सोमवार, 15 अगस्त 2011
महात्मा गान्धी- कुछ अनकहे कटु तथ्य
२. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गान्धी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।
३. ६ मई १९४६ को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गान्धी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष
अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।
४. मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए १९२१ में गान्धी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग १५०० हिन्दु मारे गए व २००० से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गान्धी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया,
वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।
५.१९२६ में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द की अब्दुल रशीद नामक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गान्धी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।
६.गान्धी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।
७.गान्धी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।
८. यह गान्धी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।
८. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (१९३१)ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।
९. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गान्धी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।
१०. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गान्धी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।
११. १४-१५ १९४७ जून को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गान्धी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब
जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।
१२. मोहम्मद अली जिन्ना ने गान्धी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गान्धी ने अस्वीकार कर दिया।
१३. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गान्धी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनातह् मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और १३ जनवरी १९४८ को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली
की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।
१४. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गान्धी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।
१५. २२ अक्तूबर १९४७ को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को ५५ करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने
आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गान्धी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी। उपरोक्त परिस्थितियों में नथूराम गोडसे नामक एक युवक ने गान्धी का वध कर दिया। न्य़यालय में चले
अभियोग के परिणामस्वरूप गोडसे को मृत्युदण्ड मिला किन्तु गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर उस अभियोग के न्यायधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा-"नथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना
भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थीं और उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नथूराम निर्दोष है।" तो भी नथूराम ने भारतीय न्यायव्यवस्था के अनुसार एक व्यक्ति की हत्या के अपराध का दण्ड मृत्युदण्ड के रूप में सहज ही स्वीकार किया। परन्तु भारतमाता के विरुद्ध जो अपराध गान्धी ने किए, उनका दण्ड भारतमाता व उसकी सन्तानों को भुगतना पड़ रहा है। यह स्थिति कब बदलेगी? २ अक्तूबर (गान्धी जयन्ती) पर यह विषय विशेष रूप से विचारणीय है, जिससे कि हम भारत के भविष्य का मार्ग निर्धारित कर सकें।
जय प्रकाश गुप्त, अम्बाला छावनी।
पाकिस्तान में प्रताड़णा झेलने को विवश हिंदू
पूनम के 61 वर्षीय चाचा भांवरू ने इंडिया टुडे को बताया, ''वह बेहद डरी हुई थी. उसने मुझे बताया कि अब वह मुसलमान बनकर उनके साथ रहने जा रही है.'' पूनम अब मरियम हो गई है.
मासूम पूनम के इस तरह धर्म परिवर्तन पर किसी ने विरोध में आवाज नहीं उठाई, क्योंकि ल्यारी में लगभग सभी हिंदू परिवार वर्षों से इस धार्मिक अत्याचार को झेल रहे हैं.
पाकिस्तान में अपहरण आम बात है. लेकिन 16.8 करोड़ की आबादी वाले मुसलमानों के मुल्क में 27 लाख हिंदुओं के समुदाय को जिस बात ने हिला कर रख दिया है, वह है छोटी उम्र की लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन. बहुत से लोगों का मानना है कि यह काम एक साजिश के तहत किया जा रहा है ताकि बचे-खुचे हिंदुओं को पाकिस्तान से बाहर खदेड़ा जा सके.
सिंध प्रांत में नवाब शाह नामक जगह के 46 वर्षीय सनाओ मेघवार कहते हैं, ''हम चिंतित हैं. हमने अपने बच्चों को भारत या किसी अन्य देश में भेजना शुरू कर दिया है. हम भी जल्द ही यहां से जाने की तैयारी कर रहे हैं.'' उनके लिए चिंतित होने का कारण भी है. स्थानीय एजेंसियों की ओर से किए गए शोध के मुताबिक पाकिस्तान में हर महीने औसतन 25 हिंदू लड़कियों का अपहरण होता है और उनका जबरन धर्म परिवर्तन किया जाता है.
विभाजन के समय 1947 में पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी करीब 15 फीसदी थी, जो अब मात्र 2 फीसदी रह गई है. कई हिंदू पाकिस्तान छोड़ कर चले गए हैं, तो उनसे ज्यादा हिंदू मारे जा चुके हैं और कुछ ने जिंदा रहने के लिए इस्लाम को स्वीकार कर लिया है.
हिंदुओं को सिर्फ अलग मतदाता के तौर पर मतदान की इजाजत है और उन्हें अपनी शादियां पंजीकृत कराने का अधिकार नहीं है. रावलपिंडी में हिंदू समुदाय के मुखिया जगमोहन कुमार अरोड़ा बताते हैं कि देश के कुल 428 मंदिरों में से सिर्फ 26 में ही पूजा-पाठ होता है.
उनकी तकलीफों का यहीं अंत नहीं है. 19 जुलाई, 2010 को रावलपिंडी के श्मशान घाट को, जहां हिंदू और सिख अपने सगे-संबंधियों की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार करते थे, खत्म कर दिया गया. अरोड़ा सवाल करते हैं, ''अगर मस्जिदों को तोड़ कर वहां घर बना दिए जाएं तो मुसलमानों को कैसा लगेगा?''
भारत में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के परिणामस्वरूप होने वाले दंगों के बाद हिंदुओं पर हमले बढ़ गए हैं. पाकिस्तान में हिंदू भारत में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं और कश्मीर में हिंसक वारदात से आम तौर पर सीधे प्रभावित होते हैं.
पाकिस्तान के एक स्वयंसेवी संगठन नेशनल कमीशन फॉर जस्टिस ऐंड पीस की 2005 की रिपोर्ट में पाया गया कि पाकिस्तान स्टडी.ज की पाठ्यपुस्तकों को हिंदुओं के खिलाफ नफरत पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि ''निंदात्मक वैरभाव सैनिक और निरंकुश शासन को वैध बनाता है और घृणा की मानसिकता को जन्म देता है.
पाकिस्तान स्टडी.ज की पुस्तकें भारत को दुश्मन पड़ोसी देश के तौर पर पेश करने में काफी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.'' इसी रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ''पाकिस्तान के अतीत की कहानी जान-बूझ्कर अलग ढंग से लिखी गई है, और यह भारत में इतिहास की जिस तरह व्याख्या की गई है उससे अकसर एकदम उलट होती है. सरकार द्वारा जारी की गई इन पुस्तकों में विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है कि हिंदू पिछड़े और अंधविश्वासी लोग होते हैं.''
एक प्रतिष्ठित पाकिस्तानी विद्वान 61 वर्षीय परवे.ज हूडभाय कहते हैं पाकिस्तानी स्कूलों का इस्लामीकरण 1976 में तब शुरू हुआ जब एक एक्ट ऑफ पार्लियामेंट के तहत जरूरी कर दिया गया कि सभी सरकारी और निजी स्कूल (सिवा उन स्कूलों के जहां ग्रेड 9 से ब्रिटिश ओ-लेवेल पढ़ाया जाता है) ग्रेड 5 के सामाजिक अध्ययन में इस तरह के विषयों को पढ़ाएं- ''पाकिस्तान के खिलाफ काम कर रही ताकतों की पहचान करो'', ''जिहाद, और पाकिस्तान के खिलाफ भारत के बुरे इरादों पर भाषण दो.''
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की परिषद के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अमरनाथ मोटूमल ने इंडिया टुडे को बताया, ''अकेले कराची में हिंदू लड़कियों का अपहरण आम बात है. लोग डरे हुए हैं. ये अपहरण और धर्म परिवर्तन इलाके के प्रभावशाली लोगों द्वारा करवाए जाते हैं. इससे पीड़ित लोग अपनी जान गंवाने के डर से मुंह बंद रखना ही ठीक समझ्ते हैं.''
प्रांतीय विधानसभा के एक पूर्व सदस्य भेरूलाल बलानी भी इस बात से सहमत हैं. वे कहते हैं कि अपहृत की जाने वाली हिंदू लड़कियां ज्यादातर निचले तबके की होती हैं. अधिकारियों का कहना है कि पिछले तीन महीनों में सिंध के दूरदराज के इलाकों में हिंदुओं पर हमले बढ़े हैं. यहां जबरन धर्म परिवर्तन से लेकर बलात्कार और हत्या की कम-से-कम नौ घटनाएं हो चुकी हैं.
एक घटना नगरपारकर इलाके की है. वहां 17 साल की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जबकि एक अन्य वारदात आकली गांव की है, जिसकी एक 15 वर्षीया लड़की का अपहरण करके उसका जबरन धर्म परिवर्तन किया गया. आकली गांव की घटना के बाद तुरंत 71 हिंदू परिवार घर-बार छोड़कर हमेशा के लिए राजस्थान चले गए. सिंध प्रांत के कोटरी कस्बे में हिंदू समुदाय के सदस्यों ने हाल ही में किशोरवय की चार लड़कियों अनीता, किशनी, अजय और सागर के अपहरण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.
पाकिस्तान में हिंदुओं की दुर्दशा की बात इस साल जनवरी में तब सामने आई जब बलूचिस्तान प्रांत के कलात जिले में काला माता मंदिर के पदाधिकारी और हिंदू आध्यात्मिक नेता 82 वर्षीय लक्की चंद गारजी का कुछ अज्ञात लोगों द्वारा उनके अपने ही घर से अपहरण कर लिया गया. उन्हें 50 करोड़ रु. की फिरौती देने के बाद अप्रैल में छोड़ा गया लेकिन यह मामला आज तक अनसुलझा ही रहा.
हिंदुओं के खिलाफ भेदभाव की जानकारी मिलने के बाद पाकिस्तान की 43 वर्षीया सांसद मारवी मेमन ने, जो पाकिस्तान मुस्लिम लीग-.कैद (पीएमएल-क्यू) की सदस्य हैं, इसकी आलोचना की है. वे इसे सरकार की पूरी नाकामी मानती हैं. इस भेदभाव का विरोध करने वाली एकमात्र सांसद मेमन कहती हैं, ''दुख की बात यह है कि इन अपहरणों के परिणामस्वरूप तमाम हिंदू परिवार भारत चले गए हैं. आखिरकार पाकिस्तान में हर समय दहशत में जीने से अच्छा है कि वे दूसरे मुल्क में चले जाएं.
पाकिस्तान में मुस्लिम समुदाय के असरदार लोगों के हाथों हिंदुओं का अपमानित होना आम बात हो चुकी है.'' वे एक घटना के बारे में बताती हैं कि सिंध में किस तरह दिनेश नाम के एक हिंदू लड़के ने मुसलमानों के लिए बनाए गए प्याऊ से पानी पी लिया था तो उसके बाद हिंदू समुदाय के कई लोगों पर हमले किए और उन्हें उनके घरों से जबरन बाहर खदेड़ा गया था. दिनेश के पिता मीरूमल, जो उस हमले के समय मौजूद थे, बताते हैं, ''उसे बुरी तरह पीटा गया था.''
वर्षों तक दब कर रहने के बाद हिंदुओं में अपनी पहचान की भावना खत्म हो चुकी है. मेमन कहती हैं, ''वे ऐसे लोग बन चुके हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं है. अगर पाकिस्तान के हिंदुओं के लिए कोई जागरूकता और चिंता नहीं होगी तो वे बिना आवाज वाले लोग रह जाएंगे और धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे.''
पेशावर के 62 वर्षीय जगदीश भट्टी लंबे समय तक सेना में रहे लेकिन भी भेदभाव से बचाने के लिए कोई गांरटी नहीं थी. उनके बेटों रमेश और लाल को नौकरी पाने के लिए मुस्लिम नाम रखना पड़ा. रमेश (अब अहमद चौहान) एक निजी बहुराष्ट्रीय बैंक में काम करते हैं और लाल (नदीम चौहान) पेशावर जिले में नगरपालिका के अधिकार वाले खाद्य गोदाम में सुपरवाइजर का काम करते हैं.
रमेश भट्टी ने इंडिया टुडे को बताया, ''अपनी पूरी पढ़ाई के दौरान मुसलमान अध्यापकों और सहपाठियों के साथ हमारे रिश्ते अच्छे रहे हैं. लेकिन जब नौकरी पाने के लिए मुस्लिम नाम रखने को कहा गया तो हम दंग रह गए.''
सिंध प्रांत के लरकाना में हिंदू समुदाय के लोग 18 साल की हिंदू छात्रा सुंदरी की त्रासद कहानी बयां करते हैं. 2004 में एक दिन सुंदरी अपने कॉलेज से घर वापस नहीं आई. काफी खोजबीन करने के बाद उसका परिवार पुलिस के पास गया. दो हफ्ते बाद पुलिस ने परिवार को बताया कि सुंदरी एक स्थानीय ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करने वाले कमाल खान के साथ भाग गई है और मुसलमान बन गई है.
सुंदरी के माता-पिता को यह भी बताया गया कि उनकी बेटी अपना नया धर्म घोषित करने के लिए जल्दी ही कोर्ट में हाजिर होगी. कुछ पुलिसकर्मियों और लंबी दाढ़ी वाले कुछ लोगों के साथ सुंदरी अदालत में हाजिर हुई और उसने कहा, ''मैं, सुंदरी, हिंदू माता-पिता की संतान हूं. लेकिन अब वयस्क होकर मुझे एहसास हुआ है कि मैंने जिस धर्म में जन्म लिया वह सही नहीं है. इसलिए अपने पूरे होशो-हवास में, बिना किसी की जोर-जबरदस्ती के मैंने अपने माता-पिता और धर्म से अलग होकर इस्लाम को अपनाने का फैसला किया है.''
जज ने उसके धर्म परिवर्तन को स्वीकार कर लिया और सुंदरी को तुरंत वहां से हटाकर किसी अज्ञात जगह पहुंचा दिया गया. माना जाता है कि उसने बाद में कमाल से शादी कर ली लेकिन जल्दी ही दोनों में तलाक हो गया. इसके बाद उसने पड़ोस के एक और मुस्लिम लड़के से शादी की. वह शादी भी टूट गई. फिर सुंदरी ने तीसरी शादी की. लेकिन इस शादी के कुछ ही दिन बाद उसे रहस्यमय हालत में मृत पाया गया. उसके माता-पिता का मानना है कि उसकी हत्या कर दी गई, जबकि उसके तीसरे पति का कहना है कि उसने खुदकुशी की थी.
कराची में हिंदू पंचायत के सदस्य लालजी मेघवार कहते हैं, ''हिंदू लड़कियों का इस तरह अपहरण आम बात है. इसके बाद लड़कियों को उस कागज पर दस्तखत करने के लिए कहा जाता है, जिसमें लिखा होता है कि वे अपनी मर्जी से मुसलमान बन गई हैं.''
पिछले साल कराची में एक फैक्टरी में काम करने वाले 27 वर्षीय जगदीश कुमार की हत्या उनके कुछ मुस्लिम सहकर्मियों ने कर दी. उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने इस्लाम की निंदा की थी. पुलिस और फैक्टरी के अधिकारियों ने कुमार पर हमले को रोकने का कोई प्रयास नहीं किया. बताया जाता है कि कुमार किसी मुस्लिम लड़की से प्यार करते थे.
सितंबर, 2010 में सिंध प्रांत के हैदराबाद में आयकर निरीक्षक 32 वर्षीय अशोक कुमार दुकानदारों से आयकर इकट्ठा करने गए. टैक्स देना तो दूर, एक दुकानदार ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसे दाढ़ी खींच कर ले जाने की धमकी दी. कुछ ही मिनटों में दुकानदारों ने जुलूस निकालकर मांग की कि अशोक कुमार को सबक सिखाया जाए.
इसके चलते दो दिन की हड़ताल रही. अशोक कुमार को न सिर्फ नौकरी से निलंबित कर दिया गया, बल्कि इस्लाम की तौहीन के जुर्म में उन्हें कैद की स.जा सुनाई गई. एक सूत्र का कहना है कि तभी से वे और उनका परिवार गायब है.
उसी महीने में आंख के विशेषज्ञ 52 वर्षीय डॉ. कन्हैया लाल का लरकाना में अपहरण कर लिया गया. उन्हें पांच लाख रु. की फिरौती पर छोड़ा गया. लरकाना जिले के बदाह कस्बे में एक और हिंदू दर्शन लाल (50 वर्ष) ने जब अपने अपहरण का विरोध किया तो उनकी हत्या कर दी गई. पिछले पांच वर्षों में सुक्कुर से कम-से-कम 23 जाने-माने हिंदुओं का अपहरण किया जा चुका है.
पुलिस अधिकारियों ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर इंडिया टुडे को बताया कि कई हिंदू जबरन वसूली करने वाले गिरोहों को नियमित भत्ता (सुरक्षा शुल्क) देते हैं. पाकिस्तान में हिंदुओं का कहना है कि सरकार और न्यायपालिका की उपेक्षा के कारण उनकी असुरक्षा और बढ़ गई है.
इस्लामाबाद के एक राजनीति विश्लेषक पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताते हैं, ''भारत-पाकिस्तान युद्ध से लेकर बाबरी मस्जिद ढहाए जाने तक पाकिस्तान में हिंदुओं को दुश्मन के रूप में देखा जाता रहा है और उन पर जुल्म किया जाता रहा है.'' वे हाल ही में एक अखबार के संपादक के साथ एक हिंदू कारोबारी के झ्गड़े का हवाला देते हैं, जिसमें उस व्यापारी ने संपादक को कार देने से इनकार कर दिया था.
उस अखबार ने अगले ही दिन अपने संपादकीय में उस व्यापारी को आतंकवादियों को हथियार मुहैया कराने वाला भारतीय एजेंट बता दिया. सिंध के कंधकोट शहर में एक हिंदू व्यापारी का कहना है, ''50 वर्षों से हमें वानियो या बनिया कहकर संबोधित किया जाता है, जिसे इस इलाके में अपमानजनक शब्द माना जाता है.''
इस संस्थागत भेदभाव को खत्म करने की मांग करते हुए पाकिस्तान के अनुसूचित जाति अधिकार आंदोलन (एससीआरएम) ने हिंदू विवाह के पंजीकरण की अनुमति के कानून बनाने पर जोर दिया है. पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की ओर से 23 नवंबर, 2010 के एक आदेश में सरकार से हिंदू विवाहों को वैध बनाए जाने वाला कानून तैयार करने के लिए कहा गया है.
एससीआरएम ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने कदम नहीं उठाया तो इस मुद्दे को सामने लाने के लिए देश भर में हस्ताक्षर अभियान शुरू किया जाएगा. हिंदू महिलाएं अकसर कंप्यूटरीकृत राष्ट्रीय पहचान पत्र (सीएनआइसी) के मामले में भेदभाव की शिकायत करती रही हैं.
कराची की 45 वर्षीया संगीता देवी कहती हैं, ''अगर हम विवाह का पंजीकरण प्रमाणपत्र नहीं दिखा सकते हैं तो हम सीएनआइसी हासिल करने के अधिकारी नहीं हैं. और इस तरह हमें मतदान का अधिकार नहीं मिल सकता. हमारे पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है.'' संगीता हिंदू विवाह के पंजीकरण की मांग करने वाले अभियान की अगुआ रही हैं. दक्षिणी पंजाब के रहीम यार खान में रहने वाली 34 वर्षीया हिंदू महिला शामी माई कहती हैं, ''तलाक या घरेलू हिंसा के मामले में हिंदू महिला कोई शिकायत नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास अपनी शादी को कोई दस्तावेज ही नहीं होता है.
अगर वह अदालत को यही नहीं बता पाएगी कि उसका पति कौन है तो अदालत उसकी समस्या पर कैसे विचार करेगी.'' यहां तक कि हिंदू महिलाओं के लिए सफर करना भी एक समस्या है. इस्लामाबाद की 37 वर्षीया नैना बाई की शिकायत है, ''अगर हम किसी होटल में रुकते हैं तो पुलिसवाले और होटल के कर्मचारी हमारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं. हमें मजबूरी में फुटपाथ पर रातें गुजारनी पड़ती हैं.''
अगर किसी राष्ट्र के चरित्र की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने यहां के अल्पसंख्यकों के साथ क्या सलूक करता है, तो पाकिस्तान में हिंदुओं की दुर्दशा के मद्देनजर उसे एक नाकाम मुल्क कहना गलत नहीं होगा.
कुत्ते की टेढ़ी पूँछ पाकिस्तान तथा विदेश मंत्रालय और मीडिया से बेहतर आवारा कुत्ते……
हाल ही में भारतीय सेना की इंटेलिजेंस कोर ने सीमापार से जो रेडियो संदेश पकड़े हैं उनके मुताबिक पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी ISI ने कश्मीर में आतंकवादियों को रास्ता दिखाने वाले और सीमा पार करवाने वाले “भाड़े के टट्टुओं” यानी गाइडों का भत्ता चार गुना बढ़ा दिया है। पहले एक बार आतंकवादियों के गुट को सीमा पार करवाने पर गाइड को 25,000 रुपये मिलते थे, लेकिन अब ISI (ISI Pakistan) ने इसे बढ़ाकर सीधे एक लाख रुपये कर दिया है।
विगत कुछ माह से भारतीय सेना ने जिस प्रकार आतंकवादियों पर अपना शिकंजा कसा है और आतंकवादियों के घुसने के रास्तों पर पहरा और चौकसी बढ़ाई है, उसे देखते हुए घुसपैठ में काफ़ी कमी आई है। इसीलिये ISI को अपने कश्मीरी गाइडों का भत्ता बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा है। अमूमन गर्मियों में जब बर्फ़ पिघलती है तब भारी संख्या में आतंकवादी भारत में घुसने में कामयाब हो जाते हैं, जबकि ठण्ड में बर्फ़बारी की वजह से कई पहाड़ी रास्ते बन्द हो जाते हैं। परन्तु इन गर्मियों में पाकिस्तान को आतंकवादी इधर ठेलने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि भारतीय सुरक्षा बलों (Indian Army in Kashmir) ने छोटे-छोटे रास्तों पर जमकर पहरेदारी की है, और जंगल में चरवाहों के भेष में भटकने वाले “गाइडों” को खदेड़ दिया है। मजबूरी में ISI ने एक फ़ेरे की फ़ीस बढ़ाकर एक लाख कर दी है, फ़िर भी उन्हें गाइड आसानी से नहीं मिल रहे हैं…
खुफ़िया सूचना के मुताबिक इस समय पाक के “अनधिकृत कब्जे वाले” (Pakistan Occupied Kashmir) कश्मीर में लगभग 45 ट्रेनिंग कैम्प चल रहे हैं जिसमें 2000 आतंकवादी भारत में घुसने का इंतज़ार कर रहे हैं, ISI को इन्हें खिलाना-पिलाना और पालना-पोसना महंगा पड़ता जा रहा है। भारतीय सुरक्षा बलों ने ऊँची-ऊँची पहाड़ियों पर स्थित रास्तों को खतरनाक आतंकवादियों के लिये मुश्किल बना दिया है। लेकिन ISI और पाकिस्तान, कुत्ते की उस टेढ़ी पूँछ के समान हैं जिसे 25 साल तक एक सीधी नली में डालकर भी रखा जाये तब भी बाहर निकालने पर टेढ़ी ही रहेगी…
इसी “टेढ़ी पूँछ” को मोहाली में अपने पास बैठाकर, घी-मक्खन लगाकर सीधी करने की बेवकूफ़ाना कोशिश, कुछ “परम आशावादी” नॉस्टैल्जिक सेकुलर्स और अमन की आशा पाले बैठी कुछ नाजायज़ औलादें करेंगी…
अब बात कुत्तों की चली है, तो एक और खबर…
भारतीय सेना ने कश्मीर घाटी में आवारा कुत्तों (Stray Dogs in Kashmir) की हत्या और उनके गायब होने के सम्बन्ध में जाँच शुरु कर दी है। श्रीनगर में पिछले एक वर्ष में ऐसा देखने में आया है कि आवारा कुत्तों के समूह के समूह अचानक मृत पाये जाते हैं या गायब हो जाते हैं। सीमारेखा पर स्थित गाँवों में यह स्थिति बार-बार देखने में आई है। सेना की दसवीं डिवीजन के प्रवक्ता लेफ़्टिनेंट कर्नल एनके आयरी ने कहा है कि यह आवारा कुत्ते (जिन्हें आवारा कहना भी एक तरह की क्रूरता है) सेना के जवानों के लिये काफ़ी मददगार सिद्ध हो रहे हैं, रात के समय किसी भी संदिग्ध गतिविधि को देखकर ये कुत्ते भौंककर जवानों को आगाह कर देते हैं। सेना के कई अफ़सरों को ये कुत्ते बेहद प्रिय हैं।
हबीब रहमान नामक सेना से रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट बताते हैं कि यह आवारा कुत्ते आसानी से सीख जाते हैं, इन्हें खाने-खिलाने का खर्च भी कम है तथा रात को इन्हें बिना किसी खतरे के इधर-उधर घूमने के लिये खुला भी छोड़ा जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह कि इन्हें सेना के विशालकाय कुत्तों की तरह आसानी से पहचाना भी नहीं जा सकता कि ये जवानों के मददगार हैं। परन्तु सेना की मदद करने की वजह से पिछले कुछ समय से इन कुत्तों की सामूहिक हत्या शुरु हो गई है। मेजर जनरल अशोक मेहता (रिटायर्ड) ने काफ़ी पहले अपने एक लेख में कृपा नामक एक कुत्ते का जिक्र किया है जिसे पहाड़ों मे घूमते समय वे पकड़ लाये थे। नियंत्रण रेखा पर गोरखा राइफ़ल्स का वह प्रिय कुत्ता था और उसने कई आतंकवादियों और घुसपैठियों को ढेर करने में मदद की थी।
आंध्रप्रदेश के DGP स्वर्णजीत सेन ने भी नक्सलवादियों के इलाकों में स्थित पुलिस थानों को ऐसे ही आवारा कुत्तों को पालने और उन्हें अपना “मित्र” बनाने की सलाह दी थी और उसके नतीजे भी काफ़ी अच्छे मिले हैं। माओवादियों (Maoists in India) और नक्सलवादियों ने कुत्तों की इस “जागते रहो” मुहिम से चिढ़कर अन्दरूनी गाँवों में कुत्तों का सफ़ाया करना शुरु कर दिया, और गाँववालों को भी धमकियाँ दी हैं कि वे गाँव में एक भी कुत्ता न रखें।
आवारा कुत्तों की संख्या में कमी लाने हेतु Animal Welfare Board ने इनकी नसबन्दी करने का प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर सरकार को भेजा है, लेकिन सरकार की तरफ़ से अभी तक कोई सहमति नहीं मिली है। इसकी बजाय सरकार में बैठे कुछ “संदिग्ध लोग” “कुत्तों को मार देने” जैसे प्रस्ताव की माँग कर रहे हैं (Stray Dogs killing in Kashmir) । विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि कुत्तों को मारने की बजाय संख्या में कमी के लिये उनकी नसबन्दी ही अधिक कारगर उपाय है, परन्तु सीमापार से आने वाले आतंकवादियों के लिये यही आखिरी रास्ता बचता है कि वे दूरदराज के गाँवों से धीरे-धीरे कुत्तों को मारते चलें, ताकि सुरक्षा बलों पर निशाना साधने में आसानी हो…।
इधर भारतीय सुरक्षा बल मुस्तैदी से घुसपैठ भी रोक रहे हैं और उनकी मदद करने वाले इन कुत्तों से दोस्ती भी बढ़ा रहे हैं… जबकि उधर मोहाली में “अमन की आशा” (Aman ki Asha) करने वाले सेकुलर्स, वोटों की खातिर अपने देश की सुरक्षा को खतरे में डालकर 6500 स्पेशल वीज़ा जारी कर रहे हैं…
आम आदमी यह सोच-सोचकर उबला जा रहा है कि मुम्बई हमले (Mumbai Terror Attack 26/11) में शहीद हुए 150 से अधिक परिवारों के दिल पर क्या गुज़रेगी, जब मनमोहन सिंह हें-हें-हें-हें-हें-हें करते हुए गिलानी का स्वागत करेंगे…।
अब आप ही बताईये कश्मीर में सेना की मदद करने वाले आवारा कुत्ते ज्यादा बेहतर और आदरणीय हैं, या “क्रिकेट डिप्लोमेसी” नाम की फ़ूहड़ता परोसने वाले विदेश मंत्रालय के अधिकारी और घोटालों-अपराधों को भुलाकर क्रिकेट-क्रिकेट भजने वाले मीडिया के घटिया भाण्ड…? आपसे अनुरोध है कि मीडिया के पागलों, भ्रष्ट नेताओं और मूर्ख अफ़सरों को चाहे कुछ भी सम्बोधन दें, लेकिन "कुत्ता" न कहें, प्रशिक्षित हों या आवारा… निश्चित रुप से कुत्ते इनसे बेहतर हैं।
Suresh Chiplunkar
काश, मनमोहन सिंह ने भारत-पाक मैच, पान की दुकान पर देखा होता…
भारत और पाकिस्तान के बीच बहुप्रतीक्षित मैच अन्ततः 30 मार्च को सुखद अन्त के साथ सम्पन्न हो गया। 26/11 के मुम्बई हमले के बाद पाकिस्तान के साथ भारत का यह पहला ही मुकाबला था, इसलिये स्वाभाविक तौर पर भावनाएं उफ़ान पर थीं। रही-सही कसर भारत के अधकचरे इलेक्ट्रानिक मीडिया (जो कि परम्परागत रूप से मूर्खों, बेईमानों, चमचों से भरा है) ने इस मैच को लेकर जिस तरह अपना “ज्ञान”(?) बघारा तथा बाज़ार की ताकतों (जो कि परम्परागत रूप से लालची, मुनाफ़ाखोर और देशद्रोही होने की हद तक कमीनी हैं) ने इस मौके का उपयोग अपनी तिजोरी भरने में किया… उस वजह से इस मैच के बारे में आम जनता की उत्सुकता बढ़ गई थी।
इस माहौल का लगे हाथों फ़ायदा उठाने में कांग्रेस सरकार, मनमोहन सिंह, विदेश मंत्रालय के अफ़सरों (Foreign Ministry of India) और सोनिया-राहुल ने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। मीडिया भी 7-8 दिनों के लिये इस ओर व्यस्त कर दिया गया, आगामी 5 राज्यों के चुनाव (Assembly elections in India) को देखते हुए पाकिस्तान को पुचकारने (प्रकारान्तर से खुद के मुँह पर जूता पड़वाने) का इससे बढ़िया मौका कौन सा मिल सकता था। यह कांग्रेस की घटिया और नीच सोच ही है कि उसे लगता है कि पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध बनाने पर भारत के मुसलमान खुश होंगे, यह घातक विचारधारा है, लेकिन मीडिया इसकी परवाह नहीं करता और कांग्रेस की “अखण्ड चमचागिरी” में व्यस्त रहता है।
सो, पाकिस्तान से दोस्ती (India-Pakistan Relations) की कसमें खाते, कुछ “नॉस्टैल्जिक” किस्म के अमन की आशा वाले “दलालों” की सलाह पर, मौके का फ़ायदा(?) उठाने के लिये मनमोहन सिंह ने उस व्यक्ति को मैच देखने भारत आने का निमंत्रण दे दिया, जो लगातार पिछले दो साल से पाकिस्तान में छिपे बैठे 26/11 के मुख्य अपराधियों और षडयंत्रकारियों को बचाने में लगा हुआ है, भारत की कूटनीतिक कोशिशों पर पानी फ़ेरने में लगा हुआ है, अमेरिका से हथियार और पैसा डकारकर भारत के ही खिलाफ़ उपयोग करने में लगा है। अफ़ज़ल खान की तरह शिवाजी की पीठ में छुरा घोंपने की मानसिकता बनाये बैठे यूसुफ़ रज़ा गिलानी (Yousuf Raza Gilani) के साथ बुलेटप्रूफ़ काँच के बॉक्स में मैच देखने में मनमोहन सिंह को ज़रा भी संकोच अथवा शर्म नहीं आई। (26/11 Mumbai Attacks)
यह एक सामान्य सिद्धांत है कि जो नेता अपनी जनता की भावनाओं को समझ नहीं सकता, उसे नेता बनकर कुर्सी से चिपके रहने का कोई हक नहीं है। आम जनता की भावना क्या है, यह 30 मार्च की रात को समूचे भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी और गुवाहाटी से राजकोट तक साफ़ देखी जा सकती थी, और जो इस जनभावना के ज्वार को नहीं पढ़ पा रहे हैं, ऐसे नेता पक्ष और विपक्ष में अपनी राजनैतिक गोटियाँ बैठाने में लगे हुए हैं। पाकिस्तान का हर विकेट गिरने पर पटाखे छोड़ने वाले, मैच जीतने के बाद आतिशबाजी करने वाले, अपनी-अपनी गाड़ियों पर तिरंगा लहराते, “हिन्दुस्तान जिंदाबाद” (सेकुलरों का मुँह भले यह सुनकर कड़वा हो, लेकिन हकीकत यही है कि “इंडिया-इंडिया” की बजाय “भारत माता की जय” तथा “हिन्दुस्तान जिन्दाबाद” का ही जयघोष चहुँओर हुआ) नारे लगाते बड़े-बूढ़े, हिन्दू-मुस्लिम, नर-नारियाँ जिस “भावना” का प्रदर्शन कर रहे थे, उसे कोई बच्चा भी समझ सकता था। यदि मनमोहन सिंह ने गली-नुक्कड़ की पान की दुकानों पर खड़े होकर मैच देखा होता तो वे जान जाते कि आम आदमी उनके बारे में, पाकिस्तान के बारे में, पाकिस्तान के खिलाड़ियों के बारे में, तथाकथित गंगा-जमनी वाले फ़र्जियों के बारे में… किस भाषा में बात करता है और क्या सोच रखता है।
उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग जानते हैं कि होली (Holi Festival in India) खेलने के दौरान कैसी गालियों से युक्त भाषा का उपयोग किया जाता है, सोनिया-राहुल अपना एसी बॉक्स छोड़कर ग्रामीण कस्बे के किसी चौराहे पर मैच देखते तो जान जाते कि लोगों ने दीपावली तो मैच जीतने के बाद मनाई थी, होली पहले मनाई… अर्थात “होली के माहौल वाली भाषा” पूरे मैच के दौरान जारी थी। कामरान अकमल का विकेट गिरने से लेकर मिस्बाह का विकेट गिरने तक हर बार तथा स्क्रीन पर कभीकभार दिखाये जाने वाले यूसुफ़ रज़ा गिलानी का दृश्य देखते ही पान की दुकान पर जिस प्रकार की गालियों की बौछार होती थी, उन सभी गालियों को उनके अलंकार सहित यहाँ लिखना नैतिकता के तकाजे की वजह से असम्भव है। परन्तु 30 मार्च को जिसने भी “आम जनता” के साथ मैच देखा और धारा 144 तथा बड़ी स्क्रीन नहीं, डीजे नहीं, अधिक शोर नहीं… जैसे विभिन्न सरकारी प्रतिबन्धों को सरेआम धता बताकर जैसा जश्न मनाया… उसका संदेश साफ़ था कि पाकिस्तान नाम के “खुजली वाले कुत्ते” से अब हर कोई परेशान है और उसे लतियाना चाहता है, दबाना और रगेदना चाहता है… परन्तु इस भावना को न तो अटल जी समझने को तैयार थे, न मनमोहन सिंह समझने को तैयार हैं, और न ही आडवाणी।
यदि मोहाली में मैच शुरु होने से पहले दोनों प्रधानमंत्री हमारे शहीद जवानों के सम्मान में दो मिनट का मौन रखते, अथवा मुम्बई हमले में मारे गये शहीदों की याद में दीपक प्रज्जवलित किये जाते, अथवा पाकिस्तान से विरोध प्रदर्शित करने के लिये कम से कम 20-25 हजार दर्शक और सोनिया-राहुल स्वयं काली पट्टी बाँधकर आते… परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ… इसी से साबित होता है कि हमारे देश के नेताओं की "कथित देशभक्ति" कितनी संदिग्ध है… और उनमें पाकिस्तान के समक्ष कोई "कठोर" तो छोड़िये, हल्का-पतला प्रतीकात्मक प्रतिरोध करने लायक "सीधी रीढ़ की हड्डी" भी नहीं बची है।
ड्राइंगरूमों में बैठकर चैनलों की स्क्रिप्ट लिखने वाले तथाकथित “अंग्रेजीदां बुद्धिजीवी” भी कभी इस भावना को नहीं समझ सकते। हमने पाकिस्तान को 4-4 बार युद्ध में हराया है और विश्वकप के मुकाबलों में भी 5 बार हराया है, हमने पाकिस्तान के दो टुकड़े किये हैं (चार टुकड़े और भी करने की क्षमता है), परन्तु कश्मीर के जिस नासूर को पाकिस्तान ने लगातार 60 साल से लहूलुहान रखा है, कभी दाऊद इब्राहीम, टाइगर मेमन तो कभी अफ़ज़ल गुरुओं-कसाबों के जरिये जिस तरह लगातार कीलें-काँटे चुभाता रहा है… अब उससे “आम जनता” आज़िज़ आ चुकी है…। पान की दुकान पर रखे टीवी पर चलते मैच के दौरान होने वाली "देसी गालियों से लैस" अभिव्यक्तियों के स्वर यदि समय रहते देश के कर्णधारों के “तेल डले कानों” तक पहुँच जाये तो ज्यादा अच्छा रहेगा…
पाकिस्तान को हराने पर आपने जश्न मनाया, पटाखे फ़ोड़े, मिठाईयाँ बाँटी, रैली निकाली, हॉर्न बजाये, तिरंगे लहराये… कोई शिकायत नहीं है। कुछ लोगों ने इस उन्मादी क्रिकेट प्रेम पर यह कहकर नाक-भौंह सिकोड़ी कि ये सब बकवास है, देश जिन समस्याओं से जूझ रहा है उसे देखते हुए ऐसा भौण्डा जश्न मनाना उचित नहीं है… परन्तु ऐसे शुद्धतावादियों से मैं सिर्फ़ इतना ही कहना चाहता हूँ कि आम जनता के जीवन में इतने संघर्ष हैं, इतने दुःख हैं, इतनी गैर-बराबरी है कि उसे खुशी मनाने के मौके कम ही मिलते हैं, इसलिये भारत-पाक क्रिकेट मैच के जरिये थोड़ी देर की “आभासी” ही सही, खुशी मनाने का मौका उन्हें मिलता है। अपना गुस्सा व्यक्त करने की कोई संधि या कोई मौका-अवसर इन आम लोगों के पास नहीं है, इसलिये वह गुस्सा पाकिस्तान के खिलाफ़ मैच के दौरान निकल जाता है… इसलिये मैं कहना चाहता हूँ कि देशभक्ति का यह प्रदर्शन, खुशियाँ, नारेबाजियाँ इत्यादि सब कुछ, सब कुछ माफ़ किया जा सकता है, बशर्ते यह भावना “पेशाब के झाग” की तरह तात्कालिक ना हो, कि ‘बुलबुले की तरह उठा और फ़ुस्स करके बैठ गया”।
दुर्भाग्य से हकीकत यही है कि हमारी राष्ट्रवाद और देशप्रेम की भावना, पेशाब के झाग की तरह ही है… मैच जीतने का जश्न खत्म हुआ, पाकिस्तान और ज़रदारी-गिलानी को गालियाँ देने का दौर थमा और अगले दिन से आम आदमी वापस अपनी “असली औकात” पर आ जाता है, उसे देश को लूटने वालों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, उसे उसका जीवन दूभर करने वाले नेताओं से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, उसके बच्चों का जीवन अंधकारमय बनाने वाले भ्रष्टाचार से कोई फ़र्क नहीं पड़ता… तो फ़िर ऐसी देशभक्ति(?) का क्या फ़ायदा जो घण्टे-दो घण्टे हंगामा करके “बासी कढ़ी के उबाल” की तरह बैठ जाये?
भारत-पाकिस्तान के मैच ने दोनों वर्गों (शासकों और शासितों) को साफ़ संदेश दिया है –
शासकों :- जनभावना को समझो, उसका सम्मान करो और तदनुसार आचरण करो…
जबकि ऐ शासितों और शोषितों :- देशभक्ति और राष्ट्रवाद कोई हॉट डॉग या इंस्टेंट फ़ूड नहीं है कि खाया और भूल गये… यह भावना तो “अचार-मुरब्बे” की तरह धीरे-धीरे पकती है, “असली स्वाद के साथ अन्दर तक उतरती है” और गहरे असर करती है। यदि भ्रष्टाचार, महंगाई, अनैतिकता, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, अत्याचार, देश की खुली लूट देखकर भी आपका खून नहीं खौलता, तो मान लीजिये कि 30 मार्च की रात जो आपने दर्शाया वह फ़र्जी देशप्रेम ही था… और पेशाब के झाग की तरह वापस चुपचाप अपने घर बैठ जाईये, काम पर लग जाईये…। यदि घोटालों, घपलों, स्विस बैंक, हसन अली, सत्ता के नंगे नाच, कांग्रेस-वामपंथियों के आत्मघाती सेकुलरिज़्म, को यदि आप भूल जाते हैं तो “देशभक्ति के बारे में सोचने” के लिये अगले भारत-पाक मैच का इन्तज़ार कीजिये…
Suresh Chiplunkar



