सोमवार, 15 अगस्त 2011

श्री रामजन्मभूमि अभियान : मंदिर निर्माण से राष्ट्र निर्माण की ओर

भारत की आत्मा श्रीराम - भारत एक धर्मप्राण देश है। समय-समय पर अनेक अवतारों ने यहां आकर इस देश और इसके निवासियों को ही नहीं, तो स्वयं को भी धन्य किया है। ऐसे ही एक महामानव थे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम। महर्षि वाल्मीकि ने सर्वप्रथम श्रीरामकथा का उपहार हमें दिया। इसके बाद दुनिया की प्रायः सभी प्रमुख भाषाओं में श्रीराम की महिमा लिखी गयी है। संविधान के तीसरे अध्याय में, जहां मौलिक अधिकारों का उल्लेख है, सबसे ऊपर श्रीराम, सीता एवं लक्ष्मण के चित्र बने हैं। इससे स्पष्ट है कि श्रीराम भारत की आत्मा हैं।

अयोध्या प्रकरण पर न्यायालय का निर्णय – यों तो अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए हिन्दुओं द्वारा तब से संघर्ष जारी है, जब 1528 ई0 में उसे तोड़ा गया था; पर स्वराज्य प्राप्ति के बाद यह विवाद न्यायालय में चला गया। गत 30 सितम्बर, 2010 को इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने संविधान में मान्य हिन्दू कानून तथा पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर बहुत महत्व का निर्णय दिया है। इसमें सुन्नी बोर्ड के दावे को पूरी तरह निरस्त कर तीनों न्यायाधीशों ने एकमत से माना है कि -

-यह स्थान ही श्रीराम जन्मभूमि है।

-1528 में बाबरी ढांचे से पूर्व वहां एक गैरइस्लामिक (हिन्दू) मंदिर था।

एक न्यायाधीश ने तीनों गुम्बद (लगभग 1,500 वर्ग गज) वाला पूरा स्थान हिन्दुओं को, जबकि शेष दो ने 1/3 भाग मुसलमानों को भी देने को कहा है। यह विभाजन अव्यावहारिक, अनुचित और असंभव है। अतः पूरा स्थान हिन्दुओं को मिलना चाहिए। अयोध्या में कई मस्जिदें हैं; पर श्रीराम जन्मभूमि केवल यही है। पूरा स्थान मिलने से ही जन-जन की आकांक्षा और प्रभु श्रीराम की प्रतिष्ठा के अनुरूप भव्य मंदिर बन सकेगा।

इतिहास में अयोध्या – त्रेतायुग में श्रीराम का जन्म परम पावन सरयू नदी के तट पर स्थित अयोध्या में हुआ। अयोध्या को लाखों साल से मोक्ष प्रदान करने वाली नगरी माना जाता है। यह आदिकाल से करोड़ों भारतवासियों की मान्यता है।

अयोध्या मथुरा माया, काशी कांची अवन्तिका

पुरी द्वारावती चैव, सप्तैता मोक्षदायिकाः।।

अयोध्या सदा से भारत के सभी मत-पंथों के लिए पूज्य रही है। यहां जैन मत के पांच तीर्थंकरों का जन्म हुआ। भगवान बुद्ध ने यहां तपस्या की। गुरु नानक, गुरु तेगबहादुर एवं गुरु गोविंद सिंह जी भी यहां पधारे। दुनिया भर के इतिहासकारों और विदेशी यात्रियों की पुस्तकों के हजारों पृष्ठ अयोध्या की महिमा से भरे हैं। विश्व में प्रकाशित सभी प्रमुख मानचित्र पुस्तकों (एटलस) में अयोध्या को प्रमुखता से दर्शाया गया है।

इस्लाम का उदय और मंदिर पर आक्रमण – 712 ई0 से मुस्लिम सेनाओं के आक्रमण शान्त और सम्पन्न भारत पर होने लगे। 1526 ई0 में बाबर भारत और 1528 ई0 में अयोध्या आया। उसके आदेश पर उसके सेनापति मीरबाकी ने श्रीराम मंदिर पर आक्रमण किया। 15 दिन के घमासान युद्ध में मीरबाकी ने तोप के गोलों से मंदिर गिरा दिया। इस युद्ध में 1.74 लाख हिन्दू वीर बलिदान हुए। फिर उसने दरवेश मूसा आशिकान के निर्देश पर उसी मलबे से एक मस्जिद जैसा ढांचा बनवा दिया। चूंकि यह काम हड़बड़ी और हिन्दुओं के लगातार आक्रमणों के बीच हो रहा था, इसलिए उसमें मस्जिद की अनिवार्य आवश्यकता मीनार तथा नमाज से पूर्व हाथ-पांव धोने (वजू) के लिए जल का स्थान नहीं बन सका।

मंदिर-प्राप्ति के प्रयत्न - इस घटना के बाद मंदिर की प्राप्ति हेतु संघर्ष का क्रम चल पड़ा। 1528 से 1949 ई0 तक हुए 76 संघर्षों का विवरण इतिहास में मिलता है। राजा से लेकर साधु-संन्यासी और सामान्य जनता ने इन युद्धों में भाग लिया। पुरुष ही नहीं, स्त्रियों ने भी प्राणाहुति दी। इस बीच कुछ मध्यस्थों के प्रयास से वहां बने ‘राम चबूतरे’ पर हिन्दू पूजा करने लगे। लोग ढांचे वाले उस परिसर की परिक्रमा भी करते थे। अंग्रेजी शासन में अंतिम बड़ा संघर्ष 1934 में बैरागियों द्वारा किया गया। उसके बाद वहां फिर कभी नमाज नहीं पढ़ी गयी।

समाधान का असफल प्रयास – 1857 के स्वाधीनता संग्राम के समय सरदार अमीर अली के नेतृत्व में स्थानीय मुसलमान यह स्थान छोड़ने को तैयार हो गये थे। इस वार्ता में हिन्दुओं के प्रतिनिधि बाबा राघवदास थे; पर अंग्रेजों ने हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाये रखने के लिए दोनों को फांसी दे दी। इससे मामला फिर लटक गया।

श्रीरामलला का प्राकट्य एवं तालाबन्दी – इस मामले में एक निर्णायक मोड़ तब आया, जब भक्तों ने 23 दिसम्बर, 1949 को ढांचे में श्रीरामलला की मूर्ति स्थापित कर पूजा-अर्चना प्रारम्भ कर दी। प्रधानमंत्री नेहरू जी ने मूर्ति को हटवाना चाहा; पर प्रबल जनभावना को देख मुख्यमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत यह साहस नहीं कर सके। जिलाधिकारी श्री नायर ने वहां ताला डलवा कर शासन की ओर से पुजारी नियुक्त कर पूजा एवं भोग की व्यवस्था कर दी।

न्यायालय में वाद – जनवरी, 1950 में दो श्रद्धालुओं के आग्रह पर न्यायालय ने श्रीरामलला के नित्य दर्शन, पूजन एवं सुरक्षा की व्यवस्था की। 1959 में निर्मोही अखाड़े ने तथा 1961 में केन्द्रीय सुन्नी वक्फ बोर्ड ने स्वामित्व हेतु वाद दायर किये। न्यायालय में सुनवाई के बीच वहां पूजा, अर्चना और भक्तों का आगमन जारी रहा।

आंदोलन के पथ पर हिन्दू - 1983 में मुजफ्फरनगर (उ0प्र0) में हुए हिन्दू सम्मेलन में दो वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं, पूर्व उपप्रधानमंत्री श्री गुलजारीलाल नन्दा तथा उ0प्र0 शासन के पूर्व मंत्री श्री दाऊदयाल खन्ना ने केन्द्र शासन से कहा कि वह संसद में कानून बनाकर श्रीराम जन्मभूमि, श्रीकृष्ण जन्मभूमि तथा काशी विश्वनाथ मंदिर हिन्दुओं को सौंप दे, जिससे देश में स्थायी सद्भाव स्थापित हो सके; पर शासन ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

यह देखकर हिन्दुओं को ‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’ के बैनर पर आंदोलन का मार्ग अपनाना पड़ा। अक्तूबर, 1984 में ‘श्रीराम जानकी रथ’ की यात्रा द्वारा जन जागरण प्रारम्भ कर सबसे पहले रामलला को ताले से मुक्त करने की मांग की गयी। दबाव बढ़ते देख शासन ने 1 फरवरी, 1986 को ताला खोल दिया।

जन जागरण द्वारा मंदिर निर्माण की ओर - इसके बाद हिन्दुओं के सभी मत-पंथ के धर्मगुरुओं ने ‘श्रीराम जन्मभूमि न्यास’ का गठन किया। जुलाई, 1989 में इलाहबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री देवकीनंदन अग्रवाल ने न्यायालय से सम्पूर्ण परिसर को श्रीरामलला की सम्पत्ति घोषित करने को कहा। न्यायालय ने सब वाद लखनऊ की पूर्ण पीठ को सौंप दिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद की प्रमुख भूमिका के कारण यह अभियान जनांदोलन बन गया। सितम्बर, 1989 में भारत के 2.75 लाख गांवों व नगरों के मंदिरों में श्रीराम शिलापूजन सम्पन्न हुआ। 6.25 करोड़ लोगों ने इसमें भागीदारी की। विदेशस्थ हिन्दुओं ने भी शिलाएं भेजीं।

जनदबाव के चलते केन्द्र तथा राज्य शासन को झुकना पड़ा और 9 नवम्बर, 1989 को प्रमुख संतों की उपस्थिति में शिलान्यास सम्पन्न हुआ। पहली ईंट बिहार से आये वंचित समाज के रामभक्त कामेश्वर चौपाल ने रखी। मंदिर आंदोलन समरसता की गंगोत्री बन गया।

1990 में कारसेवा – जून, 1990 में हरिद्वार के हिन्दू सम्मेलन में पूज्य सन्तों व धर्माचार्यों ने मंदिर निर्माण हेतु कारसेवा की घोषणा कर दी। 30 अक्तूबर को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की गर्वोक्ति के बाद भी कारसेवकों ने गुम्बदों पर भगवा फहरा दिया। बौखला कर उसने 2 नवम्बर को गोली चलवा दी, जिसमें कई कारसेवक बलिदान हुए। इस नरसंहार से पूरा देश आक्रोशित हो उठा। मुलायम सिंह को हटना पड़ा। नये चुनाव में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा ने सत्ता संभाली। हिन्दू मंदिर निर्माण की ओर क्रमशः आगे बढ़ रहे थे।

भूमि का समतलीकरण – प्रदेश शासन ने तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए विवादित स्थल के पास 2.77 एकड़ भूमि अधिग्रहित कर ली। उसे समतल करते समय अनेक खंडित मूर्तियां तथा मंदिर के अवशेष निकले।

1992 में कारसेवा - अक्तूबर, 1992 में दिल्ली में हुई ‘धर्म संसद’ में पूज्य धर्माचार्यों ने गीता जयन्ती (मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, छह दिसम्बर, 1992) से फिर कारसेवा का निर्णय लिया। दीपावली पर अयोध्या से आई ‘श्रीराम ज्योति’ से घर-घर दीप जलाये गये।

प्रदेश शासन के अधिग्रहण को मुसलमानों द्वारा न्यायालय में दी गयी चुनौती की याचिका पर नवम्बर 1992 में सुनवाई पूरी हो गयी। दोनों हिन्दू न्यायमूर्तियों ने निर्णय लिख दिया; पर तीसरे श्री रजा ने इसके लिए 12 दिसम्बर, 1992 की तिथि घोषित की। इससे अयोध्या आये दो लाख कारसेवकों के आक्रोश से वह जर्जर बाबरी ढांचा धराशायी हो गया। इस प्रक्रिया में 1154 ई0 का वह शिलालेख भी मिला, जिस पर गहड़वाल राजाओं द्वारा मंदिर निर्माण की बात लिखी थी। कारसेवकों ने एक अस्थायी मंदिर निर्माण कर रामलला की पूजा प्रारम्भ कर दी।

केन्द्र शासन द्वारा हस्तक्षेप – अब केन्द्र सरकार की कुंभकर्णी निद्रा खुली। उसने 7 जनवरी, 1993 को विवादित क्षेत्र तथा उसके पास की 67 एकड़ भूमि अधिग्रहीत कर ली। इसी समय महामहिम राष्ट्रपति डा0 शंकरदयाल शर्मा ने सर्वोच्च न्यायालय से पूछा कि क्या 1528 से पूर्व वहां कोई हिन्दू मंदिर या भवन था ? सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रश्न प्रयाग उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ को सौंप दिया।

इधर केन्द्र के अधिग्रहण को इस्माइल फारुखी ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। इस पर बहस में शासन ने लिखित शपथ पत्र में कहा कि अंतिम निर्णय के बाद उस स्थान पर यदि हिन्दू मंदिर या भवन सिद्ध होगा, तो वह उसे हिन्दुओं को लौटाने को प्रतिबद्ध है। ऐसा न होने पर मुसलमानों की इच्छा का सम्मान किया जाएगा।

राडार सर्वेक्षण एवं उत्खनन - न्यायालय ने कहा कि यदि किसी मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनी है, तो उसके अवशेष धरती के नीचे अवश्य होंगे। उसके आदेश पर कनाडा के वैज्ञानिकों ने राडार सर्वेक्षण से भूमि के नीचे के चित्र लिये। प्राप्त चित्रों तथा इनकी पुष्टि के लिए हुए उत्खनन से वहां प्राचीन मंदिर था, यह सिद्ध हुआ। न्यायालय का 30 सितम्बर, 2010 का निर्णय इन प्रमाणों पर ही आधारित है।

वार्ताओं का क्रम – पूज्य सन्तों, विश्व हिन्दू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यह इच्छा थी कि भारतीय मुसलमान स्वयं को बाबर जैसे विदेशी आक्रामकों से न जोड़ें और प्रेम से वह स्थान हिन्दुओं को दे दें। गांधी जी ने भी अपने समाचार पत्र ‘नवजीवन’ में 27.7.1937 को यही कहा था। सब समझदार मुसलमान भी इस पक्ष में थे; पर बात नहीं बनी। अतः प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और फिर नरसिंह राव ने दोनों पक्षों को वार्ता के लिए बुलाया। वार्ता की असफलता से न्यायालय का मार्ग ही शेष बचा, जिसके निर्णय से सत्य की जीत हुई है।

चुनौती और संकल्प – आज भी प्रभु श्रीराम बांस और टाट के उस अस्थायी मंदिर में विराजित हैं। हर दिन हजारों भक्त उनके दर्शन करते हैं। हमारी मांग है कि सोमनाथ मंदिर की तरह ही संसद कानून बना कर श्रीराम जन्मभूमि हिन्दुओं को सौंपे, जिससे वहां भव्य मंदिर बन सके।

मंदिर निर्माण से राष्ट्र निर्माण - श्रीराम केवल हिन्दुओं के ही नहीं, भारतीय मुसलमान और ईसाइयों के भी पूर्वज हैं। भारत माता सबकी माता है। सब एक संस्कृति के उपासक और एक ही समाज के अंग हैं। न्यायालय का निर्णय मुसलमानों को अपनी भूमिका पर पुनर्विचार का अवसर देता है। मंदिर निर्माण में सब मत, पंथ और मजहब वालों के सहयोग से स्थायी सद्भाव का निर्माण होगा और देश तेजी से प्रगति करेगा। इससे भारत में रामराज्य की कल्पना साकार होगी, जो आज भी विश्व में आदर्श माना जाता है। आइये, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण के लिए हम सब संकल्प लें। जय श्रीराम।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रचनाकार: सुभद्रा कुमारी चौहान

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,

बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,

राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,

कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,

उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?

जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,

उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,

‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,

मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,

विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

वह खून कहो किस मतलब का

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का
आ सके देश के काम नहीं।

वह खून कहो किस मतलब का
जिसमें जीवन, न रवानी है!
जो परवश होकर बहता है,
वह खून नहीं, पानी है!

उस दिन लोगों ने सही-सही
खूँ की कीमत पहचानी थी।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में

मॉंगी उनसे कुरबानी थी।

बोले, "स्वतंत्रता की खातिर
बलिदान तुम्हें करना होगा।
तुम बहुत जी चुके हो जग में,
लेकिन आगे मरना होगा।

आज़ादी के चरणों में जो,
जयमाल चढ़ाई जाएगी।
वह सुनो, तुम्हारे शीशों के
फूलों से गूँथी जाएगी।

आजादी का संग्राम कहीं
पैसे पर खेला जाता है?
यह शीश कटाने का सौदा
नंगे सर झेला जाता है"

यूँ कहते-कहते वक्ता की
आंखों में खून उतर आया!
मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा
दमकी उनकी रक्तिम काया!

आजानु-बाहु ऊँची करके,
वे बोले, "रक्त मुझे देना।
इसके बदले भारत की
आज़ादी तुम मुझसे लेना।"

हो गई सभा में उथल-पुथल,
सीने में दिल न समाते थे।
स्वर इनकलाब के नारों के
कोसों तक छाए जाते थे।

“हम देंगे-देंगे खून”
शब्द बस यही सुनाई देते थे।
रण में जाने को युवक खड़े
तैयार दिखाई देते थे।

बोले सुभाष, "इस तरह नहीं,
बातों से मतलब सरता है।
लो, यह कागज़, है कौन यहॉं
आकर हस्ताक्षर करता है?

इसको भरनेवाले जन को
सर्वस्व-समर्पण काना है।
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन
माता को अर्पण करना है।

पर यह साधारण पत्र नहीं,
आज़ादी का परवाना है।
इस पर तुमको अपने तन का
कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!

वह आगे आए जिसके तन में
खून भारतीय बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को
हिंदुस्तानी कहता हो!

वह आगे आए, जो इस पर
खूनी हस्ताक्षर करता हो!
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ,
आएजो इसको हँसकर लेता हो!"

सारी जनता हुंकार उठी-
हम आते हैं, हम आते हैं!
माता के चरणों में यह लो,
हम अपना रक्त चढाते हैं!

साहस से बढ़े युबक उस दिन,
देखा, बढ़ते ही आते थे!
चाकू-छुरी कटारियों से,
वे अपना रक्त गिराते थे!

फिर उस रक्त की स्याही में,
वे अपनी कलम डुबाते थे!
आज़ादी के परवाने पर
हस्ताक्षर करते जाते थे!

उस दिन तारों ने देखा था
हिंदुस्तानी विश्वास नया।
जब लिक्खा महा रणवीरों ने
ख़ूँ से अपना इतिहास नया।

भगवा आतंकवाद !

शीश शिखा होने से पक्का हिन्दु था ही,
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।

आतंकी है भोर, है गोधूलि आतंकी
वह्नि की ज्वाला है दीपशिखा आतंकी
आतंकी है यज्ञ वेदमन्त्र आतंकी
आतंकी यजमान पुरोहित भी आतंकी
मैं इन सब का आदर करता पूज्य मानता
इन्हें, अत: मैं मान रहा मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।

आतंकी है राम और कृष्ण आतंकी
विश्वामित्र वसिष्ठ द्रोण कृप हैं आतंकी
बृहस्पति भृगु देवर्षि नारद आतंकी
व्यास पराशर कुशिक भरद्वाज आतंकी
मेरे ये इतिहास पुरुष पितृ ये मेरे
वंशज इनका होने से मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।

नामदेव नानक और दयानन्द आतंकी
रामदास (समर्थ) विवेकानन्द आतंकी
आदिशंकराचार्य रामकृष्ण आतंकी
गौतम कपिल कणाद याज्ञवल्क्य आतंकी
ये मेरे आदर्श सदा सर्वदा रहे हैं
इसीलिए मैं कहता हूँ मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।

भगवा तो भारत की है पहचान कहाता
प्रिय तिरंगा भी भगवा से शोभा पाता
भारतमाता के कर में भगवा फहराता
भारत की अस्मिता से है भगवा का नाता
बोध यदि भगवा का उग्रवाद से हो तो
अच्छा यही कि सब बोलें मैं आतंकी हूँ।
मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।

मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।

मैंने भगवा ओढ़ लिया, मैं आतंकी हूँ।

कितना रक्त बहाना होगा,अपनी ही इस धरती पर

कितना रक्त बहाना होगा,अपनी ही इस धरती पर
कितने मंदिर फिर टूटेंगे,अपने इस भारत भू पर
उदासीन बनकर क़ब तक हम,खुद का शोषण देखेंगे
क़ब तक गजनी-बाबर मिलकर भारत माँ को लूटेंगे

क़ब तक जयचंदों के सह पर,गौरी भारत आएगा
रौंद हमारी मातृभूमि को,नंगा नाच दिखायेगा
कब तक कितनी पद्मिनी, अग्नि कुंद में जाएंगी
अपना मान बचने हेतु,क़ब तक अश्रु बहायेंगी
क़ब तक काशी और अयोध्या,हम सब को धिक्कारेंगे
क़ब तक सोमनाथ और मथुरा की छाती पर,गजनी खंजर मारेंगे
कितनी नालान्दाओं में खिलजी,वेद पुराण जलाएंगे
कितना देखेंगे हम तांडव,क़ब तक शीश कटायेंगे

बनायेंगे मंदिर,कसम तुम्हारी राम.....

अतीत भुलाना आसान नहीं

हरि कृष्ण निगम
नई दिल्ली से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित सप्ताहिक ‘इंडिया टुडे’ ने हाल के अंक में कुछ दिनों पहले दिवंगत हुए पुराने कांग्रेसी नेता और मुस्लिम विचारक डा. रफीक जकारिया को उद्धृत करते हुए मोटे अक्षरों में लिखा कि इतिहास में कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है कि जो सिद्ध कर सके कि किसी मुस्लिम ने कोई हिन्दू मंदिर तोड़ा हो।

यही बात इतिहासकार डा. इरफान हबीब और रोमिला थापर भी दूसरे संदर्भ में कह चुके हैं। यह भी कहा गया है कि मुस्लिम आक्रमणकारी सिर्फ धन-संपत्ति की लूट के उद्देश्य से आक्रांता के रूप में भारत आते रहे और बस यहीं उनका मन्तव्य था। भारत के पिछले एक हजार साल के इतिहास को झुठलाते हुए हर छोटे-बड़े शहरों के सैकड़ों पुराने भग्नावशेषों को नकारते हुए जिसमें मुस्लिम आक्रमणों के बर्बर ध्वंस की निशानियाँ आज भी मौजूद हैं।

इस तरह की दुष्प्रचारित की जा रही राजनीतिक टिप्पणियाँ हमें अनायास आहत कर आक्रोश से भर सकती है। कभी-कभी लगता है कि हम स्वयं इस बात के गुनाहगार हैं कि अपनी तटस्थता की आड़ में हम ऐसी टिप्पणियों का प्रतिरोध नहीं करते हैं। मेरे विचार में राजनीति प्रेरित दिग्भ्रमित करने वाले ऐसे लेखक इतिहास व पुरातत्व के अनुशासन से गिरकर सिर्फ असत्य के अलावा कुछ नहीं बोल सकते हैं।

कहते हैं कि झुठ की अनेक किस्में होती है– बुरा झूठ, सफेद झूठ, काला झूठ, आकड़ों का झूठ, राजनीतिक झूठ, आदि-आदि। पर यदि अपनें चारों ओर गौर से देखें तो पाएंगे कि एक चौथे प्रकार का झूठ भी होता है जिसकी प्रकृति उपर्युत्त प्रकार के झूठ से कई गुना भयानक होती है। इसे हम गजब का झूठ कह सकते हैं। जहाँ तक देश के इतिहास का संदर्भ है, झूठ बोलना उनकी फितरत में दाखिल है, लगता है, नस-नस में बस गया है।

मुस्लिम शासकों के स्वयं अपने इतिहासकार व वृत्तांत लेखक, मध्य युग में भारत-भ्रमण के लिए आए विदेशी यात्री व स्वयं ब्रिटिश इतिहासकार सभी ने सदियों तक हिंदू मंदिरों के ध्वंस के बारे में जो लिखा है उसके बाद भी विकृत सोच द्वारा जो दुष्प्रचार हमारी पत्र-पत्रिकाओं में फैलाया जा रहा है वह अक्षम्य है। पुराने इतिवृत्त जैसे आज का पूर्वी अफगानिस्तान शैवपंथी था। उत्तरी पूर्वी सीमांत से लगे अनेक देश अपवा जहाँ हमारे मूल देश की सभ्यता की उपशाखाएं विद्यमान थीं उनको कैसे नेस्तनाबूद किया गया, यह भुला भी दिया जाए, पर आज भी देश के दूरदराज के हर कोने में स्वयं आप जाकर भग्न मंदिर या खण्डित मूर्तियां देख सकते हैं। मात्र एक छोटा सा उदाहरण है, चाहे आप जबलपुर के चौसठ योगिनी मंदिर जाएं या भेजपुर का शिव मंदिर अथवा हांपी, आपका हृदय विदीर्ण हुए बिना नहीं रह सकता। सोमनाथ, मथुरा, काशी या अयोध्या की बात ही क्या करना जिसका विनाश इस्लाम के विस्तार के लिए मनोवैज्ञानिक रूप कितना अपरिहार्य था। आज के पलायनवादी, तटस्थ शिक्षित हिन्दू की संवेदनशीलता मरती जा रही है और इसलिए वह इसे समझ नहीं सकता है।

क्या आप इसे घृणित मार्क्सवादी व्याख्या नहीं कहेंगे जिसे बार-बार हमारे अंग्रेजी अखबार प्रचारित करने से नहीं चूकते हैं कि हिन्दू मंदिरों में अपार स्वर्णराशि व सम्पत्ति इकट्ठा कर हिंदुओं ने जो एक अपराध किया था उससे इस्लामी आक्रमणकारियों का आकर्षित होना स्वाभाविक था। पर उसका यह फायदा भी हुआ कि उन्होंने भारतीय समाज में एक क्रांति भी लाई, जो एकात्मवाद को बढ़ावा देने के साथ जाति-व्यवस्था के विरुद्ध भी जनमत तैयार कर सकी।

अत्यंत संक्षेप में, सन् 632 में भारत में इस्लाम के आगमन के बाद से किस तरह हजारों मंदिरों का ध्वंस हुआ इसको आज के मीडिया को साक्ष्यों से परिचित कराना जरूरी है, जिससे वे हमारे ही देश में बहुसंख्यकों को बरगलान सकें। फ्रेंच इतिहासकार एलेन डेनिलू ने लिखा है कि प्रारम्भ से ही इस्लाम का इतिहास भारत के लिए विनाश, रक्तपात, लूट और मंदिरों के विध्वंस के लिए एक भूकंप की तरह सिद्ध हुआ था।

सन 1018 से लेकर सन 1024 तक मथुरा, कन्नौज, कालिंजर और बनारस के साथ-साथ सोमनाथ के मंदिर क्रूरता से नष्ट किए गए। प्रसिद्ध पत्रकार एम. वी. कामथ ने कुछ दिनों पहले 18वीं शताब्दी के एक ब्रिटिश यात्री को उद्धृत करते हुए लिखा कि सूरत से दिल्ली तक के बीच उसने एक भी हिंदू मंदिर नहीं देखा क्योंकि वे सब नष्ट किए जा चुके थे। इस्लामी इतिहासकारों ने सैकड़ों साल पहले गर्व से लिखा है कि सल्लतनत और मुगल शासकों के समय उनकी सरकार का ‘मंदिर तोड़ने का विभाग” कितना कुशलता और दक्षता से यह काम करता था।

सोमनाथ का मंदिर पहली बार महमूद गजनवी द्वारा 1024 में लूटा गया था और शिवलिंग तोड़ डाला गया था। मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार इस विशाल देवालय को नष्ट करने के बाद सोमनाथ के शिवलिंग के टुकड़े गजनी की जुम्मा मस्जिद की सॣढ़ियों में जड़े गए थे जिससे इस्लाम के अनुयाई उन्हें पैरों से रौंदें। वह सन् 1191 का समय था जब मुस्लिम आक्रांता मोहम्मद गोरी मध्य एशिया से अपने तुर्की घुड़सवारों की सेना के साथ भारत आया था। पहले पृथ्वीराज चौहान ने उसे तराईन के पहले युद्ध में मात दी और उसे क्षमादान भी दिया। पर 1192 में उसने पृथ्वीराज को पराजित करने के बाद विशाल लालकोट को कब्जा करने के बाद जलाकर धरती में मिला दिया। आज भी कुव्वतुल इस्लाम भारत की पहली मस्जिद के रूप में खड़ी है जिसे उस समय के 67 हिंदू मंदिरों के पत्थरों और मलवे को प्रयुक्त कर बनाया गया था। इस तरह पहली बार यह आस्था ध्वंस के प्रतीक के रूप में दिल्ली पहुची थी। स्वयं अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने इसका विस्तृत रूप से वर्णन किया है।

“तारीखे-फीरोजशाही” के इतिहासकार के अनुसार सुल्तान अल्तुतमिस (1210-1236) ने अपने मारवाड़ के आक्रमण के दौरान अनेक बड़े मंदिरों की मूर्तियों को लाकर दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में चुनवाया था। इसी तरह जलालुद्दीन खिलजी (1290-1296) ने रणथंभौर के आक्रमण के बाद किया था। दो अन्य मुस्लिम इतिहासकारों ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की है कि अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) हर अभियान के बाद मूर्तियों को दिल्ली लाकर सीढ़ियों पर चुनवाने का एक धार्मिक कृत्य मानता था। बाद तक दर्जनों शासकों ने यह चाहे दिल्ली में हो या बहमनी, मालवा, बरार या दक्षिण के राज्य हों, यही दोहराया। इन अभिलेखित साक्ष्यों के बाद भी यदि आज के कुछ सेकुलर कहलाने वाले दुराग्रही और हठधर्मी इतिहासकार अथवा पत्रकार रट लगाते रहें कि मंदिर कभी ध्वस्त नहीं किए गए, कभी बलात धर्मांतरण नहीं हुआ तो यह मात्र कुटिल मानसिकता ही मानी जा सकती है।

हमारे देश में अपने अतीत के प्रति अधिकांश शिक्षित वर्ग इतना उदासीन है कि विद्रूषीकरण के साथ-साथ घोर सतही और असत्य वक्तव्य भी बिना किसी प्रतिरोध के छापे जा सकते हैं। कदाचित इसीलिए नोबेल पुरस्कार विजेता वी.एस. नागपाल ने कुछ दिनों पहले एक साक्षात्कार में रोमिला थापर को ‘फ्रॉड’ तक कह डाला था।

आज हिंदू हीनताग्रंथिवश अपनी सभ्यता की प्रमुखता को भी अभिव्यक्त करने की स्थिति में नहीं हैं और कदाचित इतिहास की बाध्यताओं व उसके सही अनुशासन को नहीं समझ पाते हैं। उसके मन में कूट-कूटकर भर दिया गया है कि उनका अपना अतीत, आज की नजरों में, सांप्रदायिक इतिहास है।

पाकिस्‍तान में प्रताड़णा झेलने को विवश हिंदू

कराची के ल्यारी इलाके में 13 साल की एक हिंदू लड़की पूनम को पिछले साल मार्च में अपहृत कर लिया गया और उसे अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर किया गया. उसके माता-पिता अपनी बेटी पर मौलवियों के प्रभाव को देखकर काफी हैरान थे.

पूनम के 61 वर्षीय चाचा भांवरू ने इंडिया टुडे को बताया, ''वह बेहद डरी हुई थी. उसने मुझे बताया कि अब वह मुसलमान बनकर उनके साथ रहने जा रही है.'' पूनम अब मरियम हो गई है.

मासूम पूनम के इस तरह धर्म परिवर्तन पर किसी ने विरोध में आवाज नहीं उठाई, क्योंकि ल्यारी में लगभग सभी हिंदू परिवार वर्षों से इस धार्मिक अत्याचार को झेल रहे हैं.

पाकिस्तान में अपहरण आम बात है. लेकिन 16.8 करोड़ की आबादी वाले मुसलमानों के मुल्क में 27 लाख हिंदुओं के समुदाय को जिस बात ने हिला कर रख दिया है, वह है छोटी उम्र की लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन. बहुत से लोगों का मानना है कि यह काम एक साजिश के तहत किया जा रहा है ताकि बचे-खुचे हिंदुओं को पाकिस्तान से बाहर खदेड़ा जा सके.

सिंध प्रांत में नवाब शाह नामक जगह के 46 वर्षीय सनाओ मेघवार कहते हैं, ''हम चिंतित हैं. हमने अपने बच्चों को भारत या किसी अन्य देश में भेजना शुरू कर दिया है. हम भी जल्द ही यहां से जाने की तैयारी कर रहे हैं.'' उनके लिए चिंतित होने का कारण भी है. स्थानीय एजेंसियों की ओर से किए गए शोध के मुताबिक पाकिस्तान में हर महीने औसतन 25 हिंदू लड़कियों का अपहरण होता है और उनका जबरन धर्म परिवर्तन किया जाता है.

विभाजन के समय 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी करीब 15 फीसदी थी, जो अब मात्र 2 फीसदी रह गई है. कई हिंदू पाकिस्तान छोड़ कर चले गए हैं, तो उनसे ज्‍यादा हिंदू मारे जा चुके हैं और कुछ ने जिंदा रहने के लिए इस्लाम को स्वीकार कर लिया है.

हिंदुओं को सिर्फ अलग मतदाता के तौर पर मतदान की इजाजत है और उन्हें अपनी शादियां पंजीकृत कराने का अधिकार नहीं है. रावलपिंडी में हिंदू समुदाय के मुखिया जगमोहन कुमार अरोड़ा बताते हैं कि देश के कुल 428 मंदिरों में से सिर्फ 26 में ही पूजा-पाठ होता है.

उनकी तकलीफों का यहीं अंत नहीं है. 19 जुलाई, 2010 को रावलपिंडी के श्मशान घाट को, जहां हिंदू और सिख अपने सगे-संबंधियों की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार करते थे, खत्म कर दिया गया. अरोड़ा सवाल करते हैं, ''अगर मस्जिदों को तोड़ कर वहां घर बना दिए जाएं तो मुसलमानों को कैसा लगेगा?''

भारत में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के परिणामस्वरूप होने वाले दंगों के बाद हिंदुओं पर हमले बढ़ गए हैं. पाकिस्तान में हिंदू भारत में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं और कश्मीर में हिंसक वारदात से आम तौर पर सीधे प्रभावित होते हैं.

पाकिस्तान के एक स्वयंसेवी संगठन नेशनल कमीशन फॉर जस्टिस ऐंड पीस की 2005 की रिपोर्ट में पाया गया कि पाकिस्तान स्टडी.ज की पाठ्यपुस्तकों को हिंदुओं के खिलाफ नफरत पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि ''निंदात्मक वैरभाव सैनिक और निरंकुश शासन को वैध बनाता है और घृणा की मानसिकता को जन्म देता है.

पाकिस्तान स्टडी.ज की पुस्तकें भारत को दुश्मन पड़ोसी देश के तौर पर पेश करने में काफी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.'' इसी रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ''पाकिस्तान के अतीत की कहानी जान-बूझ्कर अलग ढंग से लिखी गई है, और यह भारत में इतिहास की जिस तरह व्याख्या की गई है उससे अकसर एकदम उलट होती है. सरकार द्वारा जारी की गई इन पुस्तकों में विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है कि हिंदू पिछड़े और अंधविश्वासी लोग होते हैं.''

एक प्रतिष्ठित पाकिस्तानी विद्वान 61 वर्षीय परवे.ज हूडभाय कहते हैं पाकिस्तानी स्कूलों का इस्लामीकरण 1976 में तब शुरू हुआ जब एक एक्ट ऑफ पार्लियामेंट के तहत जरूरी कर दिया गया कि सभी सरकारी और निजी स्कूल (सिवा उन स्कूलों के जहां ग्रेड 9 से ब्रिटिश ओ-लेवेल पढ़ाया जाता है) ग्रेड 5 के सामाजिक अध्ययन में इस तरह के विषयों को पढ़ाएं- ''पाकिस्तान के खिलाफ काम कर रही ताकतों की पहचान करो'', ''जिहाद, और पाकिस्तान के खिलाफ भारत के बुरे इरादों पर भाषण दो.''

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की परिषद के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अमरनाथ मोटूमल ने इंडिया टुडे को बताया, ''अकेले कराची में हिंदू लड़कियों का अपहरण आम बात है. लोग डरे हुए हैं. ये अपहरण और धर्म परिवर्तन इलाके के प्रभावशाली लोगों द्वारा करवाए जाते हैं. इससे पीड़ित लोग अपनी जान गंवाने के डर से मुंह बंद रखना ही ठीक समझ्ते हैं.''

प्रांतीय विधानसभा के एक पूर्व सदस्य भेरूलाल बलानी भी इस बात से सहमत हैं. वे कहते हैं कि अपहृत की जाने वाली हिंदू लड़कियां ज्‍यादातर निचले तबके की होती हैं. अधिकारियों का कहना है कि पिछले तीन महीनों में सिंध के दूरदराज के इलाकों में हिंदुओं पर हमले बढ़े हैं. यहां जबरन धर्म परिवर्तन से लेकर बलात्कार और हत्या की कम-से-कम नौ घटनाएं हो चुकी हैं.

एक घटना नगरपारकर इलाके की है. वहां 17 साल की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जबकि एक अन्य वारदात आकली गांव की है, जिसकी एक 15 वर्षीया लड़की का अपहरण करके उसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया. आकली गांव की घटना के बाद तुरंत 71 हिंदू परिवार घर-बार छोड़कर हमेशा के लिए राजस्थान चले गए. सिंध प्रांत के कोटरी कस्बे में हिंदू समुदाय के सदस्यों ने हाल ही में किशोरवय की चार लड़कियों अनीता, किशनी, अजय और सागर के अपहरण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.

पाकिस्तान में हिंदुओं की दुर्दशा की बात इस साल जनवरी में तब सामने आई जब बलूचिस्तान प्रांत के कलात जिले में काला माता मंदिर के पदाधिकारी और हिंदू आध्यात्मिक नेता 82 वर्षीय लक्की चंद गारजी का कुछ अज्ञात लोगों द्वारा उनके अपने ही घर से अपहरण कर लिया गया. उन्हें 50 करोड़ रु. की फिरौती देने के बाद अप्रैल में छोड़ा गया लेकिन यह मामला आज तक अनसुलझा ही रहा.

हिंदुओं के खिलाफ भेदभाव की जानकारी मिलने के बाद पाकिस्तान की 43 वर्षीया सांसद मारवी मेमन ने, जो पाकिस्तान मुस्लिम लीग-.कैद (पीएमएल-क्यू) की सदस्य हैं, इसकी आलोचना की है. वे इसे सरकार की पूरी नाकामी मानती हैं. इस भेदभाव का विरोध करने वाली एकमात्र सांसद मेमन कहती हैं, ''दुख की बात यह है कि इन अपहरणों के परिणामस्वरूप तमाम हिंदू परिवार भारत चले गए हैं. आखिरकार पाकिस्तान में हर समय दहशत में जीने से अच्छा है कि वे दूसरे मुल्क में चले जाएं.

पाकिस्तान में मुस्लिम समुदाय के असरदार लोगों के हाथों हिंदुओं का अपमानित होना आम बात हो चुकी है.'' वे एक घटना के बारे में बताती हैं कि सिंध में किस तरह दिनेश नाम के एक हिंदू लड़के ने मुसलमानों के लिए बनाए गए प्याऊ से पानी पी लिया था तो उसके बाद हिंदू समुदाय के कई लोगों पर हमले किए और उन्हें उनके घरों से जबरन बाहर खदेड़ा गया था. दिनेश के पिता मीरूमल, जो उस हमले के समय मौजूद थे, बताते हैं, ''उसे बुरी तरह पीटा गया था.''

वर्षों तक दब कर रहने के बाद हिंदुओं में अपनी पहचान की भावना खत्म हो चुकी है. मेमन कहती हैं, ''वे ऐसे लोग बन चुके हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं है. अगर पाकिस्तान के हिंदुओं के लिए कोई जागरूकता और चिंता नहीं होगी तो वे बिना आवाज वाले लोग रह जाएंगे और धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे.''

पेशावर के 62 वर्षीय जगदीश भट्टी लंबे समय तक सेना में रहे लेकिन भी भेदभाव से बचाने के लिए कोई गांरटी नहीं थी. उनके बेटों रमेश और लाल को नौकरी पाने के लिए मुस्लिम नाम रखना पड़ा. रमेश (अब अहमद चौहान) एक निजी बहुराष्ट्रीय बैंक में काम करते हैं और लाल (नदीम चौहान) पेशावर जिले में नगरपालिका के अधिकार वाले खाद्य गोदाम में सुपरवाइजर का काम करते हैं.

रमेश भट्टी ने इंडिया टुडे को बताया, ''अपनी पूरी पढ़ाई के दौरान मुसलमान अध्यापकों और सहपाठियों के साथ हमारे रिश्ते अच्छे रहे हैं. लेकिन जब नौकरी पाने के लिए मुस्लिम नाम रखने को कहा गया तो हम दंग रह गए.''

सिंध प्रांत के लरकाना में हिंदू समुदाय के लोग 18 साल की हिंदू छात्रा सुंदरी की त्रासद कहानी बयां करते हैं. 2004 में एक दिन सुंदरी अपने कॉलेज से घर वापस नहीं आई. काफी खोजबीन करने के बाद उसका परिवार पुलिस के पास गया. दो हफ्ते बाद पुलिस ने परिवार को बताया कि सुंदरी एक स्थानीय ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करने वाले कमाल खान के साथ भाग गई है और मुसलमान बन गई है.

सुंदरी के माता-पिता को यह भी बताया गया कि उनकी बेटी अपना नया धर्म घोषित करने के लिए जल्दी ही कोर्ट में हाजिर होगी. कुछ पुलिसकर्मियों और लंबी दाढ़ी वाले कुछ लोगों के साथ सुंदरी अदालत में हाजिर हुई और उसने कहा, ''मैं, सुंदरी, हिंदू माता-पिता की संतान हूं. लेकिन अब वयस्क होकर मुझे एहसास हुआ है कि मैंने जिस धर्म में जन्म लिया वह सही नहीं है. इसलिए अपने पूरे होशो-हवास में, बिना किसी की जोर-जबरदस्ती के मैंने अपने माता-पिता और धर्म से अलग होकर इस्लाम को अपनाने का फैसला किया है.''

जज ने उसके धर्म परिवर्तन को स्वीकार कर लिया और सुंदरी को तुरंत वहां से हटाकर किसी अज्ञात जगह पहुंचा दिया गया. माना जाता है कि उसने बाद में कमाल से शादी कर ली लेकिन जल्दी ही दोनों में तलाक हो गया. इसके बाद उसने पड़ोस के एक और मुस्लिम लड़के से शादी की. वह शादी भी टूट गई. फिर सुंदरी ने तीसरी शादी की. लेकिन इस शादी के कुछ ही दिन बाद उसे रहस्यमय हालत में मृत पाया गया. उसके माता-पिता का मानना है कि उसकी हत्या कर दी गई, जबकि उसके तीसरे पति का कहना है कि उसने खुदकुशी की थी.

कराची में हिंदू पंचायत के सदस्य लालजी मेघवार कहते हैं, ''हिंदू लड़कियों का इस तरह अपहरण आम बात है. इसके बाद लड़कियों को उस कागज पर दस्तखत करने के लिए कहा जाता है, जिसमें लिखा होता है कि वे अपनी मर्जी से मुसलमान बन गई हैं.''

पिछले साल कराची में एक फैक्टरी में काम करने वाले 27 वर्षीय जगदीश कुमार की हत्या उनके कुछ मुस्लिम सहकर्मियों ने कर दी. उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने इस्लाम की निंदा की थी. पुलिस और फैक्टरी के अधिकारियों ने कुमार पर हमले को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया. बताया जाता है कि कुमार किसी मुस्लिम लड़की से प्यार करते थे.

सितंबर, 2010 में सिंध प्रांत के हैदराबाद में आयकर निरीक्षक 32 वर्षीय अशोक कुमार दुकानदारों से आयकर इकट्ठा करने गए. टैक्स देना तो दूर, एक दुकानदार ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसे दाढ़ी खींच कर ले जाने की धमकी दी. कुछ ही मिनटों में दुकानदारों ने जुलूस निकालकर मांग की कि अशोक कुमार को सबक सिखाया जाए.

इसके चलते दो दिन की हड़ताल रही. अशोक कुमार को न सिर्फ नौकरी से निलंबित कर दिया गया, बल्कि इस्लाम की तौहीन के जुर्म में उन्हें कैद की स.जा सुनाई गई. एक सूत्र का कहना है कि तभी से वे और उनका परिवार गायब है.

उसी महीने में आंख के विशेषज्ञ 52 वर्षीय डॉ. कन्हैया लाल का लरकाना में अपहरण कर लिया गया. उन्हें पांच लाख रु. की फिरौती पर छोड़ा गया. लरकाना जिले के बदाह कस्बे में एक और हिंदू दर्शन लाल (50 वर्ष) ने जब अपने अपहरण का विरोध किया तो उनकी हत्या कर दी गई. पिछले पांच वर्षों में सुक्कुर से कम-से-कम 23 जाने-माने हिंदुओं का अपहरण किया जा चुका है.

पुलिस अधिकारियों ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर इंडिया टुडे को बताया कि कई हिंदू जबरन वसूली करने वाले गिरोहों को नियमित भत्ता (सुरक्षा शुल्क) देते हैं. पाकिस्तान में हिंदुओं का कहना है कि सरकार और न्यायपालिका की उपेक्षा के कारण उनकी असुरक्षा और बढ़ गई है.

इस्लामाबाद के एक राजनीति विश्लेषक पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताते हैं, ''भारत-पाकिस्तान युद्ध से लेकर बाबरी मस्जिद ढहाए जाने तक पाकिस्तान में हिंदुओं को दुश्मन के रूप में देखा जाता रहा है और उन पर जुल्म किया जाता रहा है.'' वे हाल ही में एक अखबार के संपादक के साथ एक हिंदू कारोबारी के झ्गड़े का हवाला देते हैं, जिसमें उस व्यापारी ने संपादक को कार देने से इनकार कर दिया था.

उस अखबार ने अगले ही दिन अपने संपादकीय में उस व्यापारी को आतंकवादियों को हथियार मुहैया कराने वाला भारतीय एजेंट बता दिया. सिंध के कंधकोट शहर में एक हिंदू व्यापारी का कहना है, ''50 वर्षों से हमें वानियो या बनिया कहकर संबोधित किया जाता है, जिसे इस इलाके में अपमानजनक शब्द माना जाता है.''

इस संस्थागत भेदभाव को खत्म करने की मांग करते हुए पाकिस्तान के अनुसूचित जाति अधिकार आंदोलन (एससीआरएम) ने हिंदू विवाह के पंजीकरण की अनुमति के कानून बनाने पर जोर दिया है. पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की ओर से 23 नवंबर, 2010 के एक आदेश में सरकार से हिंदू विवाहों को वैध बनाए जाने वाला कानून तैयार करने के लिए कहा गया है.

एससीआरएम ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने कदम नहीं उठाया तो इस मुद्दे को सामने लाने के लिए देश भर में हस्ताक्षर अभियान शुरू किया जाएगा. हिंदू महिलाएं अकसर कंप्यूटरीकृत राष्ट्रीय पहचान पत्र (सीएनआइसी) के मामले में भेदभाव की शिकायत करती रही हैं.

कराची की 45 वर्षीया संगीता देवी कहती हैं, ''अगर हम विवाह का पंजीकरण प्रमाणपत्र नहीं दिखा सकते हैं तो हम सीएनआइसी हासिल करने के अधिकारी नहीं हैं. और इस तरह हमें मतदान का अधिकार नहीं मिल सकता. हमारे पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है.'' संगीता हिंदू विवाह के पंजीकरण की मांग करने वाले अभियान की अगुआ रही हैं. दक्षिणी पंजाब के रहीम यार खान में रहने वाली 34 वर्षीया हिंदू महिला शामी माई कहती हैं, ''तलाक या घरेलू हिंसा के मामले में हिंदू महिला कोई शिकायत नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास अपनी शादी को कोई दस्तावेज ही नहीं होता है.

अगर वह अदालत को यही नहीं बता पाएगी कि उसका पति कौन है तो अदालत उसकी समस्या पर कैसे विचार करेगी.'' यहां तक कि हिंदू महिलाओं के लिए सफर करना भी एक समस्या है. इस्लामाबाद की 37 वर्षीया नैना बाई की शिकायत है, ''अगर हम किसी होटल में रुकते हैं तो पुलिसवाले और होटल के कर्मचारी हमारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं. हमें मजबूरी में फुटपाथ पर रातें गुजारनी पड़ती हैं.''

अगर किसी राष्ट्र के चरित्र की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने यहां के अल्पसंख्यकों के साथ क्या सलूक करता है, तो पाकिस्तान में हिंदुओं की दुर्दशा के मद्देनजर उसे एक नाकाम मुल्क कहना गलत नहीं होगा.