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शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

भारत के सरदार

इतिहासकार अक्टूबर की 31 तारीख को सरदार पटेल के जन्मदिवस के रूप में याद रखते हैं। बाद में इसमें इंदिरा गांधी की हत्या का अवसाद भी जुड़ गया। आगामी 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की 135वीं जयंती है और वर्ष 2010 उनकी 60 पुण्यतिथि का वर्ष भी है। आज ऐसे लोग ज्यादा नहीं होंगे, जिन्होंने सरदार पटेल को देखा था।

अगर होंगे भी, जैसे डॉ कर्ण सिंह, तो उनकी उम्र 80 या 90 के ऊपर होगी। हम इफरात से जन्मशतियां मनाते हैं, लेकिन 1975 में सरदार पटेल की जन्मशती तकरीबन चुपचाप गुजर गई। वजह आपातकाल। लेकिन बौद्धिक जड़ता भी एक वजह रही, जो मनुष्य की याददाश्त पर परदा डाल देती है। जड़ता ही नहीं, भाई-भतीजावाद भी।

अक्टूबर माह और वर्ष २क्१क् एक अवसर है कि हम सरदार पटेल का सही आकलन करें, जिनके बारे में राजेंद्र प्रसाद ने कहा था : ‘आज हम जिस भारत के बारे में सोचते और बात करते हैं, उसके निर्माण में सरदार पटेल के राजनीतिक कौशल और प्रशासनिक दृढ़ता का अहम योगदान है।’ पटेल का राजनीतिक जीवन चार दशक लंबा था, लेकिन उनकी ‘प्रशासनिक दृढ़ता’ की अवधि चार वर्ष से अधिक नहीं है।

इसके बावजूद उन चार सालों में भारत निर्माण के लिए जो काम किया गया, वह बाद के सालों में इतनी अवधि में फिर कभी नहीं किया जा सका। सरदार पटेल के जीवन के अंतिम वर्ष १९५क् पर एक नजर डालते हैं। उनके पास दो मंत्रालय थे : गृह और सूचना प्रसारण। साथ ही वे रियासतों के विलय का काम भी देख रहे थे। पटेल के पास जो मंत्रालय थे, वे आज चिदंबरम और अंबिका सोनी के पास हैं, लेकिन फर्क यह है कि पटेल देश के उप प्रधानमंत्री भी थे। फर्क यह भी है कि वे सरदार वल्लभभाई पटेल थे।

जवाहरलाल नेहरू से राजनीतिक मतभेदों में पटेल हावी रहते थे। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पटेल के उम्मीदवार पुरुषोत्तमदास टंडन ने नेहरू समर्थित उम्मीदवार आचार्य कृपलानी को हराया था। राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने कांग्रेस की भावना के अनुरूप राजेंद्र प्रसाद का समर्थन किया और वे ही राष्ट्रपति बने, जबकि नेहरू इस पद पर राजगोपालाचारी को चाहते थे।

राजनीतिक तौर पर देश का एकीकरण करने वाले सरदार पटेल को राष्ट्रीय नायक का दर्जा प्राप्त है। प्रशासनिक तौर पर उन्हें उनकी निर्णय लेने की क्षमता और मितभाषिता के लिए याद रखा जाता है। निजी तौर पर उनकी एकाग्रता और दृढ़ता के लिए उनका सम्मान किया जाता है। उन्हें देखकर हमेशा मन में एक विश्वास पैदा होता था।

यह विश्वास कि देश उनके हाथों में सुरक्षित है। विभिन्न उच्च न्यायालयों के आदेश के तहत देशभर में लगभग दो हजार कम्युनिस्टों की रिहाई के बाद उन्होंने संसद में जो कहा, हम कल्पना कर सकते हैं कि नक्सल समस्या के संबंध में हमारे वर्तमान गृह मंत्री भी वही कहते : ‘हमारी लड़ाई कम्युनिस्टों से नहीं, उन लोगों से है जो विधि द्वारा स्थापित शासन को हिंसा के जरिए उखाड़ फेंकना चाहते हैं.. बहुजन की नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कुछ लोगों की आपराधिक स्वतंत्रता में कतरब्योंत जरूरी है।’

सरदार पटेल की भौगोलिक समझ का कोई सानी नहीं था। १९५क् के उत्तरार्ध में जब तिब्बत में चीन की कारगुजारियां उजागर हुईं, तो उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखा : ‘भारत के रक्षा तंत्र को दो मोर्चो पर एक साथ ध्यान केंद्रित करना होगा। पाकिस्तान के अलावा हमें उत्तर और उत्तरपूर्व में कम्युनिस्ट चीन पर भी नजर रखनी होगी।’ यह आज भी प्रासंगिक है।

तिब्बत मसले पर सरदार पटेल का ऐतिहासिक पत्र

नई दिल्ली
७ नवंबर, १९५०

मेरे प्रिय जवाहरलाल,
चीन सरकार ने हमें अपने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के आंडबर में उलझाने का प्रयास किया है। मेरा यह मानना है कि वह हमारे राजदूत के मन में यह झूठ विश्वास कायम करने में सफल रहे कि चीन तिब्बत की समस्या को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना चाहता है। चीन की अंतिम चाल, मेरे विचार से कपट और विश्र्वासघात जैसा ही है। दुखद बात यह है कि तिब्बतियों ने हम पर विश्र्वास किया है, हम ही उनका मार्गदर्शन भी करते रहे हैं और अब हम ही उन्हें चीनी कूटनीति या चीनी दुर्भाव के जाल से बचाने में असमर्थ हैं। ताजा प्राप्त सूचनाओं से ऐसा लग रहा है कि हम दलाई लामा को भी नहीं निकाल पाएंगे । यह असंभव ही है कि कोई भी संवेदनशील व्यक्ति तिब्बत में एंग्लो-अमेरिकन दुरभिसंधि से चीन के समक्ष उत्पन्न तथाकथित खतरे के बारे में विश्र्वास करेगा।


पिछले कई महीनों से रूसी गुट से परे हम ही केवल अकेले थे जिन्होंने चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता दिलवाने की कोशिश की तथा फारमोसा के प्रश्न पर अमेरिका से कुछ न करने का आश्र्वासन भी लिया।


मुझे इसमें संदेह हैं कि चीन को अपनी सदिच्छाओं, मैत्रीपूर्ण उद्देश्यों और निष्कपट भावनाओं के बारे में बताने के लिए हम जितना कुछ कर चुके हैं, उसमें आगे भी कुछ किया जा सकता है। हमें भेजा गया उनका अंतिम टेलिग्राम घोर अशिष्टता का नमूना है। इसमें न केवल तिब्बत में चीनी सेनाओं के घुसने के प्रति हमारे विरोध को खारिज किया गया है बल्कि परोक्ष रूप से यह गंभीर संकेत भी किया गया है कि हम विदेशी प्रभाव में आकर यह रवैया अपना रहे हैं। उनके टेलिग्राम की भाषा साफ बताती है कि यह किसी दोस्त की नहीं बल्कि भावी शत्रु की भाषा हैं। इस सबके पटाक्षेप में हमें इस नई स्थिति को देखना और संभालना होगा जिसमें तिब्बत के गायब हो जाने के बाद जिसका हमें पता था चीन हमारे दरवाजे तक पहुंच गया है। इतिहास में कभी भी हमें अपनी उत्तर-पूर्वी सीमा की चिंता नहीं हुई है। हिमालय श्रृंखला उत्तर से आने वाले किसी भी खतरे के प्रति एक अभेद्य अवरोध की भूमिका निभाती रही है। तिब्बत हमारे एक मित्र के रूप में था इसलिए हमें कभी समस्या नहीं हुई। हमने तिब्बत के साथ एक स्वतंत्र संधि कर उसकी स्वायत्तता का सम्मान किया है। उत्तर-पूर्वी सीमा के अस्पष्ट सीमा वाले राज्य और हमारे देश में चीन के प्रति लगाव रखने वाले लोग कभी भी समस्या का कारण बन सकते हैं।


चीन की कुदृष्टि हमारी तरफ वाले हिमालयी इलाकों तक सीमित नहीं है, वह असम के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों पर भी नजर गड़ाए हुए है। बर्मा पर भी उसकी नजर है। बर्मा के साथ और भी समस्या है क्योकि उसकी सीमा को निर्धारित करने वाली कोई रेखा नहीं है जिसके आधार पर वह कोई समझौता कर सके। हमारे उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में नेपाल, भूटान, सिक्किम, दार्जिलिंग और असम के आदिवासी क्षेत्र आते हैं। संचार की दृष्टि से उधर हमारे साधन बड़े ही कमजोर व अपर्याप्त है; सो यह क्षेत्र 'कमजोर' है। उधर कोई स्थायी मोर्चे भी नहीं हैं

इसलिए घुसपैठ के अनेकों रास्ते हैं। मेरे विचार से अब ऐसी स्थिति आ गई है कि हमारे पास आतुमसंतुष्ट रहने या आगे-पीछे सोचने का समय नहीं है। हमारे मन में यह स्पष्ट धारणा होनी चाहिए कि हमें क्या प्राप्त करना है और किन साधनों से प्राप्त करना है।


इन खतरों के अलावा हमे गंभीर आंतरिक संकटों का भी सामना करना पड़ सकता है। मैने (एच०वी०आर०) आयंगर को पहले ही कह दिया है कि वह इन मामलों की गुप्तचर रिपोर्टों की एक प्रति विदेश मंत्रालय भेज दें। निश्चित रूप से सभी समस्याओं को बता पाना मेरे लिए थकाऊ और लगभग असंभव होगा। लेकिन नीचे मैं कुछ समस्याओं का उल्लेख कर रहा हू जिनका मेरे विचार में तत्काल समाधान करना होगा और जिन्हें दृष्टिगत रखते हुए ही हमें अपनी प्रशासनिक या सैन्य नीतियां बनानी होंगी तथा उन्हें लागू करने का उपाय करना होगा :

१ सीमा व आंतरिक सुरक्षा दोनों मोर्चों पर भारत के समक्ष उत्पन्न चीनी खतरे का सैन्य व गुप्तचर मूल्यांकन।
२ हमारी सैन्य स्थिति का एक परीक्षण।
३ रक्षा क्षेत्र की दीर्घकालिक आवशयकताओं पर विचार.
४ हमारे सैन्य बलों के ताकत का एक मूल्यांकन.
५ संयुक्त राष्ट्र में चीन के प्रवेश का प्रश्न.
६ उत्तरी व उत्तरी-पूर्वी सीमा को मजबूत करने के लिए हमें कौन से राजनीतिक व प्रशसनिक कदम उठाने होंगे?
७ चीन की सीमा के करीब स्थित राज्यों जैसे यू०पी०, बिहार, बंगाल, व असम के सीमावर्ती क्षेत्रों में आंतरिक सुरक्षा के उपाय.
८ इन क्षेत्रों और सीमावर्ती चौकियों पर संचार, सड़क, रेल, वायु और बेहतर सुविधाओं में सुधार.
९ ल्हासा में हमारे दूतावास और गयांगत्से व यातुंग में हमारी व्यापार चौकियों तथा उन सुरक्षा बलों का भविष्य जो हमने तिब्बत में व्यापार मार्गो की सुरक्षा के लिए तैनात कर रखी हैं.
१० मैकमोहन रेखा के संदर्भ में हमारी नीति.


आपका

वल्लभभाई पटेल

आज़ाद भारत???

मित्रों मुझे तो अभी शंका ही है कि भारत आज़ाद है| क्यों कि भारत आज़ाद होता तो यहाँ किसी विदेशी के आने पर उससे पासपोर्ट और वीजा माँगा जाना चाहिए, किन्तु १९९७ में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबैथ के भारत आने पर पासपोर्ट नहीं लगा था वह बिना पासपोर्ट के भारत आई थी| १९४७ से पहले जब कोई ब्रीटिश अधिकारी या महारानी का भारत आना होता था तब उनसे पासपोर्ट पूछने वाला कोई नहीं था क्यों कि उस समय भारत इंग्लैण्ड का एक उपनिवेश था| किन्तु आज तो हम शायद भारत को आज़ाद कहते हैं न?
मित्रों आपको पता होगा कि आज के समय में जब चुनाव के बाद कोई दूसरी पार्टी सत्ता में आती है तो शपथ ग्रहण समारोह के बाद नया प्रधान मंत्री एक कागज़ पर हस्ताक्षर करता है जिसे सत्ता का हस्तांतरण कहते हैं, और उस पर हस्ताक्षर करने के बाद पुरानी पार्टी को देश निकाला नहीं दिया जाता, उसे भी भारत में सामान अधिकार के साथ जीने का हक़ दिया जाता है क्यों कि उस पार्टी के नेता भी भारत के संविधान में भारत के नागरिक हैं, अत: जो अधिकार एक साधारण भारतीय के हैं वे पुरानी पार्टी के नेता के भी हैं क्यों कि हम आज़ाद हैं| मित्रों १९४७ में भी नेहरु ने उसी कागज़ (सत्ता का हस्तांतरण) पर हस्ताक्षर किया था और हमें यह बताया गया था कि अब हम अंग्रेजों से आज़ाद हो गए हैं तो अब महारानी को यह विशेषाधिकार क्यों दिया गया? मतलब महारानी आज भी भारत की नागरिक है, कौनसे क़ानून के अनुसार? १८९७ के Indian Citizenship Act के अनुसार| यह बात आपको लेख में कहीं समझ आ जाएगी|
१९४६ में अंगेजों ने भारत को आज़ाद करने से पहले एक क़ानून बनाया था जिसका नाम है Indian independence Act. मित्रों आप में से कूछ राष्ट्रवादी यह बात जानते होंगे कि भारत और पाकिस्तान का विभाज़न हिन्दू या मुसलामानों की तरफ से नहीं अंग्रेजों की तरफ से हुआ था| अंग्रेजों द्वारा बनाए गए Indian independence Act में दो बातें हैं जो मै आपके सामने रखना चाहता हूँ|
1. Two independent dominions India and Pakistan shall be set up in India.
2. Both dominions will be completely self governing in their internal affairs, foreign affairs and national security, but the British monarch will continue to be their head of state represented by the Governor General of India and a new Governor General of Pakistan.
मित्रों सबसे ज्यादा आपतिजनक ये दो बिंदु हैं, जिनमे साफ़ साफ़ लिखा है कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत और पाकिस्तान दो Dominion States होंगे| मित्रों Dominion States का अर्थ कहीं से भी पता कर लो इसका अर्थ होता है एक बड़े राज्य के अधीन छोटे राज्य| अर्थात भारत और पाकिस्तान आज भी ब्रिटेन के Dominion States हैं न कि Independent Nations. मित्रों Indian independence Act बाज़ार में शायद दस रुपये का मिलता है आप चाहें तो उसे खरीद कर पढ़ सकते हैं| पूरा क़ानून न भी पढ़ें केवल उसकी प्रस्तावना पढ़ लें आपको पता चल जाएगा कि क्यों ब्रिटेन की महारानी का नाम भारत के राष्ट्रपति से ऊपर लिखा जाता है? और आप में से शायद कुछ यह जानते होंगे कि आज भी Comman Wealth Contries में भारत और पाकिस्तान का नाम as a British Dominion States के रूप में लिखा हुआ है न कि as a Indian and Pakistan Republic, मतलब हम आज भी महारानी के Dominion States हैं| कहीं उसी क़ानून के अनुसार तो महारानी भारत में बिना पासपोर्ट के तो नहीं आई थी?
मित्रों यह एक बहुत ही गंभीर प्रश्न है जिसे आज़ादी से पहले ही नेहरु द्वारा उठाया जाना चाहिए था किन्तु नेहरु ने तो इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया| क्यों कि नेहरु एक सत्ता का भूखा आदमी था जो बड़ी ही चालाकी से भारत का प्रधान मंत्री बना| उसकी चालाकी के सम्बन्ध में मै आपको कुछ बताना चाहता हूँ| मित्रों आज़ादी से पहले Congress Working Committee की एक बैठक हुई थी जिसमे यह निर्णय लिया गया था कि नेहरु और सरदार पटेल के नाम पर कांग्रेस के सभी प्रदेश अध्यक्षों द्वारा चुनाव होगा और जिसके पक्ष में सबसे अधिक वोट पड़ेंगे वही कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद संभालेगा और वही आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री होगा| उस समय भारत में कांग्रेस के १५ प्रदेश अध्यक्ष थे जिनमे से १४ ने सरदार पटेल के समर्थन में अपना मत दिया था केवल एक मत नेहरु के पक्ष में था| क्यों कि कांग्रेस में नेहरु को पसंद नहीं किया जाता था, और पसंद इसलिए नहीं किया जाता था क्यों कि नेहरु चरस पीता था, नेहरु सिगरेट पीता था, नेहरु एक ऐयाश व्यक्ति था, नेहरु एक चरित्रहीन व्यक्ति था| माउंट बैटन की पत्नी से उसके सम्बन्ध छिपे नहीं हैं| आप चित्र देख सकते हैं|

तो मित्रों Congress Working Committee के निर्णय के आधार पर सरदार पटेल जीत गए और नेहरु हार गया| और इसी निर्णय के आधार पर सरदार पटेल को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना तय हुआ और आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री भी सरदार पटेल को बनाना तय हुआ था| उस समय नेहरु की गद्दारी की एक घटना मै आपके सामने रखना चाहता हूँ| जिस व्यक्ति को हम जीवन भर चाचा नेहरु कहते रहे उसकी गद्दारी मुझे भी नहीं पता थी|
मित्रों जैसा कि आप ने अभी पढ़ा कि कांग्रेस में नेहरु को कोई पसंद नहीं करता था किन्तु नेहरु को पसंद करने वालों में सबसे ऊपर थे अंग्रेज़ और उन्ही अंग्रेजों का नुमाइंदा माउंट बैटन| माउंट बैटन को भारत भेजने का मुख्य कारण ही यह था कि अंग्रेज़ नेहरु को फाँसना चाहते थे और यह काम किया माउंट बैटन और उसकी पत्नी ने| नेहरु कोई जन नेता नहीं था उसे तो अंग्रेजों ने मीडिया द्वारा प्रचारित किया और उसकी उज्वल छवि बनानी चाहि क्यों कि सभी अंग्रेज़ नेहरु के बारे में कहा करते थे कि यह आदमी शरीर से भारतीय है किन्तु इसकी आत्मा बिल्कुल अंग्रेज़ है, अंग्रेज़ भारत छोड़ भी दें तो नेहरु अंग्रेजों का शासन और उनके क़ानून भारत में चलाता रहेगा और भारत हमेशा के लिये British Domenion State बनकर रहेगा| चुनाव हारने के बाद जब नेहरु को लगा कि अब मेरी दाल नहीं गलने वाली तो वह गांधी जी के पास गया और उन्हें धमकाया कि अगर मै प्रधान मंत्री नहीं बना तो मै कांग्रेस में फूट दाल दूंगा| और उस समय गांधी जी शायद अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की| क्यों कि गांधी जी को लगा कि अगर कांग्रेस में फूट पड़ी तो अंग्रेजों को भारत ना छोड़ने का एक बहाना मिल जाएगा कि हम किस कांग्रेस के हाथ में सत्ता सौंपें, नेहरु वाली या सरदार पटेल वाली? और इसी कारण गांधी जी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की और सरदार पटेल को एक पत्र लिखा और उसमे गांधी जी ने पटेल से अपना नाम प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार से वापस लेने की प्रार्थना की| और यह पत्र आप चाहें तो देख सकते हैं| गांधी वांग्मय के सौ अंक हैं जो भारत सरकार ने छापे और इनमे से अंतिम कुछ अंकों के आधार पर गांधी जी के सचीव कहे जाने वाले प्यारे मोहन ने एक किताब लिखी जिसका नाम है पूर्ण आहूति| इस किताब में गांधी जी का यह पत्र भी है|
पत्र पढने के बाद सरदार पटेल खुद गांधी जी के पास गए और उनसे कहा कि "बापू अगर आपकी अंतरात्मा कहती है तो मै तो आपका सेवक हूँ और यह पद मै नेहरु के लिये छोड़ सकता हूँ|" और सरदार पटेल ने दरियादिली दिखाते हुए आज़ाद भारत का पहला प्रधान मंत्री बनने का सौभाग्य छोड़ दिया और उसे हथिया लिया नेहरु ने| और उसी के बाद भारत पाकिस्तान के विभाज़न की बात सामने आई है, सरदार पटेल यदि प्रधान मंत्री होते तो ऐसा कभी नहीं होने देते क्यों कि भारत की छोटी छोटी रियासतों को एक करने का काम पटेल ने ही किया था और कश्मीर का विलय भी भारत में पटेल ने ही किया किन्तु नेहरु ने वहां भी टांग अडाई और कश्मीर में धारा ३७० लागू नहीं हुई| और उसी के कारण आज आधा कश्मीर पाकिस्तान के कब्ज़े में है, लद्दाख का कुछ भाग और तिब्बत आज चीन के कब्ज़े में है|
और मित्रों आपमें से कूछ यह भी जानते होंगे कि कांग्रेस पार्टी एक अंग्रेज़ द्वारा ही बनाई गयी थी|
सन १८८५ में मुंबई (उस समय बम्बई) में गोकुल दास तेजपाल भवन में Allan Octavian Hume द्वारा कांग्रेस पार्टी की स्थापना हुई थी| और यह पार्टी एक मनोरंजन क्लब के रूप में स्थापित की गयी थी| अंग्रेज कांग्रेस के बारे में कहा करते थे कि इस क्लब में हम उन भारतीयों को जमा करेंगे जिनके मन में कूछ बलबला है अर्थात देश को आज़ाद करवाने की इच्छा है, ताकि वह बलबला फूट कर कांग्रेस पार्टी में ही बाहर आ जाए, बाहर न जाने पाए| और इसीलिए अंग्रेज़ कांग्रेस को सेफ्टी वॉल्व कहा करते थे| वो तो सौभाग्य था देश का जो गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत आये| उनसे पहले तो कोई जानता तक नहीं था कि कांग्रेस जैसी कोई चीज़ भारत में है, गांधी जी ने इसमें प्राण फूंके, गांधी जी ने अन्न्ग्रेजों द्वारा बनाए गए इस क्लब को जन आन्दोलन का रूप दिया और बाद में खुद गांधी जी ने ही इस पार्टी से किनारा कर लिया, उन्होंने आजीवन कांग्रेस पार्टी का त्याग कर दिया| गांधी जी कांग्रेस पार्टी के सदस्य ही नहीं रहे थे| और अंतिम क्षणों में गांधी जी ने यहाँ तक कह डाला था कि इस कांग्रस को खत्म कर दो नहीं तो यह पार्टी देश को ऐसे ही लूटेगी जैसे कि अंग्रेजों ने लूटा है, क्यों कि गांधी जी नेहरु जैसों की नीयत भांप चुके थे| मित्रों गांधी जी की यह भविष्यवाणी भी सत्य सिद्ध हुई, घोटालों के रिकॉर्ड इस पार्टी ने पिछले ६३ वर्षों में कायम किये और ताज़ा तरीन मामला आप राष्ट्र मंडल खेलों का भी ले सकते हैं| नेहरु ने कांग्रेस को अपने बाप की जागीर बना डाला और इसी की संतानों ने देश को| वरना क्या वजह थी कि कांग्रेस पार्टी को प्रधान मंत्री के पद के लिये अपने घर के बाहर उम्मीदवार ही नहीं मिले| और जो मिले उन्हें खुद कांग्रेस ने ही ख़त्म कर डाला| लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण आप देख सकते हैं| क्यों कि इनकी जड़ तो नेहरु ही था|
और आप जानते होंगे कि १४ अगस्त १९४७ की रात गांधी जी दिल्ली ही नहीं आये, वे नोआखाली में थे| कांग्रेस के बड़े बड़े नेता गांधी जी को बुलाने गए किन्तु उन्होंने मन कर दिया और कहा कि मै मानता नहीं कि आज़ादी जैसी कोई चीज़ इस देश में आ रही है| यह केवल सत्ता के हस्तांतरण का सौदा हुआ है| गांधी जी ने नोआखाली से ही एक Press Statement दिया था जो कि पूर्ण आहुति में छपा भी था कि "यह जो कथित आज़ादी आ रही है यह हमारा लक्ष्य नहीं था, यह आज़ादी मै नहीं चाहता था, ये तो सत्ता के लालची लोग ले कर आये हैं|" वरना क्या कारण था कि भारत की आज़ादी की क्रांति का सबसे बड़ा पुरोधा ही आज़ादी के जश्न में शामिल नहीं हुआ? क्यों कि सत्ता के हस्तांतरण पर नेहरु ने हस्ताक्षर किया था और भारत को एक British Domenion State बना डाला था| माउन्ट बैटन ने अपनी सत्ता नेहरु को सौंपी थी और हमें समझाया गया कि स्वराज आ गया है, किन्तु यह स्वराज नहीं था और शायद यही समझाने महारानी का भारत में आगमन बिना पासपोर्ट और वीजा के हुआ कि तुम अभी भी मेरे गुलाम ही हो|

सोमवार, 15 अगस्त 2011

टीपू सुल्तान की सच्चाई

टीपू सुलतान हैदर अली की म्रत्यु के बाद उसका पुत्र टीपू सुलतान मैसूर की गद्दी पर बैठा। गद्दी पर बैठते ही टीपू ने मैसूर को मुस्लिम राज्य घोषित कर दिया। मुस्लिम सुल्तानों की परम्परा के अनुसार टीपू ने एक आम दरबार में घोषणा की ---"मै सभी काफिरों को मुस्लमान बनाकर रहूंगा। "तुंरत ही उसने सभी हिन्दुओं को फरमान भी जारी कर दिया.उसने मैसूर के गाव- गाँव के मुस्लिम अधिकारियों के पास लिखित सूचना भिजवादी कि, "सभी हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षा दो। जो स्वेच्छा से मुसलमान न बने उसे बलपूर्वक मुसलमान बनाओ और जो पुरूष विरोध करे, उनका कत्ल करवा दो.उनकी स्त्रिओं को पकडकर उन्हें दासी बनाकर मुसलमानों में बाँट दो। " इस्लामीकरण का यह तांडव टीपू ने इतनी तेजी से चलाया कि , पूरे हिंदू समाज में त्राहि त्राहि मच गई.इस्लामिक दानवों से बचने का कोई उपाय न देखकर धर्म रक्षा के विचार से हजारों हिंदू स्त्री पुरुषों ने अपने बच्चों सहित तुंगभद्रा आदि नदिओं में कूद कर जान दे दी। हजारों ने अग्नि में प्रवेश कर अपनी जान दे दी ,किंतु धर्म त्यागना स्वीकार नही किया। टीपू सुलतान को हमारे इतिहास में एक प्रजावत्सल राजा के रूप में दर्शाया गया है।


टीपू ने अपने राज्य में लगभग ५ लाख हिन्दुओ को जबरन मुस्लमान बनाया। लाखों की संख्या में कत्ल कराये। कुछ एतिहासिक तथ्य मेरे पास उपलब्ध जिनसे टीपू के दानवी ह्रदय का पता चलता है............... टीपू के शब्दों में "यदि सारी दुनिया भी मुझे मिल जाए,तब भी में हिंदू मंदिरों को नष्ट करने से नही रुकुंगा."(फ्रीडम स्ट्रगल इन केरल) "दी मैसूर गजेतिअर" में लिखा है"टीपू ने लगभग १००० मंदिरों का ध्वस्त किया। २२ मार्च १७२७ को टीपू ने अपने एक सेनानायक अब्दुल कादिर को एक पत्र likha ki,"१२००० से अधिक हिंदू मुस्लमान बना दिए गए।" १४ दिसम्बर १७९० को अपने सेनानायकों को पात्र लिखा की,"में तुम्हारे पास मीर हुसैन के साथ दो अनुयाई भेज रहा हूँ उनके साथ तुम सभी हिन्दुओं को बंदी बना लेना और २० वर्ष से कम आयु वालों को कारागार में रख लेना और शेष सभी को पेड़ से लटकाकर वध कर देना" टीपू ने अपनी तलवार पर भी खुदवाया था ,"मेरे मालिक मेरी सहायता कर कि, में संसार से काफिरों(गैर मुसलमान) को समाप्त कर दूँ" ऐसे कितने और ऐतिहासिक तथ्य टीपू सुलतान को एक मतान्ध ,निर्दयी ,हिन्दुओं का संहारक साबित करते हैं क्या ये हिन्दू समाज के साथ अन्याय नही है कि, हिन्दुओं के हत्यारे को हिन्दू समाज के सामने ही एक वीर देशभक्त राजा बताया जाता है, अगर टीपू जैसे हत्यारे को भारत का आदर्श शासक बताया जायेगा तब तो सभी इस्लामिक आतंकवादी भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक महान पुरुष बनेगे।

महात्मा गान्धी- कुछ अनकहे कटु तथ्य

१. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (१९१९) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के नायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गान्धी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।

२. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।

३. ६ मई १९४६ को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष
अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

४. मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए १९२१ में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग १५०० हिन्दु मारे गए व २००० से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया,
वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

५.१९२६ में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

६.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

७.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

८. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

८. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (१९३१)ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

९. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

१०. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

११. १४-१५ १९४७ जून को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब
जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

१२. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।

१३. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनातह् मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और १३ जनवरी १९४८ को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली
की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

१४. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

१५. २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को ५५ करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने
आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी। उपरोक्त परिस्थितियों में नथूराम गोडसे नामक एक युवक ने गान्धी का वध कर दिया। न्य़यालय में चले
अभियोग के परिणामस्वरूप गोडसे को मृत्युदण्ड मिला किन्तु गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर उस अभियोग के न्यायधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा-"नथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना
भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थीं और उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नथूराम निर्दोष है।" तो भी नथूराम ने भारतीय न्यायव्यवस्था के अनुसार एक व्यक्ति की हत्या के अपराध का दण्ड मृत्युदण्ड के रूप में सहज ही स्वीकार किया। परन्तु भारतमाता के विरुद्ध जो अपराध गान्धी ने किए, उनका दण्ड भारतमाता व उसकी सन्तानों को भुगतना पड़ रहा है। यह स्थिति कब बदलेगी? २ अक्तूबर (गान्धी जयन्ती) पर यह विषय विशेष रूप से विचारणीय है, जिससे कि हम भारत के भविष्य का मार्ग निर्धारित कर सकें।


जय प्रकाश गुप्त, अम्बाला छावनी।

अतीत भुलाना आसान नहीं

हरि कृष्ण निगम
नई दिल्ली से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित सप्ताहिक ‘इंडिया टुडे’ ने हाल के अंक में कुछ दिनों पहले दिवंगत हुए पुराने कांग्रेसी नेता और मुस्लिम विचारक डा. रफीक जकारिया को उद्धृत करते हुए मोटे अक्षरों में लिखा कि इतिहास में कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है कि जो सिद्ध कर सके कि किसी मुस्लिम ने कोई हिन्दू मंदिर तोड़ा हो।

यही बात इतिहासकार डा. इरफान हबीब और रोमिला थापर भी दूसरे संदर्भ में कह चुके हैं। यह भी कहा गया है कि मुस्लिम आक्रमणकारी सिर्फ धन-संपत्ति की लूट के उद्देश्य से आक्रांता के रूप में भारत आते रहे और बस यहीं उनका मन्तव्य था। भारत के पिछले एक हजार साल के इतिहास को झुठलाते हुए हर छोटे-बड़े शहरों के सैकड़ों पुराने भग्नावशेषों को नकारते हुए जिसमें मुस्लिम आक्रमणों के बर्बर ध्वंस की निशानियाँ आज भी मौजूद हैं।

इस तरह की दुष्प्रचारित की जा रही राजनीतिक टिप्पणियाँ हमें अनायास आहत कर आक्रोश से भर सकती है। कभी-कभी लगता है कि हम स्वयं इस बात के गुनाहगार हैं कि अपनी तटस्थता की आड़ में हम ऐसी टिप्पणियों का प्रतिरोध नहीं करते हैं। मेरे विचार में राजनीति प्रेरित दिग्भ्रमित करने वाले ऐसे लेखक इतिहास व पुरातत्व के अनुशासन से गिरकर सिर्फ असत्य के अलावा कुछ नहीं बोल सकते हैं।

कहते हैं कि झुठ की अनेक किस्में होती है– बुरा झूठ, सफेद झूठ, काला झूठ, आकड़ों का झूठ, राजनीतिक झूठ, आदि-आदि। पर यदि अपनें चारों ओर गौर से देखें तो पाएंगे कि एक चौथे प्रकार का झूठ भी होता है जिसकी प्रकृति उपर्युत्त प्रकार के झूठ से कई गुना भयानक होती है। इसे हम गजब का झूठ कह सकते हैं। जहाँ तक देश के इतिहास का संदर्भ है, झूठ बोलना उनकी फितरत में दाखिल है, लगता है, नस-नस में बस गया है।

मुस्लिम शासकों के स्वयं अपने इतिहासकार व वृत्तांत लेखक, मध्य युग में भारत-भ्रमण के लिए आए विदेशी यात्री व स्वयं ब्रिटिश इतिहासकार सभी ने सदियों तक हिंदू मंदिरों के ध्वंस के बारे में जो लिखा है उसके बाद भी विकृत सोच द्वारा जो दुष्प्रचार हमारी पत्र-पत्रिकाओं में फैलाया जा रहा है वह अक्षम्य है। पुराने इतिवृत्त जैसे आज का पूर्वी अफगानिस्तान शैवपंथी था। उत्तरी पूर्वी सीमांत से लगे अनेक देश अपवा जहाँ हमारे मूल देश की सभ्यता की उपशाखाएं विद्यमान थीं उनको कैसे नेस्तनाबूद किया गया, यह भुला भी दिया जाए, पर आज भी देश के दूरदराज के हर कोने में स्वयं आप जाकर भग्न मंदिर या खण्डित मूर्तियां देख सकते हैं। मात्र एक छोटा सा उदाहरण है, चाहे आप जबलपुर के चौसठ योगिनी मंदिर जाएं या भेजपुर का शिव मंदिर अथवा हांपी, आपका हृदय विदीर्ण हुए बिना नहीं रह सकता। सोमनाथ, मथुरा, काशी या अयोध्या की बात ही क्या करना जिसका विनाश इस्लाम के विस्तार के लिए मनोवैज्ञानिक रूप कितना अपरिहार्य था। आज के पलायनवादी, तटस्थ शिक्षित हिन्दू की संवेदनशीलता मरती जा रही है और इसलिए वह इसे समझ नहीं सकता है।

क्या आप इसे घृणित मार्क्सवादी व्याख्या नहीं कहेंगे जिसे बार-बार हमारे अंग्रेजी अखबार प्रचारित करने से नहीं चूकते हैं कि हिन्दू मंदिरों में अपार स्वर्णराशि व सम्पत्ति इकट्ठा कर हिंदुओं ने जो एक अपराध किया था उससे इस्लामी आक्रमणकारियों का आकर्षित होना स्वाभाविक था। पर उसका यह फायदा भी हुआ कि उन्होंने भारतीय समाज में एक क्रांति भी लाई, जो एकात्मवाद को बढ़ावा देने के साथ जाति-व्यवस्था के विरुद्ध भी जनमत तैयार कर सकी।

अत्यंत संक्षेप में, सन् 632 में भारत में इस्लाम के आगमन के बाद से किस तरह हजारों मंदिरों का ध्वंस हुआ इसको आज के मीडिया को साक्ष्यों से परिचित कराना जरूरी है, जिससे वे हमारे ही देश में बहुसंख्यकों को बरगलान सकें। फ्रेंच इतिहासकार एलेन डेनिलू ने लिखा है कि प्रारम्भ से ही इस्लाम का इतिहास भारत के लिए विनाश, रक्तपात, लूट और मंदिरों के विध्वंस के लिए एक भूकंप की तरह सिद्ध हुआ था।

सन 1018 से लेकर सन 1024 तक मथुरा, कन्नौज, कालिंजर और बनारस के साथ-साथ सोमनाथ के मंदिर क्रूरता से नष्ट किए गए। प्रसिद्ध पत्रकार एम. वी. कामथ ने कुछ दिनों पहले 18वीं शताब्दी के एक ब्रिटिश यात्री को उद्धृत करते हुए लिखा कि सूरत से दिल्ली तक के बीच उसने एक भी हिंदू मंदिर नहीं देखा क्योंकि वे सब नष्ट किए जा चुके थे। इस्लामी इतिहासकारों ने सैकड़ों साल पहले गर्व से लिखा है कि सल्लतनत और मुगल शासकों के समय उनकी सरकार का ‘मंदिर तोड़ने का विभाग” कितना कुशलता और दक्षता से यह काम करता था।

सोमनाथ का मंदिर पहली बार महमूद गजनवी द्वारा 1024 में लूटा गया था और शिवलिंग तोड़ डाला गया था। मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार इस विशाल देवालय को नष्ट करने के बाद सोमनाथ के शिवलिंग के टुकड़े गजनी की जुम्मा मस्जिद की सॣढ़ियों में जड़े गए थे जिससे इस्लाम के अनुयाई उन्हें पैरों से रौंदें। वह सन् 1191 का समय था जब मुस्लिम आक्रांता मोहम्मद गोरी मध्य एशिया से अपने तुर्की घुड़सवारों की सेना के साथ भारत आया था। पहले पृथ्वीराज चौहान ने उसे तराईन के पहले युद्ध में मात दी और उसे क्षमादान भी दिया। पर 1192 में उसने पृथ्वीराज को पराजित करने के बाद विशाल लालकोट को कब्जा करने के बाद जलाकर धरती में मिला दिया। आज भी कुव्वतुल इस्लाम भारत की पहली मस्जिद के रूप में खड़ी है जिसे उस समय के 67 हिंदू मंदिरों के पत्थरों और मलवे को प्रयुक्त कर बनाया गया था। इस तरह पहली बार यह आस्था ध्वंस के प्रतीक के रूप में दिल्ली पहुची थी। स्वयं अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने इसका विस्तृत रूप से वर्णन किया है।

“तारीखे-फीरोजशाही” के इतिहासकार के अनुसार सुल्तान अल्तुतमिस (1210-1236) ने अपने मारवाड़ के आक्रमण के दौरान अनेक बड़े मंदिरों की मूर्तियों को लाकर दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में चुनवाया था। इसी तरह जलालुद्दीन खिलजी (1290-1296) ने रणथंभौर के आक्रमण के बाद किया था। दो अन्य मुस्लिम इतिहासकारों ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की है कि अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) हर अभियान के बाद मूर्तियों को दिल्ली लाकर सीढ़ियों पर चुनवाने का एक धार्मिक कृत्य मानता था। बाद तक दर्जनों शासकों ने यह चाहे दिल्ली में हो या बहमनी, मालवा, बरार या दक्षिण के राज्य हों, यही दोहराया। इन अभिलेखित साक्ष्यों के बाद भी यदि आज के कुछ सेकुलर कहलाने वाले दुराग्रही और हठधर्मी इतिहासकार अथवा पत्रकार रट लगाते रहें कि मंदिर कभी ध्वस्त नहीं किए गए, कभी बलात धर्मांतरण नहीं हुआ तो यह मात्र कुटिल मानसिकता ही मानी जा सकती है।

हमारे देश में अपने अतीत के प्रति अधिकांश शिक्षित वर्ग इतना उदासीन है कि विद्रूषीकरण के साथ-साथ घोर सतही और असत्य वक्तव्य भी बिना किसी प्रतिरोध के छापे जा सकते हैं। कदाचित इसीलिए नोबेल पुरस्कार विजेता वी.एस. नागपाल ने कुछ दिनों पहले एक साक्षात्कार में रोमिला थापर को ‘फ्रॉड’ तक कह डाला था।

आज हिंदू हीनताग्रंथिवश अपनी सभ्यता की प्रमुखता को भी अभिव्यक्त करने की स्थिति में नहीं हैं और कदाचित इतिहास की बाध्यताओं व उसके सही अनुशासन को नहीं समझ पाते हैं। उसके मन में कूट-कूटकर भर दिया गया है कि उनका अपना अतीत, आज की नजरों में, सांप्रदायिक इतिहास है।

जब जनमत के खिलाफ गए गाँधी

महात्मा गाँधी जो भारत के तथाकथित राष्ट्रपिता कहलाये जाते है, इनकी कोई भी आलोचना इस देश में राष्ट्र द्रोह करार दे दी जाती है. कोई भी व्यक्ति भगवन नहीं हो सकता. हर किसी से गलतियाँ हो सकती है. हर व्यक्ति अपने जीवन में कुछ अच्छे काम करता है कुछ गलत. समाज को उसके अच्छे एंव बुरे दोनों कार्यो से प्रेरणा लेनी चाहिए. आज में गाँधी जी के ऐसे ही कुछ कार्यो की और पाठको का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जब गाँधी जी ने जन आकांक्षा एवं लोकतंत्र के खिलाफ जाकर अपनी "सोच" इस देश पर थोपी थी.

पहला प्रकरण भगत सिंह से सम्बंधित है. ये हम सभी जानते है की भगत सिंह एवं उनके साथियों को विभिन परकार के झूठे मुकदमो में फंसा कर फांसी पर चढाने की पूरी तयारी कर ली थी. दरअसल अंग्रेजो को सबसे ज्यादा डर इन्ही क्रांतिकारियों से था. क्योंकि ये अंग्रेजो को उन्ही की भाषा में जवाब देते थे. इसलिए अंग्रेज क्रांतिकारियों का सफाया चाहते थे.

इसी दौरान गाँधी एवं कांग्रेस के नेतृत्व में देश में अंग्रेजो के खिलाफ व्यापक आन्दोलन हो रहे थे. जिस में देश की जनता भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही थी. जिससे अंग्रजी सरकार की चूले हिल गयी थी. तात्कालिक वैसरॉय लोर्ड इरविन किसी भी हालत में इन जनांदोलनो को रोकना चाहते थे. परिणामस्वरूप अंग्रेजी सरकार घोषणा करती है की वे गाँधी जी की सभी मांगे मानने के लिए तैयार है, एवं गाँधी जी को बातचीत का न्योता देती है. जिसे गाँधी जी स्वीकार कर लेते है. अंग्रेजो को लगता था की गाँधी जी सभी मांगो के साथ भगत सिंह एवं अन्य क्रांतिकारियों की रिहाई की भी मांग करेंगे. इसलिए लोर्ड इरविन इसके लिए भी तैयार थे, तथा इसके लिए उन्होंने लन्दन की भी स्विकिरती ले ली थी. दूसरी और देश की जनता में भी यही आशा थी की अब भगत सिंह एवं साथी जेल से रिहा हो जाएँगे. भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारो से देश का युवा वर्ग विशेष प्रभावित था. दरअसल भगत सिंह वो पहले जन नेता थे जिन्होंने लोकपिर्यता के मामले में पहली बार गाँधी जी को पीछे छोड़ दिया था. मगर देश की जनता यह सुन कर चकित रह गयी की गाँधी जी ने भगत सिंह की फांसी का जिक्र तक इरविन के साथ हुए समझोते में नहीं किया. जबकि गाँधी जी ने दुसरे 70000 बंदियों को छुधा लिया था. अंग्रेजो को तो बिन मांगी मुराद मिल गयी थी. गाँधी जी के इस फैसले से देश की जनता में तिर्व पर्तिकिर्या हुई. परिणामस्वरूप गाँधी जी जहाँ भी जाते उन्हें काले झंडे दिखाए जाने लगे. यहाँ तक की इन घटना के बाद कांग्रेस के कराची में हुए अधिवेशन तक में उन्हें काले झंडे दिखाए गए. यह पहला समय था जब गाँधी जी को इतना तिर्व जन विरोध झेला पड़ा था. जिसका जिक्र स्वयं नेहरु ने लिखते हुए किया है की अगर भगत सिंह जिन्दा रहते तो कांग्रेस एवं गाँधी को पीछे छोड़ देते.



दूसरा प्रकरण नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से संबंधित है. बात दरसल 1938 की है. देश की जनता गाँधी एवं कांग्रेस के अति आदर्शवादी भाषणों से उब चुकी थी. जनता नए विकल्पों की और देखने लगी थी. जो उन्हें नेताजी के रूप में मिलगया था. परिणाम स्वरुप वो गाँधी जी के विरोध के बावजूद नेताजी कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए. परिणाम स्वरुप गाँधी जी के "चमचा नेताओ" ने नेताजी के काम में अडंगा डालना शुरू कर दिया. यहाँ तक की कांग्रेस कार्यसमिति का गठन भी उन्हें नहीं करने दिया गया.

अगले साल 1939 में पुन: कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव आया. गांधीजी ने इस बार पट्टाभि सितारैमैया को खड़ा किया तथा नारा दिया की "पट्टाभि सितारैमैया की हार मेरी हार होगी". बावजूद इसके पट्टाभि सितारैमैया चुनाव हार गए और नेताजी पुन: कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हो गए. भगत सिंह प्रकरण के बाद यह दूसरा समय था जब गाँधी के ऊपर जनता ने किसी और को वरीयता दी थी. किन्तु गाँधी के चमचो ने पुन: अपना खेल खेला एवं नेताजी के कार्यो में विघन ढालना जरी रखा. जिससे दुखी होकर नेताजी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. अगर वो चाहते तो स्वयं गाँधी एवं कंपनी को कांग्रेस से बहार का रास्ता दिखा सकते थे या कांग्रेस की दो फाड़ कर सकते थे. किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया. इस प्रकार गाँधी जी ने एक बार पुन: लोकतंत्र को ठगा और अपनी निजी राय देश पर थोपी. क्या यही सम्मान था गाँधी जी के दिल में लोकतंत्र के लिए. क्यों एक निर्वाचित अध्यक्ष को इस तरह हटने के लिएय मजबूर किया गया.

तीसरा प्रकरण 1946 -47 का है. भारत का बटवारा एंव स्वतंत्रता निश्चित हो चुकी थी. देश के सामने यक्ष प्रशन था की प्रथम प्रधानमंत्री कोन बनेगा. 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव होने थे. ये आम धरना थी की कांग्रेस अध्यक्ष ही प्रथम प्रधानमंत्री बनेगा. देश की जनता सरदार पटेल जी के पक्ष में थी और गाँधी जी नेहरु के पक्ष में. इसलिए ये निश्चित था की अगर सीधे चुनाव हुए तो जन दबाव में सरदार पटेल कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव जरुर लड़ेंगे और जीतेंगे भी. इसलिए गाँधी एवं नेहरु ने चाल चलते हुए पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस के प्रांतीय अध्यक्षों की रायशुमारी का प्रस्ताव रखा. उस समय 16 कांग्रेस प्रांतीय अध्यक्ष हुआ करते थे जिसमे से 13 प्रांतीय अध्यक्षों ने सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव दिया. परन्तु गाँधी जी के आग्रह पर सरदार पटेल जी ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिए. इस प्रकार गाँधी जी ने पुन: लोकतंत्र का गला घोटते हुए अपनी निजी राय के रूप में नेहरु को इस देश पर थोप दिया. नेहरु ने इस देश के साथ क्या कुकर्म किये ये पूरा इतिहास है.

ऐसा नहीं है की गाँधी जी को अपनी गलतियों का एहसास नहीं हुआ. जब उन्होंने नेहरु को प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करते हुए देखा और ये जाना की नेहरु बिलकुल फ़ैल साबित हो रहा है तो वे बहुत दुखी और असंतुष्ट हुए. और इस बारे में जब उनसे उनके एक अमरीकी पत्रकार मित्र ने पूछा की "गाँधी जी आप कुछ करते क्यों नहीं?" पत्रकार का आशय नेतरत्व परिवर्तन से था. तो गाँधी जी ने जवाब दिया की "अब न तो वो समय है और न ही वे लोग है." मुझे पूरा यकीन है की ये बात कहते समय उनके मन में जरुर भगत सिंह, नेताजी बोस एवं सरदार पटेल के संस्मरण ताजा हो गए होंगे. इसीलिए सरदार पटेल का इस्तीफा कई बार वह यह कह कर रुकवा देते थे की देश को सरदार पटेल की जरुरत है.

अंत में एक प्रशन: क्या हम इतिहास से कोई सबक लेंगे?

Vikas Singhal