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शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

कुम्भ : परंपरा , इतिहास एंव वर्तमान

कुम्भ शब्द का अर्थ ही होता है अमृत का घड़ा यानि ज्ञान का घड़ा और कुम्भ प्रथा से स्पष्ट अभिप्राय है , ज्ञान के घड़े का सदुपयोग . हमारा राष्ट्र भारत आदिकाल से ही संतो , ऋषियों और मुनियों की धरती रही है . इस देश की धरती ने कालिदास जैसे मूर्खो को भी ज्ञानी बनाया है . भारत राष्ट्र पुरे विशव को अज्ञानता रूपी अंधकार से ज्ञानरुपी प्रकाश की और लता रहा है . जिससे विशव गुरु से भी यह राष्ट्र विभूषित हुआ है . जिस समय यूरोपे के लोग जंगलो में निर्वस्त्र भ्रमण करते हुए कच्चा मास खाते थे . उस समय इस देश में गंगा सिन्धु के तटों पर बच्चे बच्चे वेड पुरानो को कंटस्थ करते थे . कुम्भ प्रथा भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है .

स्कंध पूरण और रुद्रयामल तंत्र और अन्य अनेक ग्रंथो में वर्णित है की किसी समय देश के 12 स्थानों पर कुम्भ का आयोजन होता था . वैदिक युग में सिमरिया (बिहार ) गुवाहाटी (असम ) कुरुक्षेत्र (हरयाणा ) पूरी (ओडिशा ) गंगा सागर (बंगाल ) द्वारिका (गुजरात ) कुम्भ्कोनाम (तमिलनाडु ) रामेश्वरम (तमिलनाडु ) हरिद्वार (उत्तराखंड ) प्रयाग (उत्तर प्रदेश ) उज्जैन (मध्य प्रदेश ) नाशिक (महाराष्ट्र ). लेकिन दुःख के साथ ये कहना पड़ता है की नियति के चक्र , विदेशी कुचक्रो और इन सबसे ऊपर परंपरा के प्रति भारतीयों की उदासीनता के कारण देश के सबसे बड़े इन आयाजनो में से मात्र चार (हरिद्वार , प्रयाग , उज्जैन एंव नाशिक ) को ही हम बचा पाए और 8 स्थानों पर लगने वाले कुम्भ पर्वो का लोप हो गया .

वैसे मूल संकल्पना की बात करें तो ज्योतिस में कुम्भ एक योग है . जिसमे खगोलीय रूप से जब सूर्य , चंद्रमा और ब्रहस्पति एक राशी में आते है तो कुम्भ योग बनता है , दरअसल मानव जीवन पर इन दोनों ग्रहों और चंद्रमा का विशेष प्रभाव मन गया है . और इस विशेस खगोलीय अवशता में गंगा में स्नान का महत्त्व 12 साल के स्नान के बराबर मन गया है . इन्ही बातो के आधार पर प्रत्येक वर्ष के 12 मास में भारत की एकता और अखंडता को ध्यान में रखते हुए देश के 12 स्थानों पर नदियों के किनारे कुम्भ का संकल्प लिया गया . वर्ष के 12 मास में 12 राशियाँ जिनमे से प्रत्येक 12 वर्ष पर ब्रहस्पति का शुभागमन होने से 12 -12 साल के बाद महाकुम्भ का आयोजन होने लगा . इस हिसाब से एक स्थान पर 12 साल के बाद महाकुम्भ का योग होने लगा और हर साल कहीं न कहीं महाकुम्भ का योग बनता रहा . 12 मास में एक कार्तिक मास भी है जिसमे तुला संक्रांति में ब्रहस्पति का योग होने से महाकुम्भ उद्गोषित हुआ .

भारत अगर आज कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी और गुजरात से ले कर गुहाटी तक एक राष्ट्र है तो ये किसी राजनितिक एंव प्रशासनिक व्यवश्ता के कारण नहीं बल्कि इस देश की धरम प्राण संस्कृति के कारण है . इतिहास में भी सैकड़ो राजाओ के होते हुए भी ये एक ही राष्ट्र था . इस धरम प्राण देश की तासीर को समझने वाले कहते है की कुम्भपर्व की परंपरा का लोप होना भारत की सबसे बड़ी हानी रही है . सिर्फ यही नहीं देश के अन्दर और बहार के प्रत्यक्ष और परोक्ष कई आघातों ने धर्म से जुड़े हमारे मूल्यों और परम्परो को प्रभावित करने की कोशिशे की और किसी रूप में ये आज भी जरी है . पर इतिहास सखी है की इस धर्म ध्वजा को उखाड़ने की कोशिशो को हर बार नाकामी ही मिली है .

समय चक्र के साथ बदलाव नियति का अभिन्न हिस्सा रहा है और परम्पराएं इससे अछूती नहीं रह सकती . कुम्भ पर्व के साथ भी ऐसा ही हुआ . कई कारणों से कालान्तर में सिर्फ चार स्थानों पर ही कुम्भपर्व बचा रह पाया और बाकि जगहों पर या तो इसका लोप हो गया या फिर परम्पराव में परिवर्तन हो गया .

वर्तमान में चार कुम्भो के बाद सबसे सटीक कुम्भ परंपरा कहीं पर बची है तो वो तमिलनाडु के कुम्भ्कोनम में विदमान है . जैसा की नाम से ही ज्ञान पड़ता है की कुम्भ के कारण ही इस जगह का नाम कुम्भ्कोनम पड़ा . कुम्भ्कोनम में आयोजित होने वाले कुम्भ को महामहम कहा जाता है . इसे दक्षिण भारत का कुम्भ भी कहा जाता है . अंतिम महामहम कुम्भ का आयोजन मार्च 2004 में हुआ था तथा अगले कुम्भ का आयोजन 2016 में होने वाला है .

महामहम कुम्भ का निर्धारण भी मुख्य चारो कुम्भो की तरह खगोलीय घटनाओ के आधार पर ही होता है . महामहम पर्व के दोरान लाखो हिन्दू कुम्भाकोनम में आते है . इस पर्व की शुरुआत पवित्र महामहम कुंड में इसनान से शुरू होती है . जिसके पश्चात् तीर्थयात्री पवित्र कावेरी के घटो पर जा कर उसमे दुबकी लगते है . इस पर्व के दौरान कुम्भाकोनम के प्राचीन मंदिरों से देवताओ की पालकियो को निकला जाता है . एंव पूरी की रथयात्रा की तर्ज पर एक विशाल रथयात्रा यहाँ भी निकली जाती है . धार्मिक ग्रंथो में कुम्भाकोनम को काशी से भी पवित्र बताया गया है . स्थानीय लोक मान्यताओ के अनुसार काशी सभी पापियों के पाप धोती है . और जो व्यक्ति काशी में पाप करता है उसके पाप केवल कुम्भाकोनम में धुलते है .

परन्तु ये भी एक विडंबना है की जहाँ एक और चार कुम्भो में पूरा देश उमड़ता है , वहीँ इस दक्षिण के कुम्भ के बारे में ज्यादा जानकारी भी लोगो को नहीं है . जबकि शास्त्रों के अनुसार इस कुम्भ का महत्त्व किसी भी तुलना में बाकि चारो कुम्भो से कम नहीं है . आज जरुरत 12 कुम्भो में से बचे हुए इस पांचवे कुम्भ को भी इसका पवित्र स्थान दिलाने की है . इस देश के संत समाज को इस बारे में जरुर सोचना चाहिए , खासकर अखाडा परिषद् और शंकराचार्यों को , ताकि कुम्भ परंपरा का पुनः प्रवाह उत्तर से दक्षिण की और हो सके . और इस देश की धरम प्रधान संस्कृति को पुनः इसका एतिहासिक गौरव प्रदान हो सके .

इस कुम्भ से न केवल धार्मिक एकता को बल मिलेगा अपितु इस देश की सांस्कृतिक एकता को भी बल मिलेगा . तथा उत्तर दक्षिण की खाई को भी पाटने में मदद मिलेगी. क्योंकि इस देश की एकता इस देश की धार्मिक संस्कृति में विदमान है न की किसी और में .



Vikas Singhal


रविवार, 28 अगस्त 2011

वंदे मातरम और इस्लाम

घटना 30 दिसंबर 1939 की है। पांडिचेरी में योगी श्रीअरविन्द संध्याकाल अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे। तभी किसी ने नए समाचारों की चर्चा करते कहा, “कुछ लोगों को ‘वंदे मातरम’ के राष्ट्रीय गान होने में आपत्ति है और कुछ कांग्रेसी उस के कुछ पदों को निकाल देने के पक्ष में हैं।” इस पर श्रीअरविन्द ने टिप्पणी की, “उस स्थिति में हिन्दुओं को अपनी संस्कृति छोड़ देनी चाहिए।” शिष्य ने यह भी बताया कि वंदे-मातरम गान का विरोध क्यों है, “तर्क यह है कि इस गान में दुर्गा आदि हिन्दू देवी-देवताओं की बात कही गई है जो मुसलमानों के लिए अप्रिय है।”

तब श्रीअरविन्द ने समझाया, “लेकिन यह धार्मिक गान नहीं है। यह एक राष्ट्रीय गान है और राष्ट्रीयता के भारतीय स्वरूप में स्वभावतः हिन्दू दृष्टि रहेगी। अगर इसे यहाँ स्थान न मिल सके तो हिन्दुओं से कहा जा सकता है कि वे अपनी संस्कृति छोड़ दें। … हिन्दू अपने भगवान की पूजा क्यों न करें? अन्यथा हिन्दुओं को या तो इस्लाम स्वीकार कर लेना चाहिए या यूरोपीय संस्कृति या फिर नास्तिक बन जाना चाहिए।”

आज उस प्रसंग से क्या कोई शिक्षा मिलती है? यह भी जान लें कि उस समय उठे विरोध के बाद कांग्रेस ने इस गीत का केवल पहला अंश गाने का निर्णय किया, ताकि ‘देवी-देवताओं’ संबंधी मुसलमानों की आपत्ति खत्म हो जाए। उस समय तक वंदे-मातरम गान अपने तीनों अंतरों समेत पूरा गाया जाता था। किन्तु इस्लामी आपत्ति को देखते हुए इस गीत के बाद वाले दो अंतरे गाना बंद कर दिया गया। इस से मुस्लिम नेता संतुष्ट हुए। किन्तु कुछ समय बीतने बाद कहा गया कि यह पूरा गीत ही आपत्तिजनक है। पुनः कांग्रेस द्वारा आपत्तियों को संतुष्ट करने का ही प्रयत्न किया जाता रहा। अंततः सारी आपत्तियों का एकमुश्त हल करने हेतु मुसलमानों का अलग देश ही बना दिया गया!

तब श्रीअरविन्द वाली बात ही फलीभूत हुई। कम से कम पश्चिमी पंजाब और पूर्वी बंगाल में लाखों हिन्दुओं को अपनी संस्कृति और धरती या प्राण तक छोड़ देने पड़े। जो इस्लाम कबूल कर जिए, उन्होंने तो संस्कृति छोड़ी ही। किन्तु समस्या खत्म नहीं हुई। शेष बचे भारत में (जो विभाजन के तर्क से केवल हिन्दुओं का देश होना था), कुछ ही समय बाद फिर से वही आपत्तियाँ शुरू हो गईं। और फिर वही तुष्टीकरण! इस बीच कश्मीर में हिन्दुओं को अपनी संस्कृति, धरती और प्राण छोड़ देने पड़े। असम, बंगाल, केरल आदि के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी शनैः-शनैः वही हो रहा है। इस्लामी पक्ष से आपत्ति और हिन्दू पक्ष का खात्मा, यह ऐतिहासिक प्रक्रिया लगभग सौ साल से चल रही है। इस का अंत किस प्रकार होगा?

इस वृहत प्रश्न को ध्यान में रखकर पुनः वंदे-मातरम गान पर आएं। यह बंग-भंग (1905) के विरुद्ध आंदोलन के समय से ही भारतीय देशभक्तों का अनुपम गीत रहा है। इसे कई मुस्लिम भी गाते रहे हैं। पर यहाँ एक बात पहले स्पष्ट हो जानी चाहिए। कि मुस्लिम जनता और उनके राजनीतिक नेताओं में भेद करना जरूरी है।

मुस्लिम जनता तो अपने आप में हिन्दू जनता की तरह ही है। अपने अवलोकन से आश्वस्त होकर वह भी अच्छे और सचाई भरे लोगों, प्रयासों को समर्थन देती है – बशर्ते उसके नेता इसमें बाधा न डालें (जैसा बुखारी ने अभी शुरू किया)। इसीलिए तो रामलीला मैदान और देश भर में मुस्लिम भी अन्ना के पक्ष में बोल रहे हैं। किन्तु मुस्लिम नेता दूसरी चीज होते हैं। उनके लिए इस्लाम ही सब कुछ है। वे हर चीज को इस्लामी तान पर खींचने की जिद करते हैं, और इसके लिए हर दाँव लगाने से नहीं चूकते। इसलिए कई बार उनकी शिकायतें नकली होती हैं, वह किसी छिपे उद्देश्य का साधन होती हैं। इसी बात को न समझकर हिन्दू महानुभाव सदैव मूर्ख बनते रहे हैं। अयातुल्ला खुमैनी ने एक बार कहा भी था कि “पूरा इस्लाम ही राजनीति है”। अभी बुखारी साहब वही कर के दिखा रहे हैं।

इसलिए इस बात को दरकिनार नहीं करना चाहिए कि इस्लाम के नाम पर वन्दे-मातरम गान का सदैव विरोध भी होता रहा है। इमाम बुखारी ने कोई नई बात नहीं कही। अभी दो साल पहले ‘जमाते उलेमा ए हिन्द’ ने वन्दे-मातरम गाने के खिलाफ फतवा दिया था। इसलिए इस पर हिन्दुओं द्वारा सफाई देना बेकार है। अन्ना के सहयोगी उसी तरह बुखारी को मनाने गए हैं, जैसे उस जमाने में गाँधीजी करते थे। उसका क्या नतीजा रहा? पूरे इतिहास को याद करें।

इस्लामी सिद्धांत की दृष्टि से बुखारी गलत नहीं हैं। लेकिन जैसा राजनीति में होता है, इस गीत पर आपत्ति उठाने और स्थगित कर देने में राजनीतिक परिस्थितियों का तर्क अधिक चला है। इसीलिए अरविन्द केजरीवाल जैसे बुद्धिमान या श्रीश्रीरविशंकर जैसे संत निरर्थक प्रयास कर रहे हैं। वे बुखारी जैसे आपत्तिकर्ताओं को इस्लामी सिद्धांतों के अनुरूप संतुष्ट करने का प्रयास करते हैं। यानी वह काम करना चाहते हैं जहाँ गाँधी जैसे सत्यनिष्ठ सेवक बुरी तरह विफल रहे। हमें इतिहास से सीख लेनी चाहिए। कि यह तर्क-वितर्क का मसला ही नहीं है।

भारत के निकट इतिहास में कई उदाहरण हैं – सर सैयद से लेकर मौलाना आजाद, अब्दुल बारी, शौकत अली, आदि – जिन्होंने राष्ट्रवाद, हिन्दू-मुस्लिम एकता, गो-हत्या, हिजरत और वतनपरस्ती पर समय-समय पर विपरीत मंतव्य दिए। तदनुरूप ऐसे या वैसे आवाहन किए। तब उन अंतर्विरोधी वक्तव्यों में इस्लामी सिद्धांत क्या था? अतः समझना चाहिए कि इस्लामी मामलों में फैसले देश-काल-राजनीति और शक्ति सापेक्ष होते रहे हैं। उसमें केवल सिद्धांत जैसी कोई चीज नहीं होती। इसीलिए उसे तर्क और सदभावना मात्र से तय करने की कोशिशें व्यर्थ है। गाँधीजी इसीलिए पिटे थे।

वंदे-मातरम गान या भारत माता की पूजा आदि चीजों पर कुरान, हदीस या सुन्ना को आधार बना कर समझाना वैसे भी अन्याय है। यह तो हर चीज के लिए इस्लाम को कसौटी मान लेना हुआ। विविध पंथों, विचारों को मानने वाली जनता के लिए किसी एक पंथ को ही आधार बनाकर किसी काम की परख गलत है। जिस प्रकार मुसलमानों को कोई काम करने या न करने के लिए ईसाइयत के निर्देश को आधार नहीं बनाया जा सकता, उसी तरह इस्लाम को कसौटी बनाकर ईसाइयों या हिन्दुओं को कुछ करने या न करने के लिए कहना भी अनुचित है।

वस्तुतः इस्लाम को आधार मान कर वंदे-मातरम गान की सफाई देना व्यवहार में विपरीत फलदायी होता रहा है। इस बहस में जाने से कट्टर इस्लामपंथी ही मजबूत होते हैं। यदि स्वामी रामदेव कहते हैं कि वंदे-मातरम में “मूर्ति-पूजा का कर्मकांड” नहीं, इसलिए मुसलमानों को विरोध नहीं करना चाहिए, तो इसका मतलब है कि वे मूर्ति-पूजा को गलत मान रहे हैं। यह कौन सी बात हुई? किस आधार पर मूर्ति-पूजा गलत और काबे को सिजदा करना सही है? मगर यदि आप ऐसा ही मान लेते हैं, तब तो बात बस इतनी बचती है कि इस्लाम में क्या जायज है, क्या नहीं। उसका फैसला कोई मुफ्ती या ईमाम करेंगे कि एक हिन्दू संत?

दरअसल वंदे-मातरम विरोध कोई स्वतंत्र मुद्दा नहीं। यह इस्लाम और देश-प्रेम के संबंध से जुड़ा हुआ है। इस पर तरह-तरह की दलीलें जरूर रही। किंतु इस पर मुस्लिम चिंतकों में मूलतः कोई गंभीर मतभेद नहीं है। इस्लाम में कौम या वतन का सवाल हिजरत, दारुल-हरब तथा दारुल-इस्लाम की बुनियादी धारणाओं से अभिन्न है। हमारे देश में इसका एक बार फैसला तो 1947 में ही हो चुका। इस्लामी नेताओं और मुस्लिम जनमत ने देश नहीं, बल्कि इस्लाम को तवज्जो दी। तब से इस्लामी चिंतन में तो कुछ नहीं बदला। अतः यदि हम उस फैसले की सीख भुला कर फिर उसी कवायद में लगते हैं तो यह फिर उसी दिशा में जाएगा।

कड़वी सच्चाइयों से कतरा कर हिन्दू अपना, देश का या मुसलमानों का भी भला नहीं कर सकेंगे। याद रखना होगा कि कम्युनिज्म की तरह इस्लाम भी अंतर्राष्ट्रीय-राजनीतिक मतवाद है जिस में ‘इस्लाम ही सर्वस्व’ के सामने परिवार, समाज या देश किसी भी नाम पर एकता को कुफ्र माना गया। इसीलिए शाह वलीउल्लाह, सैयद बरेलवी, सर सैयद से लेकर मौलाना हाली, मौदूदी, सर इकबाल, मौलाना आजाद, मुह्म्मद अली, शौकत अली और जिन्ना तक रहनुमाओं की पूरी श्रृंखला ने भारतीय कौम या भारतीय समाज जैसी चीज को सिरे से खारिज किया था। उनके लिए दुनिया भर के मुसलमानों की उम्मत और खलीफत ही केंद्रीय चिंता थी।

अल्लामा इकबाल ने देश-प्रेम को उसूलन गलत ठहराया था, “इन ताजा खुदाओं में सब से बड़ा वतन है। जो पैरहन है उस का, वो मजहब का कफन है”। यानी वतन-परस्ती जो माँगती है, वह इस्लाम के लिए मौत समान है। इसलिए उसे हेच बताते हुए इकबाल कहते हैं, “कौम मजहब से है; मजहब जो नहीं, तुम भी नहीं। जज्बे बाहम जो नहीं, महफिले अंजुम भी नहीं” । उन्होंने देश-भक्ति को बुतपरस्ती का ही एक रूप बताया जिससे इस्लाम को गहरी घृणा है। इसलिए उनका कौल था, “मुस्लिम हैं हम / वतन है सारा जहाँ हमारा”। इसलिए वंदे-मातरम पर उलेमा के फतवे से लेकर मौलाना बुखारी की आपत्ति तक में कोई नई बात नहीं। इस्लाम को कसौटी मानें तो उसमें देश-प्रेम की कोई औकात नहीं।

इसलिए, समस्या बुखारी साहब या जमाते-इस्लामी के नेता या देवबंद नहीं है। समस्या वह मजहबी विचारधारा है जिससे वे निर्देशित होते हैं। जो देश से बढ़कर उम्मत को मानती है। पर हमारे नेता या बुद्धिजीवी उस विचारधारा से नहीं उलझते। उलटे, कन्नी कटाकर इस्लामी निर्देशों की ही सुंदर व्याख्या ढूँढने लगते हैं। यानी जो समस्या का कारण है उसे ही कसौटी बना लेते हैं। कि इस्लाम में ये नहीं, वो है। इस कवायद से उलटा परिणाम होना ही है। उलेमा का अपने अंध-विश्वास पर भरोसा और बढ़ जाता है कि इस्लामी हुक्म देश, समाज, मानवता आदि हर चीज से ऊपर हैं। इतना ऊपर है कि दूसरे भी यह मानते हैं। इसी विन्दु पर गाँधी जी से लेकर केजरीवाल जी तक गलती करते रहे हैं। जिसका खमियाजा हिन्दुओं को भुगतना पड़ता रहा है।

गलती यह है कि जिस विचार से लड़ाई होनी चाहिए, उसी को सिरोपा चढ़ाया जाने लगता है। तब सामान्य मुस्लिम भी विवेकशील चिंतन करने के लिए कैसे प्रेरित होंगे, जब हम ने एक अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी विचार से लड़ने के बजाए उस के समक्ष श्रद्धा-नत रहने की नीति बना रखी है? सच तो यह है कि ऐसा करके हम ने भारतीय मुसलमानों को इस्लाम के मजहबी-राजनीतिक अंतर्राष्ट्रीयतावाद के अधीन फँसे रहने के लिए विवश छोड़ दिया है। वे विश्व कम्युनिज्म की तरह विश्व खलीफत के राजनीतिक सपनों में उलझाए जाते हैं। इसे हजारों विवेकशील, देशभक्त, उदार मुसलमान भी नहीं रोक पाते। उनकी मजहबी किताबें उनकी मदद नहीं करतीं। वह केवल बुखारियों की ही करती हैं।

यह संयोग नहीं है कि मुसलमानों में देशभक्त, उदार, मानवतावादी लेखक, कवि या नेता इस्लाम की कमोबेश उपेक्षा कर के ही वैसे हो पाते हैं। गालिब ने भी अपने को ‘आधा मुसलमान’ ही कहा था। इसीलिए उनकी बातों का असर भी मुस्लिम समुदाय पर नहीं होता। डॉ. भीम राव अंबेदकर की ‘थॉट्स आन पाकिस्तान’, मुशीर उल हक की ‘इस्लाम इन सेक्यूलर इंडिया ’, जीनत कौसर की ‘इस्लाम एंड नेशनलिज्म’ अथवा शबीर अहमद व आबिद करीम की ‘द रूट्स ऑफ नेशनलिज्म इन द मुस्लिम वर्ल्ड’ आदि पुस्तकों के अध्ययन से इस कड़वी सचाई को समझा जा सकता है।

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में आम मुसलमानों में उदार लेखकों, नेताओं की नहीं चलती। खुद जिन्ना जैसे आधुनिक, सेवाधर्मी, लोकतांत्रिक, तेज-तर्रार नेता भी मुसलमानों के बेताज बादशाह तभी बने जब उन्होंने इस्लामी लफ्फाजी अपनाई। जबकि निजी जीवन में उन का इस्लाम से कोई लेना-देना न था। उलटे जिन्ना का रहन-सहन, खान-पान, आदि सब कुछ इस्लामी निर्देशों के विपरीत था। जबकि पूरे इस्लामी तरीके से जीने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान मुसलमानों के मान्य नेता न हो सके, क्योंकि वे इस्लामी माँगे नहीं कर रहे थे। यह अंतर ध्यान देने योग्य है।

अतः जैसे उस जमाने में बादशाह खान जैसे नेता आम मुसलमानों को प्रभावित नहीं कर पाए थे, वैसे ही आज हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम या सलमान खुर्शीद, एम. जे. अकबर आदि नहीं कर पाते। आज भी सिमी जैसे संगठन या बुखारी, जिलानी, मदनी आदि ही मुस्लिम नेता हैं जो भारत के विरुद्ध जिहाद करने वाले ओसामा बिन लादेन को अपना नायक मानते हैं। या सैयद शहाबुद्दीन जो बात-बात में अरब देशों की तानाशाही व जहालत को सिर नवाते हैं और स्वाधीनता दिवस का बहिष्कार कर देश-भक्ति के प्रति खुली अवहेलना प्रकट करते हैं।

यह उसी परंपरा की कड़ी है जब अपने जमाने के सबसे बड़े मुस्लिम नेता मौलाना शौकत अली ने भारत पर अफगानिस्तान के हमले की सूरत में अफगानिस्तान का साथ देने की घोषणा की थी। तब कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर ने अनेक मुस्लिम महानुभावों से स्वयं पूछा था कि यदि कोई मुस्लिम हमलावर भारत पर हमला कर दे तो वे किस का साथ देंगे? उन्हें संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। उसी प्रसंग में प्रख्यात विदुषी और कांग्रेस अध्यक्षा रही एनी बेसेंट ने 1921 में नोट किया था, “मुसलमान नेता कहते हैं कि यदि अफगानिस्तान भारत पर हमला करता है तो वे आक्रमणकारी मुस्लिमों का साथ देंगे और उन से लड़ने वाले हिंदुओं का कत्ल करेंगे। हम यह मानने के लिए मजबूर हैं कि मुसलमानों का मुख्य लगाव मुस्लिम देशों से है, मातृभूमि से नहीं।”

इसलिए अयातुल्ला खुमैनी, बिन लादेन, सद्दाम हुसैन, अहमदीनेजाद जैसी विदेशी हस्तियों के आह्वान पर सारी दुनिया में लाखों मुसलमानों का उठ खड़े होने के पीछे एक संगति है। यह प्रवृत्ति जाने या अनजाने अपने देश की उपेक्षा और विरोध भी करने के लिए तैयार रहती है। शर्त यह है कि मुद्दा इस्लामी हित होना चाहिए। इसी कारण आज पाकिस्तान में निरंतर तालिबानी हमलों के बावजूद वहीं तालिबानों का समर्थक मजबूत तबका भी है। वे अपने वतन से बढ़कर इस्लामी खलीफत के दीवाने हैं।

इतिहास और वर्तमान, सिद्धांत और व्यवहार के सभी आकलन यही दिखाते हैं कि इस्लामी निर्देशों को आधार बनाकर कोई हल नहीं मिल सकता। कहीं न कहीं इस्लाम को नमस्कार करके कहना पड़ेगा, कि हे देवता! आपकी एक सीमा है। जिसके बाद मानवता की सामान्य बुद्धि से सही और गलत का फैसला होता है। उस पर किसी किताब का हुक्म नहीं चलाया जा सकता, और नहीं चलना चाहिए। दुनिया के लोगों की आम सहमति से जहाँ उचित और अनुचित का निर्णय होना चाहिए। मगर वह घोषणा होने में अभी देर है। सब लोग किसी सऊदी गोर्बाचेव के आने का इंतजार कर रहे हैं, जो दीवार पर लिखे सच को सच मान कर इस्लामी जगत में पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त का आरंभ करेगा।

मगर तब तक हम क्या करें? इस पर श्रीअरविंद ने कोई सौ वर्ष पहले कहा था कि चाटुकारिता से हिंदू-मुस्लिम एकता नहीं बनाई जा सकती। न इस्लाम की लल्लो-चप्पो से मुसलमानों को राष्ट्रीय धारा में जोड़ा जा सकता है। अंतरिम समाधान का सरल और सटीक उपाय भी श्रीअरविंद ने 1926 में ही बता दिया थाः “मुसलमानों को तुष्ट करने का प्रयास मिथ्या कूटनीति थी। सीधे हिंदू-मुस्लिम एकता उपलब्ध करने की कोशिश के बजाए यदि हिंदुओं ने अपने को राष्ट्रीय कार्य में लगाया होता तो मुसलमान धीरे-धीरे अपने-आप चले आते। …एकता का पैबंद लगाने की कोशिशों ने मुसलमानों को बहुत ज्यादा अहमियत दे दी और यही सारी आफतों की जड़ रही है।”

दुर्भाग्य से हिंदुओं ने तब शुतुरमुर्गी रास्ता अपनाया था। परिणाम 1947 में सामने आ गया। यदि फिर वही कोशिशें होती रहे, तब हम किस परिणाम की आशा कर सकते हैं!

शंकर शरण


सोमवार, 15 अगस्त 2011

और ऐसे सिमट गया भारत

प्राचीन भारत की सीमाएं विश्व में दूर-दूर तक फैली हुई थीं। भारत ने राजनैतिक आक्रमण तो कहीं नहीं किए परंतु सांस्कृतिक दिग्विजय अभियान के लिए भारतीय मनीषी विश्वभर में गए। शायद इसीलिए भारतीय संस्कृति और सभ्यता के चिन्ह विश्व के लगभग सभी देशों में मिलते हैं।

यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि सांस्कृतिक और राजनैतिक रूप से भारत का विस्तार ईरान से लेकर बर्मा तक रहा था। भारत ने संभवत विश्व में सबसे अधिक सांस्कृतिक और राजनैतिक आक्रमणों का सामना किया है। इन आक्रमणों के बावजूद भारतीय संस्कृति आज भी मौजूद है। लेकिन इन आक्रमणों के कारण भारत की सीमाएं सिकुड़ती गईं। सीमाओं के इस संकुचन का संक्षिप्त इतिहास यहां प्रस्तुत है।

ईरान – ईरान में आर्य संस्कृति का उद्भव 2000 ई. पू. उस वक्त हुआ जब ब्लूचिस्तान के मार्ग से आर्य ईरान पहुंचे और अपनी सभ्यता व संस्कृति का प्रचार वहां किया। उन्हीं के नाम पर इस देश का नाम आर्याना पड़ा। 644 ई. में अरबों ने ईरान पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

कम्बोडिया – प्रथम शताब्दी में कौंडिन्य नामक एक ब्राह्मण ने हिन्दचीन में हिन्दू राज्य की स्थापना की।

वियतनाम – वियतनाम का पुराना नाम चम्पा था। दूसरी शताब्दी में स्थापित चम्पा भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। यहां के चम लोगों ने भारतीय धर्म, भाषा, सभ्यता ग्रहण की थी। 1825 में चम्पा के महान हिन्दू राज्य का अन्त हुआ।

मलेशिया – प्रथम शताब्दी में साहसी भारतीयों ने मलेशिया पहुंचकर वहां के निवासियों को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से परिचित करवाया। कालान्तर में मलेशिया में शैव, वैष्णव तथा बौद्ध धर्म का प्रचलन हो गया। 1948 में अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो यह सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य बना।

इण्डोनेशिया – इण्डोनिशिया किसी समय में भारत का एक सम्पन्न राज्य था। आज इण्डोनेशिया में बाली द्वीप को छोड़कर शेष सभी द्वीपों पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं। फिर भी हिन्दू देवी-देवताओं से यहां का जनमानस आज भी परंपराओं के माधयम से जुड़ा है।

फिलीपींस – फिलीपींस में किसी समय भारतीय संस्कृति का पूर्ण प्रभाव था पर 15वीं शताब्दी में मुसलमानों ने आक्रमण कर वहां आधिपत्य जमा लिया। आज भी फिलीपींस में कुछ हिन्दू रीति-रिवाज प्रचलित हैं।

अफगानिस्तान – अफगानिस्तान 350 इ.पू. तक भारत का एक अंग था। सातवीं शताब्दी में इस्लाम के आगमन के बाद अफगानिस्तान धीरे-धीरे राजनीतिक और बाद में सांस्कृतिक रूप से भारत से अलग हो गया।

नेपाल – विश्व का एक मात्र हिन्दू राज्य है, जिसका एकीकरण गोरखा राजा ने 1769 ई. में किया था। पूर्व में यह प्राय: भारतीय राज्यों का ही अंग रहा।

भूटान – प्राचीन काल में भूटान भद्र देश के नाम से जाना जाता था। 8 अगस्त 1949 में भारत-भूटान संधि हुई जिससे स्वतंत्र प्रभुता सम्पन्न भूटान की पहचान बनी।

तिब्बत – तिब्बत का उल्लेख हमारे ग्रन्थों में त्रिविष्टप के नाम से आता है। यहां बौद्ध धर्म का प्रचार चौथी शताब्दी में शुरू हुआ। तिब्बत प्राचीन भारत के सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र में था। भारतीय शासकों की अदूरदर्शिता के कारण चीन ने 1957 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

श्रीलंका – श्रीलंका का प्राचीन नाम ताम्रपर्णी था। श्रीलंका भारत का प्रमुख अंग था। 1505 में पुर्तगाली, 1606 में डच और 1795 में अंग्रेजों ने लंका

पर अधिकार किया। 1935 ई. में अंग्रेजों ने लंका को भारत से अलग कर दिया।

म्यांमार (बर्मा) – अराकान की अनुश्रुतियों के अनुसार यहां का प्रथम राजा वाराणसी का एक राजकुमार था। 1852 में अंग्रेजों का बर्मा पर अधिकार हो गया। 1937 में भारत से इसे अलग कर दिया गया।

पाकिस्तान - 15 अगस्त, 1947 के पहले पाकिस्तान भारत का एक अंग था।

बांग्लादेश – बांग्लादेश भी 15 अगस्त 1947 के पहले भारत का अंग था। देश विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान के रूप में यह भारत से अलग हो गया। 1971 में यह पाकिस्तान से भी अलग हो गया।

अखण्ड भारत का विचार

आज 14 अगस्त है। हम सब ‘अखण्ड भारत दिवस’ मना रहे है। अखण्ड भारत को लेकर अनेक जगह संगोष्ठी, निबंध प्रतियोगिता एवं व्याख्यानमालाएं आयोजित की जा रही है, पर्चे बांटे जा रहे है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि कुछ लोगों को छोड़कर आज लोग अखण्ड भारत का विचार ही नहीं करते। इसका कारण यह है कि भारत विभाजन को स्थापित सत्य मान लिया गया है। लोग कहते है कि भारत का विभाजन एकदम गलत है, यह नहीं होना चाहिए था, परन्तु अब क्या किया जा सकता है, विभाजन तो हो गया। अब फिर से भारत को अखण्ड थोड़े ही किया जा सकता है। इसी विचार के कारण लोग विभाजन और अखण्ड भारत के बारे में सोचते ही नहीं। इसीलिए सब से पहले लोगों के मनों से स्थापित सत्य वाली बात को निकालना होगा। आइए, इतिहास की कुछ स्थापित सत्य दिखनेवाली बातों के बारे में विचार किया जाए। हम अखण्ड भारत विषय पर विस्तार से चर्चा करना चाहते है। डॉ। सदानन्द दामोदर सप्रे ने अखण्ड भारत मुद्दे पर विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी है। प्रथम कडी में, इस पुस्तक में प्रस्तुत प्रमुख बिन्दुओं को हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं-

  • जिस तरह स्वाधीनता से पहले प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए स्वाधीनता की भावना प्रेरणा का मुख्य स्रोत हुआ करती थी उसी तरह स्वाधीनता के बाद अखण्ड भारत का स्वप्न प्रत्येक राष्ट्रभक्त के लिए प्रेरणा का मुख्य स्रोत होना चाहिए और इस स्वप्न को साकार करने के लिये उसको सतत् क्रियाशील रहना चाहिए।
  • विभाजन का मूल कारण है राष्ट्र और संस्कृति के बारे में भ्रामक धारणा। अंग्रेजों के जाल में हमारा नेतृत्व फंसा। तबसे राष्ट्र और संस्कृति के विषय में सर्वसामान्य जनता की भी धारणा भ्रामक हो गई। मिला-जुला राष्ट्र और मिली-जुली संस्कृति के विचार के कारण एक राष्ट्र, एक संस्कृति की बात गलत लगने लगी।
  • स्वाधीनता संग्राम के एक प्रमुख नेता पं. जवाहरलाल नेहरू कहा करते थे कि “We are a nation in the making” अर्थात् ”हम राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है”। अंग्रेजों ने यह संभ्रम फैलाने का प्रयास किया कि भारत कभी एक राष्ट्र रहा ही नहीं, उन्होंने इसे एक राष्ट्र बनाया है।
  • अंग्रेजों की शह से पुष्ट हुई मुस्लिम लीग ने 1940 में देश के विभाजन की मांग की, अंग्रेजों ने 3 जून 1947 को विभाजन की योजना प्रस्तुत की और 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को देश का विभाजन हो गया।
  • विभाजन के बीज: –
  • 1906 में की गई पृथक निर्वाचक-मण्डल की मांग को भारत विभाजन की दिशा का पहला कदम कहा जा सकता है। यह स्पष्ट रूप से मुस्लिम अलगाववाद था और इसे अंग्रेजों का समर्थन प्राप्त था।
  • 1906 में अड़तालीसवें शिया इमाम आगा खां के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल लार्ड मिण्टो से मिला। इसकी प्रमुख मांग थी- मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचक मण्डल। लार्ड मिण्टो ने इस मांग के प्रति अपनी सहमति जाहिर की और आगे चलकर 1909 के मार्ले-मिण्टो सुधारों में इसे सम्मिलित किया।
  • तुष्टीकरण के अंतर्गत शर्तों के आधार पर मुसलमानों को स्वाधीनता संग्राम में सम्मिलित करने के लिए कांग्रेस ने राष्ट्रीय मानबिन्दुओं के साथ समझौते किए। 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में प्रख्यात गायक पं. पलुस्कर ने जैसे ही ‘वन्देमातरम्’ का गायन प्रारंभ किया वैसे ही कांग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली ने यह कहते हुए गायन को रोकने का प्रयास किया कि इसमें मूर्ति पूजा है इसलिए इससे मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। मंच पर आसीन एक भी नेता ने इसका विरोध नहीं किया। पं. पलुस्कर ने मोहम्मद अली को यह कहकर चुप कर दिया कि मुझे यहां ‘वन्देमातरम्’ गाने के लिए बुलाया गया है और मैं तो गाऊंगा। इसके बाद उन्होंने संपूर्ण ‘वन्देमातरम्’ गाया और उस दौरान मोहम्मद अली मंच से उठकर चले गये। आगे चलकर 1937 में यह देखने के लिए एक समिति बनाई गई कि ‘वन्देमातरम्’ का कौन सा हिस्सा मुसलमानों के लिए आपत्तिजनक है। उनके निष्कर्ष के अनुसार ‘ वन्देमातरम्’ के केवल पहले दो पद ही गाये जायेंगे ऐसा तय हुआ और आगे का ‘वन्देमातरम्’ निकाल दिया गया। आज भी हमारे स्वीकृत राष्ट्रगीत ‘वन्देमातरम्’ में पहले दो पद ही हैं, संपूर्ण ‘वन्देमातरम्’ नहीं है।
  • मोहम्मद अली जिन्ना की अध्यक्षता में 1927 में प्रमुख मुस्लिम नेताओं की एक बैठक हुई। इसमें उनकी मांगें ”चार सूत्र” के रूप में प्रस्तुत की गई इस समय तक पृथक निर्वाचन-मंडल वाली बात निष्प्रभावी हो चुकी थी, अत: चार सूत्रों के बदले पृथक निर्वाचक मंडल के स्थान पर आरक्षण वाले संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों की बात स्वीकार करने की बात कही गई-

(1) सिंध का मुंबई प्रांत से अलग किया जाये

(2) पश्चिमोत्तार सीमा प्रांत और ब्लूचिस्तान का स्तर बढ़ाकर उन्हें पूर्ण गवर्नर का प्रांत बनाया जाये।

(3) पंजाब और बंगाल इन मुस्लिम बहुल प्रांतों में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाये।

(4) केन्द्रीय विधानमंडल में कम से कम एक तिहाई सदस्य मुसलमान हों।

सभी मांगें खतरनाक थीं। विशेष रूप से सिंध को मुंबई से अलग करने की। क्योंकि इससे सिंध मुस्लिम बहुल प्रांत बननेवाला था। (सिंध के मुस्लिम बहुत प्रांत बनने से ही विभाजन के समय वह पाकिस्तान में शामिल हो गया, जबकि यदि वह हिन्दू-बहुल मुंबई प्रांत का हिस्सा होता तो सिंध आज भारत में होता।) कांग्रेस ने पहली तीन मांगें स्वीकार कर लीं। जब जिन्ना ने देखा कि कांग्रेस इतना झुक रही है तो उसने 1928 में ”जिन्ना के चौदह सूत्र’ प्रस्तुत कर दिए। इनमें पिछली सारी मांगें तो थी हीं, साथ में कुछ और मांगें भी थीं, जिनमें प्रमुख थी-

(1) पंजाब, बंगाल और पश्चिमोत्तार सीमाप्रांत का कोई ऐसा पुनर्गठन न हो जिससे उनका मुस्लिम बाहुल्य समाप्त हो।

(2) केन्द्रीय और सभी प्रांतीय मंत्रिकंडलों में कम से कम एक तिहाई मुस्लिम हों।

साथ ही इसमें फिर से पृथक् निर्वाचक मण्डल की मांग की गई थी। इसमें यह भी घोषणा की गई कि मुसलमान मात्र एक समुदाय नहीं, बल्कि विशेष दृष्टि से स्वयं में एक राष्ट्र है। इस तरह कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण अलगाववादी मुस्लिम नेताओं की मांगें बढ़ती ही गई।

1930 में लंदन में हुए प्रथम गोलमेज सम्मेलन का कांग्रेस ने नमक सत्याग्रह के कारण बहिष्कार किया इस कारण वह निष्फल हुआ। 1939 में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की ओर से गांधीजी सम्मिलित हुए। आगा खां को मुसलमानों के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। इसमें कोई सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं निकला परन्तु इस सम्मेलन में ही पहली बार ‘पाकिस्तान” यह शब्द अस्तित्व में आया।

1939 में जब द्वितीय विश्वयुध्द आरंभ हुआ तब भारतीयों का समर्थन और सहयोग प्राप्त करने के लिए वाइसराय लिनलिथगोने गांधीजी के साथ जिन्ना को भी वार्ता क के लिए आमंत्रित किया। इस तरह अंग्रेजों ने जिन्नों को गांधीजी के बराबरी का स्थान दिया। कांग्रेस ने युध्द समाप्ति के बाद भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता की मांग की। परन्तु मुस्लिम लीग ने हमेशा की तरह केवल अलगाववाद पर आधारित मुस्लिम हित ही सामने रखा, भारत की स्वाधीनता के संबंध में कोई बात नहीं की। उन्होंने दो मांगें की-

(1) कांग्रेस-शासित प्रांतों में मुसलमानों को न्याय और उचित व्यवहार मिलना चाहिए।

(2) मुस्लिम लीग की सहमति के बिना भारत की संवैधानिक प्रगति के प्रश्न पर न तो कोई घोषणा की जाये और न ही कोई संविधान बनाया जाये।

अंग्रेजों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अखिल इस्लामवाद को खाद-पानी देना प्रारंभ किया ताकि युध्द के दौरान मुस्लिम देश उनके निकट आ जायें। इसका लाभ भी मुस्लिम लीग उठा रही थी। ऐसे वायुमंडल में 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग की। इसे ”पाकिस्तान प्रस्ताव” के रूप में जाना जाता है।

1939 में भारत के कम्युनिस्ट द्वितीय विश्वयुध्द में अंग्रेजों के विरूध्द थे क्योंकि जर्मनी के हिटलर ने रूस के स्टालिन से संधि की थी। परन्तु जब जर्मनी ने 1941 में रूस पर आक्रमण कर दिया तब अपनी पहले की भूमिका बदलकर वे अंग्रेजों के समर्थक बन गए। इस कारण उन्होंने भी 1942 के ”भारत छोड़ों” आंदोलन का विरोध किया। साथ ही उन्होंने मुस्लिम लीग की देश विभाजन की मांग का समर्थन किया और अपने अनेक मुस्लिम सदस्यों को निर्देश दिया कि द्वि-राष्ट्र सिध्दांत को बौध्दिक बल देने के लिए वे मुस्लिम लीग में शामिल हों। उन्होंने तो ऐसा कहना भी प्रारंभ किया कि प्रत्येक भाषाई इकाई अलग राष्ट्र है और उन्हें अलग होने का अधिकार है। इस तरह अंग्रेज-लीग-कम्युनिस्ट गठबधंन भारत की स्वाधीनता और अखण्डता की जड़ें काटने में जुट गया।

1945-46 में जो चुनाव हुए उनमें कांग्रेस ‘अखण्ड भारत’ के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी तो मुस्लिम लीग ‘पाकिस्तान’ के नारे के साथ। इस चुनाव में जहां एक ओर सभी सामान्य क्षेत्रों में कांग्रेस विजयी रही और केन्द्रीय धारा सभा में उसे 91.3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए वहीं दूसरी ओर मुस्लिम लीग को सभी मुस्लिम सीटों पर विजय मिली। उसके मतों का प्रतिशत 86.8 था। इस बात से लीग के नेता उन्मत्ता हुए और वे खुली लड़ाई की चुनौतियां देने लगे।

कांग्रेस ने 8 मार्च 1947 की बैठक में इस घोषणा का स्वागत किया और मांग की कि पंजाब और बंगाल का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन किया जाये। इस तरह कांग्रेस ने यह संकेत दे दिया कि उसने पाकिस्तान की मांग को सिध्दांत रूप में स्वीकार कर लिया है और वह आधा पंजाब और आधा बंगाल भारत में लाने के लिए प्रयत्नशील है।

माउंटबेटन ने 2 जून को मेनन योजना सबके सामने रखी। कांग्रेस ने इसे इस शर्त पर स्वीकार किया कि मुस्लिम लीग भी इसे बिना किसी शर्त के स्वीकार करे। 2 जून की रात्रि को जब माउंटबेटन ने जिन्ना से भेंट की तो उसने कहा कि लीग को अखिल भारतीय परिषद की सहमति प्राप्त करने के लिए एक सप्ताह चाहिए। इस पर माउंटबेटन ने उसे स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि तुरंत स्वीकृति नहीं मिली तो कांग्रेस भी अपनी स्वीकृति वापस ले लेगी और उसके हाथ से पाकिस्तान प्राप्ति का अवसर सदा-सदा के लिए निकल जाएगा। तब जिन्ना ने भी अपनी स्वीकृति दी।

3 जून को एटली ने हाउस ऑफ कॉमंस में योजना की अधिकृत घोषणा की इसलिए इसे ’3 जून योजना’ कहा गया। इसमें सत्ताा हस्तातंरण की तिथि जून 1948 से पीछे खिसककर 15 अगस्त 1947 कर दी गई।

14-15 जून को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में 3 जून योजना को स्वीकृति दी जानी थी। वरिष्ठ नेताओं में से केवल बाबू पुरुषोत्ताम दास टंडन ने विभाजन की 3 जून योजना का विरोध किया, परंतु उनके भाषण पर तालियों की भारी गड़बड़ाहट हुई। ऐसे समय गांधीजी ने 3 जून योजना का समर्थन किया। प्रस्ताव के पक्ष में 157 और विपक्ष में 29 मत पड़े। 32 सदस्य तटस्थ रहे। इस तरह वह प्रस्ताव पारित हो गया। (यहां यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि जिस कांग्रेस ने 1945-46 का चुनाव ”अखंड भारत” के नारे पर लड़ा और जीता उसे विभाजन स्वीकार करने का क्या नैतिक अधिकार था?) इस प्रकार स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकृति देकर राष्ट्रीय एकता और अखंडता के मूल प्रश्न पर आत्मसमर्पण कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 14-15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को देश का दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन होकर उसे स्वाधीनता मिली।

मुस्लिम लीग की हठधर्मिता और हिंसात्मक कारवाइयों के कारण विवश होकर कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकृति दी। परंतु यदि यह स्वीकृति नहीं दी जाती तो क्या होता? अधिक से अधिक गृहयुध्द होता। किंतु क्या देश की अखंडता के लिए गृहयुध्द नहीं किया जा सकता? अमरीकी इतिहास में अब्राहम लिंकन ने देश विभाजन और गृहयुध्द में से गृहयुध्द को चुना और अंततोगत्वा वे देश को अखंड रखने में सफल हुए। आज कोई भी उन्हें युध्दपिपासु नहीं कहता, उन्हें महापुरुष माना जाता है।

कभी-कभी ऐसा विचार भी मन में आ सकता है कि जब हमारे श्रध्देय नेताओं ने विभाजन स्वीकार कर लिया तो हमने भी उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। परंतु जरा विचार करें। जितने भी लोगों ने स्वाधीनता के लिए प्रयास किये, उनकी आंखों के सामने अखंड भारत था या खंडित भारत। इसका उत्तार- अखंड भारत।

द्वितीय विश्वयुध्द के बाद जर्मनी का विभाजन हो गया। इतनी सख्ती थीं कि अब यह विभाजन सदैव के लिए है ऐसा लगने लगा था परन्तु आज जर्मनी फिर से अपने अखण्ड रूप में है। वियतनाम का एकीकरण हो चुका है।

अखण्ड भारत के विषय को आम लोगों के हृदय तक पहुंचाने के लिए निम्न उपाय करने होंगे-

  • ‘अखण्ड भारत स्मृति दिवस’ का आयोजन करना, ताकि युवा पीढी के सामने अखण्ड भारत का सपना बरकरार रहे।
  • -अखण्ड भारत का चित्र अपने कमरों में लगाना, यह हमारे आंखों के सामने रहेगा जिससे हमारा संकल्प और मजबूत होता रहे।

महापुरूषों के विचार:

  • मैं स्पष्ट रूप से यह चित्र देख रहा हूं कि भारतमाता अखण्ड होकर फिर से विश्वगुरू के सिंहासन पर आरूढ है। -अरविन्द घोष
  • आइए, प्राप्त स्वतंत्रता को हम सुदृढ़ नींव पर खड़ी करें अखंड भारत के लिए प्रतिज्ञाबध्द हों। स्वातंत्र्यवीर सावरकर
  • अखंड भारत मात्र एक विचार न होकर विचारपूर्वक किया हुआ संकल्प है। कुछ लोग विभाजन को पत्थर रेखा मानते हैं। उनका ऐसा दृष्टिकोण सर्वथा उनुचित है। मन में मातृभूमि के प्रति उत्कट भक्ति न होने का वह परिचायक है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय
  • पाकिस्तान तो इस्लामी भावना के ही विपरीत है। यह कैसे कहा जा सकता है कि जिन प्रांतों में मुसलमान अधिक है वे पाक हैं और दूसरे सब प्रांत नापाक हैं।
  • -मौलाना अबुल कलाम आजाद
  • पश्चाताप से पाप प्राय: धुल जाता है किंतु जिनकी आत्मा को विभाजन के कुकृत्य पर संतप्त होना चाहिए था वे ही लोग अपनी अपकीर्ति की धूल में लोट लगाकर प्रसन्न हो रहे हैं। आइए, जनता ही पश्चाताप कर ले-न केवल अपनी भूलचूक के लिए, बल्कि अपने नेताओं के कुकर्मों के लिए भी। डा राम मनोहर लोहिया
  • हम सब अर्थात् भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश इन तीनों देशों में रहने वाले लोग वस्तुत: एक ही राष्ट्र भारत के वासी हैं। हमारी राजनीतिक इकाइयां भले ही भिन्न हों, परंतु हमारी राष्ट्रीयता एक ही रही है और वह है भारतीय। लोकनायक जयप्रकाश नारायण

  • पिछले चालीस वर्ष का इतिहास इस बात का गवाह है कि विभाजन ने किसी को फायदा नहीं पहुंचाया। अगर आज भारत अपवने मूल रूप में अखंडित होता तो न केवल वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता था, बल्कि दुनिया में अमन-चैन कायम करने में उसकी खास भूमिका होती। जिए सिंध के प्रणेता गुलाम मुर्तजा सैयद
मुझे वास्तविक शिकायत यह है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के प्रति न केलव कांग्रेस अपितु महात्मा गांधी भी उदासीन रहे। उन्होंने जिन्ना एवं उनके सांप्रदायिक अनुयायियों को ही महत्व दिया। मुझे पूरा विश्वास है कि यदि उन्होंने हमारा समर्थन किया होता तो हम जिन्ना की हर बात का खंडन कर देते और विभाजनवादी आंदोलन के आरंभ काल में पर्याप्त संख्या में मुसलमानों को राष्ट्रवादी बना देते।