तेल बेच रहे थे?

यह विशालतम (और कल्पनातीत) डॉलरों के आँकड़े और कारनामे तो हम आज की तारीख की बात कर रहे हैं, लेकिन हसन अली रातोंरात तो इस स्तर पर पहुँचा नहीं होगा। सीढ़ी-दर-सीढ़ी राजनेताओं, अफ़सरों और व्यवस्था को पुचकारते-लतियाते-जुतियाते ही यहाँ तक पहुँचा होगा। सवाल उठता है कि उसके पिछले अपराधों पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? हसन अली खान को उसकी युवावस्था में बचाने वाले नेता और अफ़सर कौन-कौन हैं? आईये देखते हैं हसन अली के पुराने कारनामों को -


हसन अली का बाप आबकारी अधिकारी था, हैदराबाद (Hyderabad India) के मुशीराबाद इलाके के इस परिवार में हसन अली का एक भाई और चार बहनें हैं। हसन अली ने शुरुआत में कबाड़ खरीदने-बेचने से शुरुआत की, फ़िर वह पुरातत्व की वस्तुओं और मूर्तियों के निर्यात के बिजनेस में उतरा (गजब का संयोग है कि सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा भी इसी धंधे में हैं, और सोनिया गाँधी के परिवार के भी इटली में शो-रुम हैं जो “एंटीक” वस्तुओं का आयात-निर्यात करते हैं)। खैर… हसन अली हैदराबाद से पुणे चला गया और वहाँ घोड़ों को खरीदने-बेचने-ट्रेनिंग देने और रेस में पैसा लगाने का धंधा शुरु कर लिया, उसकी दूसरी बीबी (वर्तमान) इस धंधे में उसकी पार्टनर बताई जाती है। जबकि पहली बीबी मेहबूबुन्निसा बेगम अपने दो बेटों के साथ आज भी हैदराबाद के “सुपर-पॉश” बंजारा हिल्स इलाके में रहती है।

(हसन अली के समर्थक(?) और कांग्रेस के चमचे कहेंगे कि इसमें कौन सी बड़ी बात है, कोई भी व्यक्ति कोई सा भी धंधा कर सकता है, जब तक वह कोई गैरकानूनी काम नहीं करता)

लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है, मार्च 1990 में (यानी आज से 21 साल पहले) हैदराबाद के SBI की चारमीनार ब्रांच (Charminar Hyderabad) के मैनेजर ने पुलिस में FIR दर्ज की थी कि हसन अली ने फ़र्जी ड्राफ़्टों की धोखाधड़ी के जरिये 26 लाख रुपये निकाल लिये हैं और चेक बाउंस होने के बावजूद धड़ाधड़ चेक काटता रहा और माल उठाता रहा है। इसी से मिलती-जुलती शिकायत लिखित में हैदराबाद के ANZ Grindlays Bank के मैनेजर ने भी कर रखी है (कोई नहीं जानता कि 21 साल में इस धोखेबाज पर क्या कार्रवाई हुई)

सितम्बर 1991 में केन्द्र सरकार ने “अनोखी”(?) योजना जाहिर की थी कि जितने भी टैक्स चोर हैं, काले धन के मालिक हैं… वे अपनी सम्पत्ति में से 30% टैक्स दे दें तो उनकी सारी सम्पत्ति “सफ़ेद धन” मान ली जायेगी। (Voluntary Disclosure Income Scheme) यानी ऐ टैक्स चोरों, हमारी तो औकात है नहीं कि हम तुम्हें पकड़ सकें, इसलिये आओ और “भीख” में अपने 30% टैक्स का टुकड़ा डाल जाओ और ऐश करो… तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा… (बड़े-बड़े हरामखोर मगरमच्छों को “प्यार से सहलाने” वाली इस अनोखी स्कीम के प्रणेता भी उस वक्त हमारे “ईमानदार बाबू” ही थे… तालियाँ…)। इस स्कीम(?) के दौरान हसन अली ने तीन NRI लोगों, सुरेश मेहता से 10 लाख, राजेश गुप्ता से 6 लाख, एक अन्य राजेश गुप्ता से 36 लाख, टी रामनाथ और पी कोटेश्वर राव से 18 लाख रुपये “सरेण्डर” करवाने का आश्वासन देकर फ़र्जी अन्तर्राष्ट्रीय मनीऑर्डरों को ड्राफ़्ट में बदलकर उन्हें और सरकार को कुल 70 लाख का चूना लगा दिया। हैदराबाद पुलिस ने हसन अली को 1991 और 1992 में दो बार गिरफ़्तार किया था, लेकिन “रहस्यमयी” तरीके से उस पर कोई खास कार्रवाई नहीं हुई।

(VDIS नामक बेशर्म और नपुंसक योजना में 30,000 करोड़ की सम्पत्ति उजागर हुई और सरकार को 7800 करोड़ का राजस्व मिला… लेकिन फ़िर भी कोई सत्ताधीश या वित्तमंत्री शर्म से डूब कर नहीं मरा…)

एक बार हसन अली अपनी माँ की बीमारी का बहाना बनाकर कनाडा भाग गया था, फ़िर हैदराबाद पुलिस इंटरपोल रेडकॉर्नर नोटिस (Interpol Red Corner Notice) के जरिये उसे गिरफ़्तार करवाकर मुम्बई लाई और हैदराबाद ले गई। धोखाधड़ी के उस केस में हसन अली की चार कारें और एक मर्सीडीज़ (उस जमाने में भी मर्सीडीज़ थी उसके पास) जब्त कर लीं। जब केस कोर्ट में आगे बढ़ा तो जिन चारों NRI ने उसके खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज की थी, वे बयान देने भारत ही नहीं आये। फ़िलहाल इस केस की क्या स्थिति है, यह किसी को नहीं पता… लेकिन हैदराबाद पुलिस के अन्दरूनी सूत्रों का कहना है कि मां की बीमारी का सिर्फ़ बहाना था, असल में हसन अली, उन चारों व्यक्तियों को “धमकाने” के लिये ही कनाडा गया था।

हसन अली पर सबसे पुराना केस दर्ज हुआ है 1984 में, जब उसने अपने पड़ोसी डॉक्टर पी निरंजन राव पर एसिड फ़ेंक दिया था। डॉ राव के चेहरे पर 30 टांके आये थे, और पुलिस ने हसन अली को गिरफ़्तार भी किया था… आगे क्या हुआ, पुलिस के रिकॉर्ड से ही गायब है। (यानी कुल मिलाकर हसन अली खानदानी अपराधी लगता है…)

अब जबकि सुप्रीम कोर्ट हसन अली (यानी सरकार के) पीछे पड़ गया है तो ऐसे ही हल्का-पतला मामला बनाकर कोर्ट में पेश किया और सबूत न होने का बहाना बनाकर छुड़वा भी लिया। प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate of India) और आयकर विभाग (Income Tax Department of India) “सबूत नहीं है”, ऐसा कैसे कह सकते हैं… यही आश्चर्य और जाँच का विषय है, क्योंकि जनवरी 2007 में हसन अली के कोरेगाँव (पुणे) स्थित आवास पर छापा मारकर जो दस्तावेज जब्त किये थे, जिनसे साबित होता था कि हसन अली ने 8 बिलियन डालर यूबीएस बैंक (ज्यूरिख) में जमा किये हैं… वे कागज़ कहाँ गये? छापा इसलिये भी मारा गया था कि हसन अली ने 1999 से अब तक आयकर रिटर्न नहीं भरा है… क्या यह सबूत नहीं माना जाता? ऐसे कैसे पिलपिले सबूत लाये और कौन सी मरियल धाराएं लगाईं कि जज ने हसन अली को जमानत दे दी? जबकि साध्वी प्रज्ञा को तो बगैर किसी सबूत के हिरासत में प्रताड़ित कर-करके लगभग मौत के दरवाजे तक पहुँचा दिया है…

किसी आम आदमी को तो कोई भी सरकारी विभाग रगड़कर रख देता है…तो फ़िर हसन अली से उसके घर जाकर पूछताछ क्यों की गई? क्यों नहीं उसे घसीटकर थाने लाये, पिछवाड़ा गरम किया और उसके बाद पूछताछ की? साफ़ है कि आज की तारीख में हसन अली को कोई “अदृश्य शक्ति” बचा रही है? यदि अभी बचा भी रही है, तो इससे पहले के जो मामले आंध्रप्रदेश (हैदराबाद) में उस पर दर्ज हुए, उस वक्त किस शक्ति ने उसे बचाया? क्योंकि आंध्रप्रदेश में भी तो अधिकतर समय कांग्रेस की ही सरकार रही है, क्या YSR ने? या चंद्रबाबू ने? या फ़िर केन्द्र सरकार के “आर्थिक विशेषज्ञों” ने? या केन्द्र सरकार से भी ऊपर की किसी विशिष्ट अज्ञात शक्ति ने?

जब बाबा रामदेव चार-पाँच सवाल पूछते हैं तो दिग्गी राजा और कांग्रेस के “पालतू भड़ैती मीडियाई” तुरन्त बाबा रामदेव से हिसाब-किताब माँगने लगते हैं, उनके खिलाफ़ किस्से-कहानियाँ छापने लगते हैं, उल्टा-सीधा बकने लगते है, ये और बात है कि हसन अली से हिसाब माँगने और उसके “ऊँचे सम्बन्धों” की तहकीकात करने की औकात किसी भी मीडिया हाउस की नहीं है, क्योंकि दरवाजे पर खड़ा कुत्ता हड्डी की आस में सिर्फ़ पूँछ हिला सकता है, मालिक पर भौंक नहीं सकता…
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Suresh Chiplunkar

सम्पत्ति का हिसाब माँगने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है…(सन्दर्भ :- राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन)......

जब से बाबा रामदेव और अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के नाम पर कांग्रेस की नाक में दम करना शुरु किया है, तभी से बाबा रामदेव कांग्रेस के विभिन्न मंत्रियों के निशाने पर हैं। आये दिन उन्हें “व्यापारी”, “ढोंगी”, “भ्रष्ट”, “ठग” इत्यादि विशेषणों से नवाज़ा जा रहा है। कांग्रेस के इस खेल में मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और स्वयंभू बड़े पत्रकारों का वह दल भी शामिल है जिन्हें नियमित रूप से कांग्रेस द्वारा “हफ़्ता” पहुँचाया जाता है, कभी कागज के कोटे के रूप में, कभी प्रेस के लिये मुफ़्त (या सस्ती) जमीन के रूप में तो कभी “हो रहा भारत निर्माण…” के विज्ञापनों के नाम पर…


बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट (Bharat Swabhiman Trust) और दिव्य योगपीठ (Divya Yog Mandir) के हिसाब-किताब और आय-व्यय का ब्यौरा माँगने में यह स्वनामधन्य और कथित “खोजी पत्रकार”(?) सबसे आगे रहे। इन पत्रकारों की “स्वामिभक्ति” को देखते हुए बाबा रामदेव ने अपने ट्रस्ट की सम्पत्ति घोषित कर दी, साथ ही यह भी बता दिया कि अन्य सभी जानकारी रजिस्ट्रार के दफ़्तर, आयकर विभाग एवं अन्य सभी सरकारी विभागों से प्राप्त की जा सकती है। ये बात और है कि “खोजी पत्रकारों” की, उन दफ़्तरों में जाकर कुछ काम-धाम करने की मंशा कभी नहीं थी, उनका असली काम था “कीचड़ उछालना”, “बदनाम करना” और “सनसनी फ़ैलाना”, इन तीनों कामों में बड़े-बड़े पत्रकार अपने करियर के शुरुआती दिनों से ही माहिर रहे हैं और उन्होंने अपने “मालिक” पर हुए हमले का करारा जवाब बाबा रामदेव को दिया भी… ठीक उसी प्रकार, जैसे उनके मालिक को जूता दिखाने भर से गुलामों ने उस बेचारे की धुनाई कर दी, जो बेचारा चाहता तो उतने समय में चार जूते मार भी सकता था। ऐसी प्रेस कान्फ़्रेंसों में अक्सर “गुलामों” को ही आगे-आगे बैठाया जाता है ताकि “असुविधाजनक” प्रश्नों को सफ़ाई से टाला (टलवाया) जा सके…।

खैर… बात हो रही थी सम्पत्ति का हिसाब माँगने की…। शायद इन बड़े पत्रकारों और स्वनामधन्य “सबसे तेज” चैनलों को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे कभी यह पता लगाएं कि आज की तारीख में सोनिया गाँधी कितने फ़ाउण्डेशनों, कितने ट्रस्टों, कितने फ़ण्डों की अध्यक्ष, “मानद अध्यक्ष”(?), “ट्रस्टी”, “बोर्ड सदस्य” अथवा लाभान्वितों में हैं। सोनिया गाँधी के “निजी मनोरंजन क्लब” (यानी National Advisory Commission – NAC) में जो एक से बढ़कर एक “NGO धुरंधर” बैठे हैं, कभी उनकी सम्पत्ति और उन्हें मिलने वाले देशी-विदेशी अनुदानों के बारे में जानकारी निकालें, तो आँखें फ़ट जाएंगी, दिमाग हिल जाएगा और कलेजा अन्दर धँस जाएगा। इन पत्रकारों(?) ने कभी यह जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि सोनिया गाँधी “अप्रत्यक्ष रूप से” उनमें से कितने NGOs की मालकिन हैं, उन NGOs की सम्पत्ति कितनी है, उन्हें कितना सरकारी अनुदान, कितना निजी अनुदान और कितना विदेशी अनुदान प्राप्त होता है? लेकिन बाबा रामदेव की सम्पत्ति के बारे में चिल्लाचोट करना उनका फ़र्ज़ बनता था…

ऐसा नहीं है कि किसी ने भी सोनिया गाँधी के “मालिकाना हक” वाले इन फ़ाउण्डेशनों और ट्रस्टों के हिसाब-किताब और सम्पत्ति के बारे में जानने की कोशिश नहीं की। सूचना का अधिकार से सम्बन्धित बहुत से स्वयंसेवी समूहों, कुछ “असली खोजी पत्रकारों” एवं कुछ स्वतन्त्र पत्रकारों ने कोशिश की। परन्तु आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पिछले 3-4 साल से “माथाफ़ोड़ी” करने के बावजूद अभी तक कोई खास जानकारी नहीं मिल सकी, कारण – केन्द्रीय सूचना आयुक्त ने यह निर्णय दिया है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन (Rajiv Gandhi Foundation) तथा जवाहरलाल मेमोरियल फ़ण्ड (Jawaharlal Memorial Fund) जैसे संस्थान “सूचना के अधिकार” कानून के तहत अपनी सूचनाएं देने के लिये बाध्य नहीं हैं। मामला अभी भी हाइकोर्ट तक पहुँचा है और RTI के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने “सूचना आयुक्त के अड़ियल रवैये” के बावजूद हार नहीं मानी है। RGF के बारे में सूचना का अधिकार माँगने पर अधिकारी ने यह जवाब देकर आवेदनकर्ता को टरका दिया कि “राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन सूचना देने के लिये बाध्य नहीं है। यह फ़ाउण्डेशन एक “सार्वजनिक उपक्रम” नहीं माना जा सकता, क्योंकि इस फ़ाउण्डेशन को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलता है, न ही सरकार की इसमें कोई भागीदारी है और न ही इसके ट्रस्टी बोर्ड के चयन/नियुक्ति में सरकार का कोई दखल होता है… अतः इसे सूचना का अधिकार के कार्यक्षेत्र से बाहर रखा जाता है…”।

उल्लेखनीय है कि 21 जून 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री के “आदर्शों एवं सपनों”(?) को साकार रूप देने तथा देशहित में इसका लाभ बच्चों, महिलाओं एवं समाज के वंचित वर्ग तक पहुँचाने के लिये राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन की स्थापना की गई थी।

RTI कार्यकर्ता श्री षन्मुगा पात्रो ने सिर्फ़ इतना जानना चाहा था कि RGF द्वारा वर्तमान में कितने प्रोजेक्ट्स और कहाँ-कहाँ पर जनोपयोगी कार्य किया जा रहा है? परन्तु श्री पात्रो को कोई जवाब नहीं मिला, तब उन्होंने सूचना आयुक्त के पैनल में अपील की। आवेदन पर विचार करने बैठी आयुक्तों की पूर्ण बेंच, जिसमें एमएम अंसारी, एमएल शर्मा और सत्यानन्द मिश्रा शामिल थे, ने इस बात को स्वीकार किया कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन (RGF) की कुल औसत आय में केन्द्र सरकार का हिस्सा 4% से कम है, लेकिन फ़िर भी इसे “सरकारी अनुदान प्राप्त” संस्था नहीं माना जा सकता। इस निर्णय के जवाब में अन्य RTI कार्यकर्ताओं ने तर्क दिया कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन की स्थापना की घोषणा केन्द्र सरकार के वित्त मंत्री द्वारा बजट भाषण में की गई थी। सरकार ने इस फ़ाउण्डेशन के समाजसेवा कार्यों के लिये अपनी तरफ़ से एक फ़ण्ड भी स्थापित किया था। इसी प्रकार राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन जिस इमारत से अपना मुख्यालय संचालित करता है वह भूमि भी उसे सरकार द्वारा कौड़ियों के मोल भेंट की गई थी। शहरी विकास मंत्रालय ने 28 दिसम्बर 1995 को इस फ़ाउण्डेशन के सेवाकार्यों(?) को देखते हुए जमीन और पूरी बिल्डिंग मुफ़्त कर दी, जबकि आज की तारीख में इस इमारत के किराये का बाज़ार मूल्य ही काफ़ी ज्यादा है, क्या इसे सरकारी अनुदान नहीं माना जाना चाहिये? परन्तु यह तर्क और तथ्य भी “खारिज” कर दिया गया।

इस सम्बन्ध में यह सवाल भी उठता है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को तो सरकार से आर्थिक मदद, जमीन और इमारत मिली है, फ़िर भी उसे सूचना के अधिकार के तहत नहीं माना जा रहा, जबकि ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर ऐसी कई सहकारी समितियाँ हैं जो सरकार से फ़ूटी कौड़ी भी नहीं पातीं, फ़िर भी उन्हें RTI के दायरे में रखा गया है। यहाँ तक कि कुछ पेढ़ियाँ और समितियाँ तो आम जनता से सीधा सम्बन्ध भी नहीं रखतीं फ़िर भी वे RTI के दायरे में हैं, लेकिन राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन नहीं है। क्या इसलिये कि यह फ़ाउण्डेशन देश के सबसे “पवित्र परिवार”(???) से सम्बन्धित है?

1991 में राजीव गाँधी के निधन के पश्चात तत्कालीन उपराष्ट्रपति ने राजीव गाँधी के सपनों को साकार करने और लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये एक ट्रस्ट के गठन का प्रस्ताव दिया और जनता से इस ट्रस्ट को मुक्त-हस्त से दान देने की अपील की। 1991-92 के बजट भाषण में वित्तमंत्री ने इसकी घोषणा की और इस फ़ाउण्डेशन को अनुदान के रूप में 100 करोड़ रुपये दिये (1991 के समय के 100 करोड़, अब कितने हुए?)। इसी प्रकार के दो ट्रस्टों (फ़ण्ड) की स्थापना, एक बार आज़ादी के तुरन्त बाद 24 जनवरी 1948 को नेहरु ने “नेशनल रिलीफ़ फ़ण्ड” का गठन किया था तथा दूसरी बार चीन युद्ध के समय 5 नवम्बर 1962 को “नेशनल डिफ़ेंस फ़ण्ड” की स्थापना भी संसद में बजट भाषण के दौरान ही की गई और इसमें भी सरकार ने अपनी तरफ़ से कुछ अंशदान मिलाया और बाकी का आम जनता से लिया गया। आश्चर्य की बात है कि उक्त दोनों फ़ण्ड, अर्थात नेशनल रिलीफ़ फ़ण्ड और नेशनल डिफ़ेंस फ़ण्ड को “सार्वजनिक हित” का मानकर RTI के दायरे में रखा गया है, परन्तु राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को नहीं…।

राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को सरकार द्वारा नाममात्र के शुल्क पर 9500 वर्ग फ़ीट की जगह पर एक बंगला, दिल्ली के राजेन्द्र प्रसाद रोड पर दिया गया है। इस बंगले की न तो लाइसेंस फ़ीस जमा की गई है, न ही इसका कोई प्रापर्टी टैक्स भरा गया है। RGF को 1991 से ही FCRA (विदेशी मुद्रा विनियमन कानून 1976) के तहत छूट मिली हुई है, एवं इस फ़ाउण्डेशन को दान देने वालों को भी आयकर की धारा 80G के तहत छूट मिलती है, इसी प्रकार इस फ़ाउण्डेशन के नाम तले जो भी उपकरण इत्यादि आयात किये जाते हैं उन्हें भी साइंस एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च संगठन (SIRO) के तहत 1997 से छूट मिलती है एवं उस सामान अथवा उपकरण की कीमत पर कस्टम्स एवं सेण्ट्रल एक्साइज़ ड्यूटी में छूट का प्रावधान किया गया हैआखिर इतनी मेहरबानियाँ क्यों?

हालांकि गत 4 वर्ष के संघर्ष के पश्चात अब 2 मई 2011 को दिल्ली हाइकोर्ट ने इस सिलसिले में केन्द्र सरकार को नोटिस भेजकर पूछा है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन को RTI के दायरे में क्यों न लाया जाए? उल्लेखनीय है कि हाल ही में मुम्बई में रिलायंस एनर्जी को भी RTI के दायरे में लाया गया है, इसके पीछे याचिकाकर्ताओं और आवेदन लगाने वालों का तर्क भी वही था कि चूंकि रिलायंस एनर्जी (Reliance Energy), आम जनता से सम्बन्धित रोजमर्रा के काम (बिजली सप्लाय) देखती है, इसे सरकार से अनुदान भी मिलता है, इसे सस्ती दरों पर ज़मीन भी मिली हुई है… तो यह जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिये। अन्ततः महाराष्ट्र सरकार ने जनदबाव में रिलायंस एनर्जी को RTI के दायरे में लाया, अब देखना है कि राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन और इस जैसे तमाम ट्रस्ट, जिस पर गाँधी परिवार कुण्डली जमाए बैठा है, कब RTI के दायरे में आते हैं। जब राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन सारी सरकारी मेहरबानियाँ, छूट, कर-लाभ इत्यादि ले ही रहा है तो फ़िर सूचना के अधिकार कानून के तहत सारी सूचनाएं सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों?

बाबा रामदेव के पीछे तो सारी सरकारी एजेंसियाँ हाथ-पाँव-मुँह धोकर पड़ गई थीं, क्या राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन, जवाहरलाल मेमोरियल ट्रस्ट इत्यादि की आज तक कभी किसी एजेंसी ने जाँच की है? स्वाभाविक है कि ऐसा सम्भव ही नहीं है… क्योंकि जहाँ एक ओर दूसरों की सम्पत्ति का हिसाब मांगने का अधिकार सिर्फ़ कांग्रेस को है… वहीं दूसरी ओर अपनी सम्पत्ति को कॉमनवेल्थ, आदर्श, 2G और KG गैस बेसिन जैसे "पुण्य-कार्यों" के जरिये ठिकाने लगाने का अधिकार भी उसी के पास सुरक्षित है… पिछले 60 वर्षों से…
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नोट :-
1) यह बात भी देखने वाली है कि बाबा रामदेव ने अपने कितने रिश्तेदारों को अपने ट्रस्ट में जोड़ा और लाभान्वित किया और राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन जैसे ट्रस्टों से गाँधी परिवार के कितने रिश्तेदार जुड़े और लाभान्वित हुए…

2) हाल ही में 8 जून से 11 जून 2011 तक गाँधी परिवार के सभी प्रमुख सदस्य, श्री सुमन दुबे एवं राजीव गाँधी फ़ाउण्डेशन के कुछ अन्य सदस्य स्विटज़रलैण्ड की यात्रा पर गये थे, जिनमें से कुछ ने खुद को "फ़ाइनेंशियल एडवाइज़र" घोषित किया था… है ना मजेदार बात?

3) श्री सुमन दुबे के पारिवारिक समारोह में शामिल होने ही राहुल गाँधी केरल गये थे जहाँ उन्हें सबरीमाला मन्दिर में हुई भगदड़ की सूचना मिली थी, लेकिन घायलों/मृतकों को देखने जाने की बजाय युवराज छुट्टी मनाने का आनन्द लेते रहे थे…

Suresh Chiplunkar

हिन्दू मन्दिरों को “सेकुलर लूट” से बचाने हेतु सुप्रीम कोर्ट को कुछ सुझाव…

यदि आप सोचते हैं कि मन्दिरों में दान किया हुआ, भगवान को अर्पित किया हुआ पैसा, सनातन धर्म की बेहतरी के लिए, हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए काम आ रहा है तो आप निश्चित ही बड़े भोले हैं। मन्दिरों की सम्पत्ति एवं चढ़ावे का क्या और कैसा उपयोग किया जाता है पहले इसका एक उदाहरण देख लीजिये, फ़िर आगे बढ़ेंगे-

कर्नाटक सरकार के मन्दिर एवं पर्यटन विभाग (राजस्व) द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार 1997 से 2002 तक पाँच साल में कर्नाटक सरकार को राज्य में स्थित मन्दिरों से “सिर्फ़ चढ़ावे में” 391 करोड़ की रकम प्राप्त हुई, जिसे निम्न मदों में खर्च किया गया-

1) मन्दिर खर्च एवं रखरखाव – 84 करोड़ (यानी 21.4%)
2) मदरसा उत्थान एवं हज – 180 करोड़ (यानी 46%)
3) चर्च भूमि को अनुदान – 44 करोड़ (यानी 11.2%)
4) अन्य - 83 करोड़ (यानी 21.2%)
कुल 391 करोड़

जैसा कि इस हिसाब-किताब में दर्शाया गया है उसको देखते हुए “सेकुलरों” की नीयत बिलकुल साफ़ हो जाती है कि मन्दिर की आय से प्राप्त धन का (46+11) 57% हिस्सा हज एवं चर्च को अनुदान दिया जाता है (ताकि वे हमारे ही पैसों से जेहाद, धार्मिक सफ़ाए एवं धर्मान्तरण कर सकें)। जबकि मन्दिर खर्च के नाम पर जो 21% खर्च हो रहा है, वह ट्रस्ट में कुंडली जमाए बैठे नेताओं व अधिकारियों की लग्जरी कारों, मन्दिर दफ़्तरों में AC लगवाने तथा उनके रिश्तेदारों की खातिरदारी के भेंट चढ़ाया जाता है। उल्लेखनीय है कि यह आँकड़े सिर्फ़ एक राज्य (कर्नाटक) के हैं, जहाँ 1997 से 2002 तक कांग्रेस सरकार ही थी…

अब सोचिए कि 60-65 साल के शासन के दौरान कितने राज्यों में कांग्रेस-वामपंथ की सरकारें रहीं, वहाँ कितने प्रसिद्ध मन्दिर हैं, कितने देवस्थान बोर्ड एवं ट्रस्ट हैं तथा उन बोर्डों एवं ट्रस्टों में कितने कांग्रेसियों, गैर-हिन्दुओं, “सो कॉल्ड” नास्तिकों की घुसपैठ हुई होगी और उन्होंने हिन्दुओं के धन व मन्दिर की कितनी लूट मचाई होगी। लेकिन चूंकि हिन्दू आबादी का एक हिस्सा इन बातों से अनभिज्ञ है…, एक हिस्सा मूर्ख है…, एक हिस्सा “हमें क्या लेना-देना यार, हम तो श्रद्धा से मन्दिर में चढ़ावा देते हैं और फ़िर पलटकर नहीं देखते, कि उन पैसों का क्या हो रहा है…” किस्म के आलसी हैं, जबकि “हिन्दू सेकुलरों” का एक बड़ा हिस्सा तो है ही, जिसे आप विभीषण, जयचन्द, मीर जाफ़र चाहे जिस नाम से पुकार लीजिए। यानी गोरी-गजनवी-क्लाइव तो चले गए, लेकिन अपनी “मानस संतानें” यहीं छोड़े गए, कि बेटा लूटो… हिन्दू मन्दिर होते ही हैं लूटने के लिए…। पद्मनाभ मन्दिर (Padmanabh Swamy Temple) की सम्पत्ति की गणना, देखरेख एवं कब्जा चूंकि सुप्रीम कोर्ट के अधीन एवं उसके निर्देशों के मुताबिक चल रहा है इसलिए अभी सब लोग साँस रोके देख रहे हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने इस खजाने की रक्षा एवं इसके उपयोग के बारे में सुझाव माँगे हैं। सेकुलरों एवं वामपंथियों के बेहूदा सुझाव एवं उसे “काला धन” बताकर सरकारी जमाखाने में देने सम्बन्धी सुझाव तो आ ही चुके हैं, अब कुछ सुझाव इस प्रकार भी हैं –

1) सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक “हिन्दू मन्दिर धार्मिक सम्पत्ति काउंसिल” का गठन किया जाए। इस काउंसिल में सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान, दो निवृत्त न्यायाधीश, एवं सभी प्रमुख हिन्दू धर्मगुरु शामिल हों। इस काउंसिल में पद ग्रहण करने की शर्त यह होगी कि सम्बन्धित व्यक्ति न पहले कभी चुनाव लड़ा हो और न काउंसिल में शामिल होने के बाद लड़ेगा (यानी राजनीति से बाहर)। इस काउंसिल में अध्यक्ष एवं कोषाध्यक्ष का पद त्रावणकोर के राजपरिवार के पास रहे, क्योंकि 250 वर्ष में उन्होंने साबित किया है कि खजाने को खा-पीकर “साफ़” करने की, उनकी बुरी नीयत नहीं है।

2) इस काउंसिल के पास सभी प्रमुख हिन्दू मन्दिरों, उनके शिल्प, उनके इतिहास, उनकी संस्कृति के रखरखाव, प्रचार एवं प्रबन्धन का अधिकार हो।

3) इस काउंसिल के पास जो अतुलनीय और अविश्वसनीय धन एकत्रित होगा वह वैसा ही रहेगा, परन्तु उसके ब्याज से सभी प्रमुख मन्दिरों की साज-सज्जा, साफ़-सफ़ाई एवं प्रबन्धन किया जाएगा।

4) इस विशाल रकम से प्रतिवर्ष 2 लाख हिन्दुओं को (रजिस्ट्रेशन करवाने पर) अमरनाथ, वैष्णो देवी, गंगासागर, सबरीमाला, मानसरोवर (किसी एक स्थान) अथवा किसी अन्य स्थल की धार्मिक यात्रा मुफ़्त करवाई जाएगी। एक परिवार को पाँच साल में एक बार ही इस प्रकार की सुविधा मिलेगी। देश के सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों पर काउंसिल की तरफ़ से सर्वसुविधायुक्त धर्मशालाएं बनवाई जाएं, जहाँ गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी धार्मिक यात्रा में तीन दिन तक मुफ़्त रह-खा सके।

5) इसी प्रकार पुरातात्विक महत्व के किलों, प्राचीन स्मारकों के आसपास भी “सिर्फ़ हिन्दुओं के लिए” इसी प्रकार की धर्मशालाएं बनवाई जाएं जिनका प्रबन्धन काउंसिल करेगी।

6) नालन्दा एवं तक्षशिला जैसे 50 विश्वविद्यालय खोले जाएं, जिसमें भारतीय संस्कृति, भारतीय वेदों, भारत की महान हिन्दू सभ्यता इत्यादि के बारे में विस्तार से शोध, पठन, लेखन इत्यादि किया जाए। यहाँ पढ़ने वाले सभी छात्रों की शिक्षा एवं आवास मुफ़्त हो।

ज़ाहिर है कि ऐसे कई सुझाव माननीय सुप्रीम कोर्ट को दिये जा सकते हैं, जिससे हिन्दुओं द्वारा संचित धन का उपयोग हिन्दुओं के लिए ही हो, सनातन धर्म की उन्नति के लिए ही हो, न कि कोई सेकुलर या नास्तिक इसमें “मुँह मारने” चला आए। हाल के कुछ वर्षों में अचानक हिन्दू प्रतीकों, साधुओं, मन्दिरों, संस्कृति इत्यादि पर “सरकारी” तथा “चमचात्मक” हमले होने लगे हैं। ताजा खबर यह है कि उड़ीसा की “सेकुलर” सरकार, पुरी जगन्नाथ मन्दिर के अधीन विभिन्न स्थानों पर जमा कुल 70,000 एकड़ जमीन “फ़ालतू” होने की वजह से उसका अधिग्रहण करने पर विचार कर रही है। स्वाभाविक है कि इस जमीन का “सदुपयोग”(?) फ़र्जी नेताओं के पुतले लगाने, बिल्डरों से कमाई करने, दो कमरों में चलने वाले “डीम्ड” विश्वविद्यालयों को बाँटने अथवा नास्तिकों, गैर-हिन्दुओं एवं सेकुलरों की समाधियों में किया जाएगा…। भारत में “ज़मीन” का सबसे बड़ा कब्जाधारी “चर्च” है, जिसके पास सभी प्रमुख शहरों की प्रमुख जगहों पर लाखों वर्गमीटर जमीन है, परन्तु सरकार की नज़र उधर कभी भी नहीं पड़ेगी, क्योंकि कांग्रेस के अनुसार “सफ़ेद” और “हरा” रंग पवित्रता और मासूमियत का प्रतीक है, जबकि “भगवा” रंग आतंकवाद का…।

जब से केरल के स्वामी पद्मनाभ मन्दिर के खजाने के दर्शन हुए हैं, तमाम सेकुलरों एवं वामपंथियों की नींद उड़ी हुई है, दिमाग पर बेचैनी तारी है, दिल में हूक सी उठ रही है और छाती पर साँप लोट रहे हैं। पिछले 60 साल से लगातार हिन्दुओं के विरुद्ध “विष-वमन” करने एवं लगातार हिन्दू धर्म व भारतीय संस्कृति को गरियाने-धकियाने-दबाने के बावजूद सनातन धर्म की पताका विश्व के कई देशों में फ़हरा रही है, बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में मन्दिर से निकले इस खजाने ने मानो सेकुलर-वामपंथी सोच के जले पर नमक छिड़क दिया है।

हिन्दू तो पहले से ही जानते हैं कि मन्दिरों में श्रद्धापूर्वक भगवान को अर्पित किया हुआ टनों से सोना-जवाहरात मौजूद है, इसलिए हिन्दुओं को पद्मनाभ स्वामी मन्दिर की यह सम्पत्ति देखकर खास आश्चर्य नहीं हुआ, परन्तु “कु-धर्मियों” के पेट में दर्द शुरु हो गया। हिन्दुओं द्वारा अर्पित, हिन्दू राजाओं एवं पुजारियों-मठों द्वारा संचित और संरक्षित इस सम्पत्ति को सेकुलर तरीके से “ठिकाने लगाने” के सुझाव भी आने लगे हैं, साथ ही इस सम्पत्ति को “काला धन” (Black Money in India) बताने के कुत्सित प्रयास भी जारी हैं। एक हास्यास्पद एवं मूर्खतापूर्ण बयान में केरल के एक वामपंथी नेता ने, इस धन को मुस्लिम और ईसाई राजाओं से लूटा गया धन भी बता डाला…

अतः इस लेख के माध्यम से मैं सुप्रीम कोर्ट से अपील करता हूँ कि वह “स्वयं संज्ञान” लेते हुए ताजमहल के नीचे स्थित 22 सीलबन्द कमरों को खोलने का आदेश दे, जिसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो ताकि पता चले कि कहीं शाहजहाँ और मुमताज सोने की खदान पर तो आराम नहीं फ़रमा रहे? इन सीलबन्द कमरों को खोलने से यह भी साफ़ हो जाएगा कि क्या वाकई ताजमहल एक हिन्दू मन्दिर था? इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करके यह माँग भी की जाना चाहिए कि ज्ञानवापी मस्जिद के नीचे, अजमेर दरगाह के नीचे एवं गोआ के विशाल चर्चों तथा केरल के आर्चबिशपों के भव्य मकानों की भी गहन जाँच और खुदाई की जाए ताकि जो सेकुलर-वामपंथी हिन्दू मन्दिरों के खजाने पर जीभ लपलपा रहे हैं, वे भी जानें कि “उधर” कितना “माल” भरा है। हिन्दुओं एवं उनके भगवान के धन पर बुरी नज़र रखने वालों को संवैधानिक एवं कानूनी रूप से सबक सिखाया जाना अति-आवश्यक है… वरना आज पद्मनाभ मन्दिर का नम्बर आया है, कल भारत के सभी मन्दिर इस “सेकुलर-वामपंथी” गोलाबारी की रेंज में आ जाएंगे…

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चलते-चलते :-

पद्मनाभ मन्दिर की सम्पत्ति को लेकर कई तरह के "विद्वत्तापूर्ण सुझाव" आ रहे हैं कि इस धन से भारत के गरीबों की भलाई होना चाहिए, इस धन से जनकल्याण के कार्यक्रम चलाए जाएं, बेरोजगारी दूर करें, सड़कें-अस्पताल बनवाएं… इत्यादि। यानी यह कुछ इस तरह से हुआ कि परिवार के परदादा द्वारा गाड़ी गई तिजोरी खोलने पर अचानक पैसा मिला, तो उसमें से कुछ "दारुकुट्टे बेटे" को दे दो, थोड़ा सा "जुआरी पोते" को दे दो, एक हिस्सा "लुटेरे पड़पोते" को दे दो… बाकी का बैंक में जमा कर दो, जब मौका लगेगा तब तीनों मिल-बाँटकर "जनकल्याण"(?) हेतु खर्च करेंगे … :) :)। जबकि "कुछ सेकुलर विद्वान" तो पद्मनाभ मन्दिर की सम्पत्ति को सीधे "काला धन" बताने में ही जुट गए हैं ताकि उनके 60 वर्षीय शासनकाल के "पाप" कम करके दिखाए जा सकें…। ये वही लोग हैं जिन्हें "ए. राजा" और "त्रावणकोर के राजा" के बीच अन्तर करने की तमीज नहीं है…

Suresh Chiplunkar

दयानिधि मारन का “निजी टेलीफ़ोन एक्सचेंज” और मनमोहन का धृत “राष्ट्रवाद…

भारत में मंत्रियों, अफ़सरों एवं उनके रिश्तेदारों द्वारा सरकारी संसाधनों का स्वयं के लिये उपयोग एवं दुरुपयोग एक आम बीमारी बन चुकी है। सरकारी दफ़्तर में काम करने वाले बाबू द्वारा बच्चों के लिए कागज घर ले जाना हो या नागर-विमानन मंत्री द्वारा इंडियन एयरलाइंस के विमानों को अपने बाप की जागीर समझना हो, यह बीमारी नीचे से ऊपर तक फ़ैली हुई है। मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल के पहले पाँच साल “ईमानदार बाबू” की अपनी छवि गढ़ी, जिसके अनुसार चाहे जितने मंत्री भ्रष्ट हो जाएं, लेकिन मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) तो “ईमानदार” हैं… लेकिन यूपीए-2 के दूसरे कार्यकाल के दो साल के भीतर ही अब मनमोहन सिंह कभी बेहद मजबूर, तो कभी बेहद शातिर, तो कभी बेहद बहरे, कभी जानबूझकर अनजान बनने वाले, तो कभी परले दर्जे के भोले नज़र आये हैं। कलमाडी (Suresh Kalmadi) से लेकर कनिमोझी (Kanimojhi) तक जैसे-जैसे UPA की सड़ांध बाहर आती जा रही है, मनमोहन सिंह की “तथाकथित ईमानदारी” अब अविश्वसनीय और असहनीय होती जा रही है…

ताजा मामला सामने आया है हाल ही में केन्द्रीय मंत्रिमण्डल से बिदा किए गये दयानिधि मारन (Dayanidhi Maran) का। द्रविड मुनेत्र कषघम (DMK) के “पिण्डारी दल” के एक सदस्य दयानिधि मारन ने अपने घर और कम्पनी के दफ़्तर के बीच 323 लाइनों का एक निजी एक्सचेंज ही खोल रखा था। खा गये न झटका??? जी हाँ, ए. राजा से पहले दयानिधि मारन ही “दूध देने वाली गाय समान” टेलीकॉम मंत्रालय में मंत्री थे। यह सभी लाइनें उन्होंने BSNL के अधिकारियों को डपटकर और BSNL के महाप्रबन्धक के नाम से उनकी बाँह मरोड़कर अपने घर और सन टीवी के दफ़्तर में लगवाईं। टेलीकॉम मंत्रालय के मंत्री होने के नाते उन्होंने अपने “अधिकारों”(?) का जमकर दुरुपयोग किया, और मेरा भारत इतना महान है कि चेन्नै में मारन के घर से साढ़े तीन किलोमीटर दूर स्थित सन टीवी के मुख्यालय तक ऑप्टिकल फ़ाइबर के उच्च क्षमता वाली अण्डरग्राउण्ड लाइनें बिछाई गईं, सभी 323 टेलीफ़ोन नम्बर चीफ़ जनरल मैनेजर BSNL के नाम से लिए गये। हैरान हो गए ना??? लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है, भारत में जो मंत्री और जो अफ़सर जिस मंत्रालय या विभाग में जाता है वहाँ वह “जोंक” की तरह उस विभाग और आम जनता का खून चूसने के “पावन कार्य” मे तत्काल लग जाता है।



अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर 323 टेलीफ़ोन लाइनों का मारन ने क्या किया? मारन के चेन्नई स्थित बोट क्लब वाले मकान से जो लाइनें बिछाई गईं, वे सभी ISDN लाइनें थीं। जैसा कि सभी जानते हैं ISDN लाइनें भारी-भरकम डाटा ट्रांसफ़र एवं तीव्रगति के इंटरनेट एवं टीवी सिग्नलों के संचालन में महत्वपूर्ण होती हैं। मारन ने शातिराना अन्दाज़ में शुरु के 23 टेलीफ़ोन नम्बर 24372211 और 24372301 के बीच में से लगवाए, परन्तु शायद बाद में यह सोचकर, कि “मेरा कोई क्या उखाड़ लेगा?” मारन ने अगले 300 टेलीफ़ोन नम्बर 24371500 से 24371799 तक एक ही नाम अर्थात चीफ़ जनरल मैनेजर BSNL के नाम से लगवा डाले, चूंकि सभी नम्बरों के शुरुआती चार अंक समान ही थे, तो मारन के घर और सन टीवी के दफ़्तर के बीच एक निजी टेलीफ़ोन एक्सचेंज आरम्भ हो गया। इसमें फ़ायदा यह था कि BSNL को चूना लगाकर मनचाहा और असीमित डाटा डाउनलोड-अपलोड किया गया एवं सन टीवी के सभी व्यावसायिक एवं आर्थिक कारोबार की सभी संचार व्यवस्था मुफ़्त हासिल की गई। दूसरा फ़ायदा यह था, कि इस निजी एक्सचेंज के कारण टेलीफ़ोन टैपिंग होने का भी कोई खतरा दयानिधि मारन को नहीं रह गया था।

जनवरी 2007 से दयानिधि मारन ने BSNL को “दुहना” शुरु किया और सन टीवी के कई कार्यक्रम विदेशों में ISDN लाइन के जरिये मुफ़्त में पहुँचाए। सीबीआई की जाँच में यह बात सामने आई है कि मारन ने अपना यह निजी टेलीफ़ोन एक्सचेंज कुछ इस तरह से डिजाइन और प्रोग्राम किया था कि BSNL महाप्रबन्धक और उच्च स्तरीय इंजीनियरों के अलावा किसी को भी इस बारे में भनक तक नहीं थी, क्योंकि इस एक्सचेंज के निर्माण, टेलीफ़ोन लाइनों को बिछाने, इनका कनेक्शन मुख्य एक्सचेंज में “विशेष राउटरों” के जरिये जोड़ने सम्बन्धी जो भी काम किए गये, इसमें “काम खत्म होते ही” उस कर्मचारी का तबादला चेन्नई से बहुत दूर अलग-अलग जगहों पर कर दिया जाता था। यदि कलानिधि मारन का सन टीवी यही सारी “सेवाएं” BSNL या एयरटेल से पैसा देकर लेता तो उसे करोड़ों रुपए का शुल्क चुकाना पड़ता और हर महीने का तगड़ा बिल आता, सो अलग…। लेकिन “ईमानदार बाबू” के धृतराष्ट्रवादी शासन में हर मंत्री सिर्फ़ चूसने-लूटने-खाने में ही लगा हुआ है तो दयानिधि मारन कैसे पीछे रहते?

(सभी स्नैप शॉट PMO को पेश की गई सीबीआई रिपोर्ट के अंश हैं - साभार श्री एस गुरुमूर्ति)

सीबीआई की प्राथमिक जाँच में एक मोटे अनुमान के अनुसार सिर्फ़ एक टेलीफ़ोन क्रमांक 24371515 से मार्च 2007 (एक महीने में) 48,72,027 कॉल्स (सभी प्रकार का डाटा जोड़ने पर) किए गये। अब आप अनुमान लगाईये कि जब एक टेलीफ़ोन नम्बर से एक महीने में 49 लाख कॉल्स किए गए तो 323 लाइनों से कितने कॉल्स किये गये होंगे? यह सिलसिला जनवरी 2007 से अप्रैल 2007 तक ही चला (क्योंकि 13 मई को मारन ने दूरसंचार मंत्रालय से इस्तीफ़ा दिया)। परन्तु सीबीआई ने जो हिसाब लगाया है उसके अनुसार इस दौरान BSNL को लगभग 630 करोड़ टेलीफ़ोन कॉल्स का चूना लग चुका था, यदि 70 पैसे प्रति कॉल यूनिट भी मानें तो सन टीवी को 440 करोड़ रुपए का टेलीफ़ोन बिल नहीं चुकाना पड़ा, क्योंकि दयानिधि मारन की “दया” दिल्ली से चेन्नै की तरफ़ उमड़-उमड़कर बह रही थी। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में आगे कहा है कि इस “निजी एक्सचेंज” की कुछ लाइनें मारन के अखबार “दिनाकरण” को भी दी गईं, जिसके द्वारा अखबार की रिपोर्टें लाने-भेजने का काम किया जाता था। (दयानिधि मारन जून 2004 से मई 2007 तक दूरसंचार मंत्री रहा, हालांकि जब उसे केन्द्रीय मंत्रिमण्डल से धक्का देकर निकाला गया तब वह कपड़ा मंत्री था, जहाँ पता नहीं उसने देश के कितने कपड़े उतारे होंगे…)

आप सोच रहे होंगे कि आखिर सीबीआई ने यह मामला अपने हाथ में लिया कैसे? असल में दयानिधि मारन से एक गलती हो गई कि उसने अपने ही “अन्नदाता” के परिवार में फ़ूट डालने की हिमाकत कर डाली, हुआ यूँ कि अपने अखबार “दिनाकरण” (Dinakaran) में दयानिधि मारन ने एक सर्वे आयोजित किया कि करुणानिधि के दो बेटों अझागिरि और स्टालिन में कौन अधिक लोकप्रिय है?… बस इसी से नाराज होकर दयानिधि के बाप के मामू यानी करुणानिधि नाराज हो गये और अगले ही दिन उन्हें मंत्रिमण्डल से बाहर का रास्ता दिखाया गया, मारन की जगह ली ए. राजा ने, जो पहले से ही दयानिधि मारन से खार खाए बैठा था… सो उसने “मामू” की आज्ञा से “नीली पगड़ी वाले” से कहकर मारन के खिलाफ़ सीबीआई की जाँच तत्काल शुरु करवा दी…। इस तरह दयानिधि मारन नाम का “ऊँट”, अचानक करुणानिधि नामक पहाड़ के नीचे आ गया…।

अब हम आते हैं अपने “ईमानदार”, “सक्रिय और कार्यशील” इत्यादि सम्बोधनों से नवाज़े गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के “धृतराष्ट्रवाद” पर…। हाल ही में मुम्बई बम विस्फ़ोटों के बाद सोनिया गाँधी के साथ वहाँ दौरे पर गए इन महाशय ने “आतंकवादियों के खिलाफ़ त्वरित कार्रवाई” करने का बयान दिया… (ये और बात है कि इनकी त्वरित कार्रवाई, इतनी त्वरित है कि अभी तक अफ़ज़ल गुरू की मृत्युदण्ड की फ़ाइल गृह मंत्रालय से होकर सिर्फ़ 2 किमी दूर, राष्ट्रपति भवन तक ही नहीं पहुँची है)। यह तो आतंकवाद और अण्डरवर्ल्ड से सम्बन्धित अफ़ज़ल गुरु या दाऊद इब्राहीम से लेकर अबू सलेम या क्वात्रोची और एण्डरसन की सदाबहार कांग्रेसी कहानी है… लेकिन मनमोहन सिंह की यह खूबी है कि वे “आर्थिक आतंकवादियों” को भी भागने, सबूत मिटाने इत्यादि का पूरा मौका देते हैं, जैसे कि कलमाडी और राजा के मामले में हुआ। (ये और बात है कि डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी याचिकाएं लगाकर और सुप्रीम कोर्ट लताड़कर, इनकी बाँह मरोड़कर इनसे काम करवा लेते हैं)।

दयानिधि मारन के खिलाफ़ कार्रवाई की माँग करते हुए सीबीआई ने जाँच की अपनी पूरी रिपोर्ट मनमोहन सिंह को सितम्बर 2007 में सौंप दी थी। लेकिन पिछले 44 महीने से हमारे “ईमानदार बाबू” उस फ़ाइल पर कुण्डली मारे बैठे रहे। इस बीच 2009 के चुनाव में “मामू” करुणानिधि ने अपने बेटों और मारन बन्धुओं के बीच सुलह करवा दी, दयानिधि-कलानिधि ने नानाजी से माफ़ी माँग ली और 2009 के चुनाव में इन्होंने जयललिता को पछाड़कर लोकसभा की 18 सीटों पर कब्जा किया। दयानिधि मारन ने फ़िर से टेलीकॉम मंत्रालय पाने की जुगाड़ लगाई, लेकिन इस बार रतन टाटा ने “व्यक्तिगत” रुचि लेकर मारन की जगह राजा को टेलीकॉम मंत्री बनवाया, सो मजबूरन दयानिधि को कपड़ा मंत्रालय पर संतोष करना पड़ा (यह तथ्य नीरा राडिया और बुरका हसीब दत्त की फ़ोन टैपिंग में उजागर हो चुका है)। जब “परिवार” में ही आपस में सुलह हो गई और DMK के सांसदों की “ईमानदार बाबू” को सख्त आवश्यकता थी, इसलिए CBI की रिपोर्ट और दयानिधि के खिलाफ़ एक्शन लेने की माँग ठण्डे बस्ते में चली गई। नवम्बर 2010 में कपिल सिब्बल के टेलीकॉम मंत्रालय संभालने के बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया।

“ईमानदार बाबू” ने बाबा रामदेव के आंदोलन को कुचलने के बाद कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ़ “गम्भीरता” से और “त्वरित कार्रवाई” करेंगे… सो इनकी “त्वरित कार्रवाई” का आलम यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लिया तब कहीं जाकर 44 माह बाद, सत्ता की मलाई और मंत्रालय को पूरी तरह निचोड़ने के बाद दयानिधि मारन की विदाई की गई। इसमें एक आश्चर्यजनक पहलू यह है कि अपनी “ईमानदार बाबू” वाली छवि बनाए रखने को चिन्तित एवं “भ्रष्टाचार के खिलाफ़ कड़े कदम उठाने” जैसी खोखली घोषणाएं करने वाले मनमोहन सिंह सितम्बर 2007 से अब तक न जाने कितनी बार “केन्द्रीय कैबिनेट” की बैठक में दयानिधि मारन के पड़ोस में बैठे होंगे… क्या उस समय नीली पगड़ी वाले साहब को जरा भी ग्लानि, संकोच या शर्म नहीं आई होगी? आएगी भी कैसे… क्योंकि असल में तो देश का सुप्रीम कोर्ट ही सारे प्रमुख फ़ैसले कर रहा है, माननीय न्यायाधीशों को ही बताना पड़ रहा है कि किसके खिलाफ़ केस शुरु करो, किसे जेल भेजो, किसे पकड़ो, क्या करो, क्या ना करो…। मनमोहन सिंह को तो सिर्फ़ आज्ञा का पालन करना है… सुप्रीम कोर्ट न होता तो राजा-कलमाडी-नीरा राडिया-मारन-कनिमोझि आदि सभी अब तक हमारी छाती पर मूंग दल रहे होते…

Suresh Chiplunkar